क्या अदालतें अर्जेंट मामलों की सुनवाई के लिए चौबीसों घंटे खुल सकती हैं? इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट्स को नोटिस भेजा है. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस बात पर सहमति जताई कि क्या कोई ऐसा प्रोटोकॉल बनाया जा सकता है, जिससे जीवन या स्वतंत्रता के अधिकार के लिए खतरे वाले जरूरी मामलों की सुनवाई कोर्ट के सामान्य कामकाज के समय के बाद भी की जा सके.
इस मुद्दे पर वकील महेरविश रेन ने एक याचिका दाखिल की थी. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने उनकी याचिका पर नोटिस जारी किया. कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे से निपटने के लिए एक संभावित SOP पर हाई कोर्ट्स को नोटिस जारी किया जाए.
याचिका में क्या मांग की गई?
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, रेन ने अपनी याचिका में मांग की थी कि एक ऐसा सिस्टम बनाया जाए, ताकि देर रात गिरफ्तारी, सुबह-सुबह तोड़ फोड़ या वीकेंड पर डिपोर्टेशन का सामना कर रहे नागरिक समय का इंतजार किए बिना संवैधानिक उपायों का लाभ उठा सकें. याचिका में कहा गया है कि मौजूदा व्यवस्था में न्यायिक उपायों तक पहुंच काफी हद तक तय अदालती समय, कामकाजी दिनों और सीमित वेकेशन बेंच तक ही सीमित है.
याचिका में कहा गया है कि आजादी और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में लोगों को अक्सर रात, वीकेंड, सार्वजनिक छुट्टियों और कोर्ट की छुट्टियों के दौरान कोई प्रभावी न्यायिक उपाय नहीं मिल पाता है. इसमें ऐसे मामलों में समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई है. अन्य मांगों के अलावा, याचिकाकर्ता ने मौलिक अधिकारों से जुड़े जरूरी मामलों की सुनवाई के लिए उपयुक्त प्रक्रियाएं या रोस्टर बनाने की मांग की है, ताकि नियमित अदालती समय के बाद भी सुनवाई हो सके.
याचिका में ऐसे जरूरी मामलों की सुनवाई के लिए 'इमरजेंसी कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच' या तय ड्यूटी जजों की नियुक्ति की भी मांग की गई है. याचिका में कहा गया है कि ऐसी बेंच तक डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए भी पहुंचा जा सके.
याचिकाकर्ता रेन ने कहा, 'अगर मैं शाम 6 बजे के बाद किसी बहुत जरूरी मामले के लिए कुछ फाइल करती हूं... तो अगली सुबह मेरा क्लर्क रजिस्ट्री के सामने जाकर बताता है कि यह कितना जरूरी है. जरा याचिकाकर्ता के बारे में सोचिए. मैं जीवन और आजादी से जुड़े मामलों पर काम कर रही हूं.'
यह भी पढ़ेंः तलाक दिए बगैर शादी करने पर दूसरे पति से गुजारा भत्ता मांग सकती है महिला? हाई कोर्ट ने समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता की मांगों से सुप्रीम कोर्ट ने भी सहमति जताई. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक सिस्टेमैटिक सॉल्यूशन पर विचार करने की अपनी इच्छा दिखाई.
कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि क्या कोर्ट के चौबीसों घंटे खुले रहने का गलत इस्तेमाल गैर-जरूरी मामलों की सुनवाई के लिए भी किया जा सकता है. यह तब हुआ जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह तय करना मुश्किल है कि किन मामलों की सुनवाई रेगुलर वर्किंग आवर्स के अलावा अर्जेंट बेसिस पर की जानी चाहिए.
मेहता ने कहा, 'अगर कल, मैं रात 11 बजे, अगली सुबह लगभग 9 बजे सुनवाई के लिए एक याचिका दायर करता हूं, तो बेंच आधी रात को इसकी सुनवाई कैसे कर सकती है? तब भी, अर्जेंसी को बांटना मुश्किल है. इसे एडमिनिस्ट्रेटिव साइड से हैंडल किया जा सकता है.'
मामले में हाई कोर्ट्स को नोटिस जारी करने से पहले CJI कांत ने कहा कि इसका गलत इस्तेमाल भी किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ जीवन और स्वतंत्रता के मामलों के लिए होना चाहिए.
यह भी पढ़ेंः किशोरों के बीच प्रेम संबंधों में POCSO के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं