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This Article is From Sep 05, 2017

बाल विवाह पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, कहा - ये मैरिज नहीं मिराज है

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारे पास तीन विकल्प है. पहला इस अपवाद को हटा दें जिसका मतलब है कि बाल विवाह के मामले में 15 से 18 साल की लड़की के साथ अगर उसका पति संबंध बनाता और उसे रेप माना जाए.

बाल विवाह पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता,  कहा - ये मैरिज नहीं मिराज है
प्रतीकात्मक चित्र
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आज बाल विवाह पर चिंता जताई और कहा कि ये मैरिज नहीं मिराज है. बाल विवाह के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि कानून में बाल विवाह को अपराध माना गया है, उसके बावजूद लोग बाल विवाह करते हैं. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ये शादी नहीं बल्कि मिराज यानी मृगतृष्णा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारे पास तीन विकल्प है. पहला इस अपवाद को हटा दें जिसका मतलब है कि बाल विवाह के मामले में 15 से 18 साल की लड़की के साथ अगर उसका पति संबंध बनाता और उसे रेप माना जाए. 

कोर्ट ने कहा कि दूसरा विकल्प ये है कि इस मामले में पॉस्को एक्ट लागू किया जाए यानि बाल विवाह के मामले में 15 से 18 साल की लड़की के साथ अगर उसका पति संबंध बनाता है तो उसपर पॉस्को के तहत कार्रवाई हो. और तीसरा विकल्प ये है कि इसमें कुछ न किया जाए और इसे अपवाद माना जाए जिसका मतलब ये है कि बाल विवाह के मामले में 15 से 18 साल की लड़की के साथ अगर उसका पति संबंध बनाता तो वो रेप नही माना जायेगा.

वही याचिकाकर्ता की तरफ से मंगलवार को दलील दी गई कि बाल विवाह से बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है. बाल विवाह बच्चों पर एक तरह का जुर्म है क्योंकि कम उम्र में शादी करने से उनका यौन उत्पीड़न ज्यादा होता है. ऐसे में बच्चों को प्रोटेक्ट करने की जरूरत है. पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बाल विवाह के मामले में 15 से 18 साल की लड़की के साथ अगर उसका पति संबंध बनाता है और उसे रेप मान लिया जाता है तो ऐसे में बच्चों का भविष्य क्या होगा?  कोर्ट ने कहा था कि भारत में बाल विवाह बड़े पैमाने पर हुए हैं अगर इसको अवैध माना जाता है तो बच्चों की वैधता क्या होगी?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई लडक़ी 15 से 18 के बीच है और उसकी शादी नहीं हुई है और उसकी मर्जी से भी उसके साथ कोई सम्बंध बनाता है तो उसे रेप माना जाता है, लेकिन बाल विवाह के मामले में ऐसा नहीं है. 15 से 18 साल की लड़की से उसका पति अगर उसकी सहमति से सम्बंध बनाता है तो वो बलात्कार के तहत नहीं आएगा. कोर्ट ने कहा या तो हम इस कानून को सही ठहरा दें जिसका मतलब है कि 15 से 18 के बीच शादीशुदा लड़की के साथ उसकी मर्जी से उसका पति सम्बंध बनाता है तो उसे रेप न माना जाए, या फिर उसे रेप की कैटेगरी में माना जाए. या फिर इसे 18 साल ही कर दें.

अदालत उस संगठन की याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें कहा गया कि 15 से 18 वर्ष के बीच शादी करने वाली महिलाओं को किसी तरह का संरक्षण नहीं है.  याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि एक तरह लड़कियों की शादी की न्यूनतम आयु 18 वर्ष हैं वहीं इससे कम उम्र की लड़कियों की शादी हो रही है. 15 से 18 वर्ष की लड़कियों की शादी अवैध नहीं होती है लेकिन इसे अवैध घोषित किया जा सकता है. इतनी कम में उम्र में लड़कियों की शादी से उसके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. 

उन्होंने कहा कि 15 से 18 वर्ष के बीच लड़कियों की शादी को असंवैधानिक घोषित किया जाना चाहिए. 18 से कम उम्र की लड़कियों को यह नहीं पता होता है कि शादी के क्या परिणाम होंगे. उन्होंने कहा कि शादी का एक ही बेंचमार्क होना चाहिए. लड़कियों की शादी के लिए संसद ने न्यूनतम 18 वर्ष है, जो मानसिक आयु है. ऐसे में इसका कोई अपवाद नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा कि इसे लेकर सीआरपीसी में तो बदलाव कर दिया गया लेकिन भारतीय दंड संहिता में संशोधन नहीं किया गया.

बाल विवाह सामाजिक सच्चाई, लेकिन कानून केवल संसद ही बना सकती है : केंद्र सरकार
केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा  कि बाल विवाह सामाजिक सच्चाई है और इस पर कानून बनाना संसद का काम है. कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकती. वहीं, बाल विवाह में केवल 15 दिन से 2 साल की सज़ा पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए. सुप्रीम ने केंद्र से कहा, क्या ये कठोर सज़ा है ? कोर्ट ने कहा ये कुछ नहीं है. कोर्ट ने कहा, कठोर सज़ा का मतलब IPC कहता है, IPC में कठोर सज़ा मृत्यु दंड है. दरअसल केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि बाल विवाह करने पर कठोर सजा का प्रावधान है.  मामले की सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी.

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