- महाराष्ट्र की शिवसेना (यूबीटी) में सांसदों के बीच नेतृत्व तक पहुंच और संवाद की कमी को लेकर असंतोष बढ़ रहा है.
- 2022 की विधायक बगावत जैसी ही शिकायतें सांसदों में भी सुनाई दे रही हैं, जो संगठन की कमजोरी दर्शाती हैं.
- स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे का संगठन में सक्रियता कम होने से दूरी बढ़ी है.
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर 2022 जैसी बेचैनी महसूस की जा रही है. फर्क सिर्फ इतना है कि उस वक्त शिवसेना के विधायक एकनाथ शिंदे के साथ चले गए थे और अब चर्चा सांसदों के संभावित पलायन की हो रही है. दिल्ली से मुंबई तक 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इस संकट की घड़ी में उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे कहा हैं और क्या पूरी लड़ाई अब केवल संजय राउत के भरोसे लड़ी जा रही है
राजनीति में धारणा कई बार वास्तविकता से भी ज्यादा प्रभावशाली होती है. मौजूदा घटनाक्रम में भी यही हो रहा है. पार्टी के सांसदों के शिंदे गुट के संपर्क में होने की खबरों के बीच मीडिया में सबसे ज्यादा दिखाई देने वाला चेहरा संजय राउत का है. हर आरोप का जवाब, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस, हर राजनीतिक पलटवार राउत कर रहे हैं. दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे अपेक्षाकृत कम मुखर दिखाई दे रहे हैं. यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या पार्टी का वास्तविक राजनीतिक प्रबंधन अब राउत के हाथों में केंद्रित हो गया है?
सांसदों की नाराजगी का मूल कारण क्या है?
शिवसेना (यूबीटी) के भीतर पिछले कुछ समय से एक शिकायत लगातार सुनाई देती रही है- 'नेतृत्व तक पहुंच नहीं है.' कई सांसदों और नेताओं का मानना रहा कि पार्टी में निर्णय प्रक्रिया सीमित लोगों के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है. सांसदों को अपने क्षेत्रीय मुद्दों, संगठनात्मक समस्याओं और राजनीतिक रणनीति पर सीधे नेतृत्व से संवाद करने के पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे थे. यही शिकायत 2022 की बगावत के दौरान भी सामने आई थी, जब एकनाथ शिंदे खेमे ने आरोप लगाया था कि पार्टी में संवाद की जगह दरबारी संस्कृति ने ले ली है.
सबसे दिलचस्प बात यह है कि चार साल पहले विधायकों ने जो आरोप लगाए थे, लगभग वही बातें अब सांसदों के असंतोष की खबरों में भी सुनाई दे रही हैं. यदि विधायक और सांसद दोनों अलग-अलग समय में एक जैसी शिकायतें कर रहे हैं, तो यह केवल राजनीतिक प्रचार नहीं बल्कि संगठनात्मक कमजोरी का संकेत भी माना जा सकता है.
क्या स्थानीय निकाय चुनावों ने बढ़ाई दूरी?
मुंबई महानगरपालिका, ठाणे, नवी मुंबई, कल्याण-डोंबिवली और अन्य स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारियों के बीच पार्टी के भीतर यह चर्चा भी रही कि उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे अपेक्षित स्तर पर संगठनात्मक मोर्चे पर सक्रिय नहीं दिखाई दिए. शिवसेना की राजनीति हमेशा से बूथ स्तर के नेटवर्क और स्थानीय नेतृत्व पर आधारित रही है. लेकिन कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि शीर्ष नेतृत्व का जमीनी संवाद पहले की तुलना में कम हुआ है. परिणामस्वरूप स्थानीय नेताओं और सांसदों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी. यही कारण है कि जब पार्टी पर संकट आया, तब कई नेता नेतृत्व की बजाय अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता करते दिखाई दिए.
आदित्य ठाकरे: लोकप्रिय चेहरा, लेकिन क्या संगठन पर पकड़ कमजोर?
इसमें कोई दो राय नहीं कि आदित्य ठाकरे आज भी ठाकरे परिवार का सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं. युवा वर्ग में उनकी स्वीकार्यता है और वे लगातार राज्यभर में सभाएं करते रहे हैं. लेकिन राजनीतिक लोकप्रियता और संगठनात्मक नियंत्रण दो अलग-अलग चीजें हैं. 2022 की बगावत के बाद आदित्य ठाकरे ने आक्रामक राजनीति का चेहरा बनने की कोशिश की. लेकिन वे विधायकों के असंतोष को रोक नहीं पाए. अब सांसदों के बीच उठ रही नाराजगी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आदित्य का प्रभाव जनसभाओं तक सीमित है या संगठन के भीतर भी उतना ही मजबूत है?
राज्यसभा चुनाव और राउत-आदित्य समीकरण
पार्टी के भीतर एक और चर्चा लंबे समय से चलती रही है. संजय राउत और आदित्य ठाकरे के बीच राजनीतिक शैली का अंतर. राज्यसभा चुनावों और उम्मीदवारों की दावेदारी के दौरान दोनों खेमों के समर्थकों के बीच अलग-अलग संकेत देखने को मिले थे. सार्वजनिक तौर पर कभी किसी ने मतभेद स्वीकार नहीं किए. लेकिन पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर चर्चाएं लगातार होती रहीं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शिवसेना (यूबीटी) में आज तीन शक्ति केंद्र दिखाई देते हैं- उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे और संजय राउत. संकट तब पैदा होता है जब संगठन को यह स्पष्ट नहीं होता कि अंतिम राजनीतिक संदेश किस केंद्र से आ रहा है.
संकट में सिर्फ संजय राउत क्यों दिख रहे हैं?
मौजूदा घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यही है. जब सांसदों की टूट की चर्चा शुरू हुई, जब "ऑपरेशन टाइगर" की अटकलें तेज हुईं, जब पार्टी की संसदीय बैठक में सांसदों की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी. हर मौके पर मीडिया के सामने संजय राउत ही दिखाई दिए. राउत ने भाजपा, शिंदे गुट और बागी सांसदों पर लगातार हमला बोला. उन्होंने पार्टी का बचाव किया, कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की कोशिश की और राजनीतिक नैरेटिव को नियंत्रित करने का प्रयास किया. लेकिन इसी के साथ एक नया सवाल भी पैदा हुआ. यदि पार्टी के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे हैं और भविष्य के नेता आदित्य ठाकरे माने जाते हैं, तो फिर इस संकट की सबसे अग्रिम लड़ाई केवल संजय राउत क्यों लड़ रहे हैं?
क्या यह केवल जिम्मेदारियों का बंटवारा है या फिर पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन में कोई बड़ा बदलाव हो रहा है. यही सवाल इस पूरे सियासी घटनाक्रम के केंद्र में है. 2022 में विधायकों की बगावत और 2026 में सांसदों की बगावत की चर्चाओं के बीच एक समान पैटर्न साफ नजर आता है. नेतृत्व तक पहुंच में कमी, संवाद का अभाव और संगठन के भीतर बढ़ता असंतोष. भले ही उद्धव ठाकरे के पास ठाकरे नाम की मजबूत राजनीतिक विरासत हो और आदित्य ठाकरे युवा नेतृत्व के रूप में पहचान रखते हों, लेकिन आज की राजनीति केवल लोकप्रियता से नहीं चलती. इसके लिए संगठन में लगातार संवाद, सक्रियता और स्पष्ट दिशा जरूरी होती है. वर्तमान समय में शिवसेना (यूबीटी) के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा या शिंदे गुट नहीं, बल्कि अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास को फिर से कायम करना है. अब महाराष्ट्र की राजनीति में मुद्दा सिर्फ ‘ऑपरेशन टाइगर' तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि असली सवाल यह बन गया है कि संकट के समय पार्टी का नेतृत्व कौन कर रहा है—उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे या फिर वह चेहरा जो लगातार मीडिया के सामने आकर पार्टी की लड़ाई लड़ रहा है, यानी संजय राउत. आने वाले दिनों में इस सवाल का जवाब ही शिवसेना (यूबीटी) के भविष्य की दिशा तय करेगा.
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