- सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के मामले में 5 आरोपियों को जमानत दी जबकि शरजील इमाम और उमर खालिद को जमानत नहीं
- कोर्ट ने UAPA जैसे कठोर कानूनों में ट्रायल देरी को गंभीर समस्या बताया और अनुच्छेद 21 का महत्व रेखांकित किया
- कोर्ट ने कहा कि जमानत आवेदन पर न्यायिक जांच आवश्यक है और ट्रायल से पहले की कैद को सजा नहीं माना जाना चाहिए
दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए पांच आरोपियों को जमानत दे दी. जिन आरोपियों को राहत मिली है, उनमें मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा-उर-रहमान, मुहम्मद शकील खान और शादाब अहमद शामिल हैं. जबकि शरजील इमाम और उमर खालिद को इस मामले में फिलहाल जमानत नहीं मिली है. इस मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम टिप्पणी की.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कहा कि कठोर कानूनों जैसे UAPA में ट्रायल में देरी का मुद्दा गंभीर है. सवाल यह है कि जब लंबे समय तक फैसला नहीं आता, तो अदालत क्या करे? अनुच्छेद 21 संवैधानिक व्यवस्था में केंद्रीय स्थान रखता है. ट्रायल से पहले की कैद को सज़ा नहीं माना जा सकता, लेकिन आज़ादी से वंचित करना मनमाना नहीं होना चाहिए. UAPA एक विशेष कानून है, जो ट्रायल से पहले जमानत देने की शर्तों को विधायी रूप से तय करता है.
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UAPA पर कोर्ट का नजरिया
UAPA राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े संवेदनशील मामलों से संबंधित है. अदालत ने कहा कि चर्चा सिर्फ देरी और लंबे समय तक जेल में रखने तक सीमित रही है. UAPA के तहत अपराध शायद ही कभी अलग-थलग कामों तक सीमित होते हैं. धारा 43D(5) जमानत देने के सामान्य प्रावधानों से अलग है, लेकिन यह न्यायिक जांच को बाहर नहीं करता और न ही डिफ़ॉल्ट रूप से जमानत देने से इनकार करता है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, दिल्ली दंगों के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम अन्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से अलग स्थिति में हैं.
जमानत पर कोर्ट की टिप्पणी
दिल्ली दंगा मामले के आरोपियों की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत बचाव का मूल्यांकन करने का मंच नहीं है. न्यायिक संयम का मतलब कर्तव्य से पीछे हटना नहीं है. अदालत को सही आवेदन के लिए एक व्यवस्थित जांच करनी होगी. यह देखना जरूरी है कि क्या जांच में प्रथम दृष्टया अपराध सामने आया है और क्या आरोपी की भूमिका का अपराध से कोई उचित संबंध है.
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धारा 15 पर सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
धारा 15 यह बताती है कि लगातार आतंकवादी गतिविधि क्या होती है. यह काम सुरक्षा को खतरा पहुंचाने और दहशत फैलाने के इरादे से किया जाना चाहिए. ऐसे काम से परिणाम होने चाहिए या होने की संभावना होनी चाहिए. इसके तरीके सिर्फ़ बम तक सीमित नहीं हैं; संसद ने इसे ‘किसी भी अन्य तरीके' तक बढ़ा दिया है. मौत और तबाही के अलावा, इसमें ऐसे काम भी शामिल हैं जो आर्थिक गतिविधियों को ठप कर दें या नागरिक जीवन को बाधित करें.
जांच इस बात तक सीमित है कि क्या आरोपी का सीधे तौर पर शामिल होने या साज़िश रचने का कोई शुरुआती संबंध है. कानूनी ढांचे को ध्यान में रखते हुए यह देखना होगा कि क्या व्यक्तियों के तथ्य किसी बदलाव की गारंटी देते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय रिकॉर्ड से पता चलता है कि हर आरोपी एक ही स्थिति में नहीं है.
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