- IIT कानपुर में जनवरी 2024 में 25 साल के पीएचडी छात्र रामस्वरूप इशराम ने मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या की थी.
- पिछले दो सालों में देश के 23 आईआईटी में करीब 65 छात्रों ने आत्महत्या की, जिनमें से नौ मामले IIT कानपुर के हैं
- केंद्र सरकार ने आईआईटी कानपुर में बढ़ती आत्महत्या घटनाओं की समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की है.
कानपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) में 20 जनवरी को 25 साल के एक पीएचडी स्टूडेंट रामस्वरूप इशराम ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी. उन्होंने उस बिल्डिंग की छठी मंजिल से कथित तौर पर छलांग लगा दी थी, जिसमें वो अपने परिवार के साथ रहते थे. संस्थान के अर्थ साइंसेज विभाग में शोध छात्र इशराम राजस्थान के चुरू जिले के रहने वाले थे. एक महीने के अंदर यह आईआईटी कानपुर कैंपस छात्र की आत्महत्या का दूसरा मामला था.पुलिस ने शुरुआती जांच के आधार पर इसे मानसिक तनाव का मामला बताया था. इससे पहले पिछले साल 29 दिसंबर को आईआईटी कानपुर में ही बीटेक फाइनल ईयर के स्टूडेंट जय सिंह मीणा ने भी आत्महत्या कर ली थी.आईआईटी जैसे देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या के बढ़ते मामले चिंता का विषय हैं. इस पर सुप्रीम कोर्ट भी चिंता जता चुका है.
आईआईटी कानपुर में छात्रों की आत्महत्या के बढते मामलों ने केंद्र सरकार चिंतित है. केंद्र सरकार ने संस्थान में आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं की समीक्षा करने और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सुझाव देने के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया है. इस कमेटी को मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण सहायता को बढ़ाने के उपाय के सुझाव देने के लिए भी कहा गया है. इस कमेटी के प्रमुख राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी फोरम (एनईटीएफ) के प्रमुख अनिल सहस्त्रबुद्धे,दिल्ली के एक अस्पताल के मनोचिकित्सक जितेंद्र नागपाल और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव (उच्च शिक्षा) रीना सोनोवाल कौली को शामिल किया गया है. सरकार ने कमेटी को 15 दिन में रिपोर्ट देने को कहा है.
आईआईटी में आत्महत्या के बढ़ते मामले
अंग्रेजी अखबार 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की एक खबर के मुताबिक छात्रों के आत्महत्या के मामले में आईआईटी कानपुर सबसे आगे हैं.
आईआईटी के पूर्व छात्रों के एक समूह के आंकडों के मुताबिक जनवरी 2021 से दिसंबर 2025 के बीच देशभर के आईआईटी में करीब 65 छात्रों ने आत्महत्या की.इनमें से 30 मामले पिछले दो सालों में सामने आए हैं. इनमें से नौ मामले अकेले आईआईटी कानपुर में दर्ज किए गए. यह देश के कुल 23 आईआईटी में सबसे अधिक हैं. इस दौरान आईआईटी खड़गपुर में आत्महत्या की सात घटनाएं दर्ज की गई हैं. वहीं आईआईटी बाम्बे में आत्महत्या का केवल एक मामला सामने आया है. जबकि छात्रों के मामले में वह आईआईटी कानपुर से आगे हैं. वहीं आईआईटी मद्रास में पिछले दो सालों में आत्महत्या का एक भी मामला सामने नहीं आया है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक 2023 में भारत में छात्रों की आत्महत्या के 13 हजार से अधिक मामले दर्ज किए गए.आईआईटी जैसे संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर विशेषज्ञों का कहना है कि संस्थान इन मामलों को निजी या पढ़ाई-लिखाई के तनाव के तौर सामान्यीकरण कर देते हैं, जबकि असल कारण कहीं ज्यादा गहरे हैं. इन कारणों में छात्रों पर लगातार मूल्यांकन का दबाव, तगड़ा कंपटीशन, अकेलापन और कुछ मामलों में जाति या भाषा के आधार पर भेदभाव भी शामिल है. विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि खतरे के शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, छात्रों को संस्थागत मदद तब मिलती है, जब हालात गंभीर हो चुके होते हैं.
भारत में आत्महत्या के कारण हर साल एक लाख से अधिक जानें जाती हैं. आत्महत्या की प्रवृत्ति 15-29 आयु के लोगों में सबसे अधिक है. इस आयु वर्ग में होने वाली मौतों के कारणों में आत्महत्या पहले नाम पर है. 1990 में पूरी दुनिया में आत्महत्या से होने वाली मौतों में भारत या योगदान 25.3 फीसदी था.यह 2016 में बढ़कर 36.6 फीसदी हो गया था.
सुप्रीम कोर्ट का दखल
मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने दिल्ली पुलिस को आईआईटी दिल्ली में दो छात्रों की मौत के मामले में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था. मृत छात्रों के परिजनों ने संस्थान के शिक्षकों और कर्मचारियों पर जाति के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाया था. बड़े शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्याओं के बढ़ते आंकड़ो को देखते हुए अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एस रविंद्र भट के नेतृत्व में एक नेशनल टास्क फोर्स (एनटीएफ) का गठन किया था. एनटीएफ का काम छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर विचार-विमर्श करने, छात्रों के आत्महत्या के मामलों को कम करने के लिए सुझाव देना और उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के लिए सहायता प्रणालियों को मजबूत बनाना है. एनटीएफ ने पिछले साल तीन दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. टास्क फोर्स ने बताया है कि उसके सर्वे में शामिल 65 फीसदी से अधिक संस्थानों में मानसिक समस्याओं के इलाज की सुविधा नहीं है. इसके अलावा कई संस्थानों में ऐसी नीति है, जहां स्टूडेंट्स को बकाया फीस के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है, खासकर उस समय जब सरकार की ओर से फीस जमा करने में देरी होती है.
अदालत ने उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों की आत्महत्याओं या अप्राकृतिक मौत की सभी घटनाओं की सूचना पुलिस को देना अनिवार्य बनाया था. अदालत ने कहा था कि छात्रों की ये आत्महत्याएं केवल मानसिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित चिंता का विषय नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक, आर्थिक और अन्य कारकों के कारण भी हो सकती हैं. इसके साथ ही अदालत ने इन संस्थानों में स्कालरशिप के सभी लंबित मामलों का भुगतान चार महीने में करने का आदेश दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया है
एनटीएफ की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कई दिशा-निर्देश दिए हैं. अदालत ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो को अपनी सालाना रिपोर्ट में उच्च शिक्षण संस्थानों में स्टूडेंट्स की आत्महत्याओं के ट्रेंड का अध्ययन करने में मदद करने के लिए छात्र आत्महत्याओं की कैटेगरी में स्कूल जाने वाले छात्रों और उच्च शिक्षा के छात्रों के बीच अंतर करने को कहा है. अदालत ने कहा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या या अप्राकृतिक मौत की घटना की जानकारी मिलते ही उसकी जानकारी पुलिस को देनी चाहिए. अदालत ने कहा कि छात्रों में क्लासरूम, डिस्टेंस या ऑनलाइन मोड से पढ़ाई कर रहे छात्र भी शामिल हैं.
इसके अलावा आवासीय उच्च शिक्षण संस्थानों में 24 घंटे योग्य मेडिकल सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए, अगर कैंपस में नहीं, तो स्टूडेंट्स को इमरजेंसी मेडिकल हेल्थ सपोर्ट देने के लिए एक किलोमीटर के दायरे में यह सुविधा होनी चाहिए. अगर सरकारी और प्राइवेट उच्च शिक्षण संस्थानों में फैकल्टी (टीचिंग और नॉन-टीचिंग) की कमी है तो चार महीने में भरा जाए. इसमें हाशिए पर पड़े और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित पदों को प्राथमिकता दी जाए. केंद्र और राज्य सरकारें आरक्षण के तहत आने वाले फैकल्टी की भर्ती के लिए विशेष भर्ती अभियान चला सकते हैं.
उच्च शिक्षण संस्थानों को किन नियमों का पालन करना है
इसके साथ ही अदालत ने उच्च शिक्षण संस्थानों को उन सभी नियमों का पालन करने को कहा है, जो उन पर लागू होता है. इनमें शामिल है, रेगुलेशन ऑन कर्बिंग द मेनेस ऑफ रैगिंग इन हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस, 2009,प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस) रेगुलेशंस, 2012; प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल ऑफ सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमेन एम्प्लॉईज एंड स्टूडेंट्स इन हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस) रेगुलेशंस, 2016, रिड्रेसल ऑफ ग्रीवेंस ऑफ स्टूडेंट्स) रेगुलेशंस, 2023 आदि. इनके अलावा एंटी-रैगिंग कमेटियों और एंटी-रैगिंग स्क्वॉड, एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर, इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटियों और स्टूडेंट ग्रीवेंस रिड्रेसल कमेटियों की स्थापना और संबंधित शिकायत निवारण तंत्र के लिए बताई गई प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए. अदालत ने एनटीएफ से एक मॉडल 'सुसाइड प्रिवेंशन एंड पोस्टवेंशन प्रोटोकॉल' बनाने के लिए भी कहा है. इसमें रैगिंग, यौन उत्पीड़न आदि सहित सभी मुद्दों का समाधान खोजना है.
देश में आत्महत्या के मामलों में कमी लाने के लिए सरकार भी सक्रिय है. केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2022 में'राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति' की घोषणा की थी. इसमें 2030 तक आत्महत्या मृत्यु दर में 10 फीसदी की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है. सरकार और सुप्रीम कोर्ट की कोशिशें कितनी कामयाब होती हैं, इसका पता आने वाले सालों में ही चल पाएगा.
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