- सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षित वर्ग के उच्च अंक प्राप्त उम्मीदवारों को ओपन कैटेगरी में शामिल करने का आदेश दिया.
- जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II को लेकर SC ने राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा.
- कोर्ट ने डबल बेनिफिट की दलील को खारिज करते हुए कहा कि ओपन कैटेगरी केवल मेरिट आधारित होती है.
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया था कि आरक्षित वर्ग के वे अभ्यर्थी जो सामान्य (जनरल/ओपन) श्रेणी की कट-ऑफ से अधिक अंक हासिल करते हैं, उन्हें शॉर्टलिस्टिंग के चरण में ही ओपन कैटेगरी में माना जाना चाहिए न कि केवल उनकी आरक्षित श्रेणी तक सीमित रखा जाए. जस्टिस दीपांकर दत्ता और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राजस्थान हाई कोर्ट प्रशासन और उसके रजिस्ट्रार द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए 18 सितंबर 2023 के डिवीजन बेंच के फैसले की पुष्टि की.
यह मामला अगस्त 2022 में राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसमें 2,756 पदों (जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II) के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे.
आरक्षित उम्मीदवारों की कट-ऑफ रही थी ज्यादा
- चयन प्रक्रिया में 300 अंकों की लिखित परीक्षा और 100 अंकों की कंप्यूटर आधारित टाइपिंग परीक्षा शामिल थी. नियम के अनुसार, हर श्रेणी में रिक्तियों के पांच गुना उम्मीदवारों को लिखित परीक्षा के आधार पर टाइपिंग टेस्ट के लिए शॉर्टलिस्ट किया जाना था.
- मई 2023 में परिणाम घोषित होने के बाद यह सामने आया कि SC, OBC, MBC और EWS जैसी आरक्षित श्रेणियों की कट-ऑफ सामान्य श्रेणी से अधिक थी.
- इसके कारण कई ऐसे आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार, जिन्होंने सामान्य श्रेणी की कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए थे, लेकिन अपनी श्रेणी की कट-ऑफ से कम अंक होने के कारण शॉर्टलिस्ट नहीं हो पाए.
इससे आहत उम्मीदवारों ने राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया और संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन का आरोप लगाया.
राजस्थान हाईकोर्ट ने ये दिया था फैसला
- राजस्थान हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि श्रेणीवार शॉर्टलिस्टिंग की प्रक्रिया वैध है, लेकिन जो आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार बिना किसी छूट या रियायत के सामान्य श्रेणी की कट-ऑफ से अधिक अंक लाते हैं, उन्हें ओपन कैटेगरी में ही शामिल किया जाना चाहिए.
- कोर्ट ने निर्देश दिया था कि पहले ओपन/जनरल कैटेगरी की मेरिट लिस्ट केवल योग्यता के आधार पर तैयार की जाए. इसके बाद आरक्षित श्रेणियों की सूचियां बनाई जाए और जो उम्मीदवार पहले ही ओपन कैटेगरी में चयनित हो चुके हों, उन्हें आरक्षित सूची से बाहर रखा जाए.
- इसके साथ ही हाई कोर्ट ने गलत तरीके से बाहर किए गए उम्मीदवारों को टाइपिंग टेस्ट में शामिल होने का अवसर देने का भी आदेश दिया था.
डबल बेनिफिट की दलील को किया खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं की इस दलील को खारिज कर दिया कि इससे आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को “डबल बेनिफिट” मिल जाएगा. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनरल या ओपन कैटेगरी कोई आरक्षित कोटा नहीं है, यह सभी उम्मीदवारों के लिए केवल मेरिट के आधार पर खुली होती है.
पीठ ने कहा कि केवल आवेदन पत्र में आरक्षित श्रेणी का उल्लेख कर देना, किसी उम्मीदवार को स्वतः आरक्षित पद पर नियुक्ति का हक नहीं देता है. उसी तरह यदि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी रियायत के सामान्य वर्ग से बेहतर प्रदर्शन करता है तो उसे ओपन कैटेगरी में ही प्रतिस्पर्धा करने का अधिकार है.
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि भर्ती प्रक्रिया में एस्टॉपल का सिद्धांत पूर्ण रूप से लागू नहीं होता है, खासकर तब जब प्रक्रिया में स्पष्ट अवैधता हो.
राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को ठहराया सही
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उम्मीदवार यह कल्पना नहीं कर सकते थे कि जनरल कैटेगरी से बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद उन्हें ओपन कैटेगरी से बाहर कर दिया जाएगा. ऐसे में उनकी चुनौती को एस्टॉपल के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है.
कोर्ट ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) और आर.के. सभरवाल बनाम पंजाब राज्य (1995) के फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि उच्च मेरिट हासिल करने वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को केवल उनकी जाति या श्रेणी के आधार पर समान अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता है.
इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि 'ओपन' का अर्थ ही खुला है. ओपन या जनरल पद किसी भी जाति, वर्ग या श्रेणी के लिए आरक्षित नहीं होते होते हैं. ऐसे पदों पर नियुक्ति केवल योग्यता के आधार पर होती है. सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए सभी अपीलें खारिज कर दीं.
यह फैसला भर्ती प्रक्रियाओं में मेरिट को सर्वोपरि मानने और संवैधानिक समानता के सिद्धांत को मजबूत करता है.
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