महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों 'ऑपरेशन टाइगर' सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है. यह सिर्फ दलबदल या जोड़-तोड़ की कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एकनाथ शिंदे की वो महत्वाकांक्षी और रणनीतिक चाल है, जिसके जरिए वो महायुति के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत को एक नए मुकाम पर पहुँचाने की मंशा रखते हैं.
'ऑपरेशन टाइगर' का बड़ा उद्देश्य उद्धव ठाकरे गुट और कांग्रेस के बचे-खुचे मजबूत नेताओं, सांसदों और विधायकों को अपने पाले में लाना है. यह ऑपरेशन रातों-रात नहीं हुआ. इसकी नींव पिछले कई महीनों से गुपचुप तरीके से रखी जा रही थी.
इस ऑपरेशन की सुगबुगाहट काफी समय से थी, लेकिन यह खुलकर बीते साल 20 से 24 जनवरी के बीच सामने आया, जब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उद्योग मंत्री उदय सामंत दावोस वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम गए हुए थे. उद्धव गुट के नेता संजय राउत ने दावा किया था कि एकनाथ शिंदे और उदय सामंत के बीच फूट पड़ने वाली है और सामंत 20 विधायकों के साथ अलग हो सकते हैं.
सांसद-विधायक तोड़ने की कोशिश!
इस दावे से भड़के उदय सामंत ने ऐलान किया कि उनके और शिंदे के बीच कोई फूट नहीं है, बल्कि इसके उलट वे 'ऑपरेशन टाइगर' चला रहे हैं और इसके तहत आने वाले कुछ ही दिनों में उद्धव गुट के कई पदाधिकारी, पूर्व विधायक और सांसद शिंदे की शिवसेना में शामिल होंगे. यह कोशिशें महायुति सरकार बनने के बाद से ही चल रही थीं. अब 6 सांसदों के अलावा चर्चा उद्धव की पार्टी के 20 में से कुल 16 विधायकों को तोड़ने की भी है!
शिंदे खुद को और अपनी पार्टी को महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की असली शिवसेना के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. पहले चरण में कोंकण और पश्चिम महाराष्ट्र, और उसके बाद उत्तर महाराष्ट्र, विदर्भ और मराठवाड़ा में शिंदे अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ाना चाहते हैं. उद्धव ठाकरे के इर्द-गिर्द बचे मजबूत चेहरों को तोड़कर उन्हें मनोवैज्ञानिक और संख्यात्मक रूप से कमजोर करना खास लक्ष्य दिखता है.

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दिल्ली से मिल गई सहमति!
दिलचस्प ये है की महाराष्ट्र में कोई भी बड़ा राजनीतिक फेरबदल बिना दिल्ली हाईकमान खासकर अमित शाह और पीएम मोदी की सहमति के संभव नहीं है. सांसदों को तोड़ने के लिए उन्हें टिकट की गारंटी और भविष्य की सुरक्षा का भरोसा देना पड़ता है. एकनाथ शिंदे के दिल्ली दौरों और शीर्ष नेतृत्व अमित शाह से सीधे संपर्क का मुख्य उद्देश्य क्या इसी गारंटी पर मुहर लगवाना था?
हाल के महीनों में एकनाथ शिंदे के लगातार और अचानक होने वाले दिल्ली दौरों को लेकर कई कयास लगाए जा रहे थे. अब यह साफ है कि ये दौरे महज प्रशासनिक या रूटीन नहीं थे, बल्कि 'ऑपरेशन टाइगर' की ब्लूप्रिंट दिल्ली दरबार में ही फाइनल की जा रही थी. शिंदे सांसदों को तोड़ने और उन्हें सेटल करने के लिए केंद्रीय नेतृत्व के आशीर्वाद की जरूरत थी, जो खबर है कि सीधे अमित शाह से बातचीत के बाद ही संभव हो सका.
BJP मंत्री गिरीश महाजन ने भी 'ऑपरेशन टाइगर' की पुष्टि करते हुए पहले कहा था कि जो नेता आ रहे हैं, उनका भरोसा पीएम मोदी, अमित शाह, देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे पर है. यह स्पष्ट करता है कि यह पूरा ऑपरेशन दिल्ली और बीजेपी के पूर्ण समर्थन से चला. पाला बदलने वाले नेताओं के मन में सबसे बड़ा डर अपने राजनीतिक भविष्य और केंद्रीय एजेंसियों की जांच का होता है. उद्धव गुट के नेताओं का पेंच यह था कि क्या उन्हें महायुति जहां पहले से ही बीजेपी, शिंदे और अजित पवार गुट हैं उसमें अपनी जगह और क्या उन्हें विकास कार्यों के लिए फंड मिलेगा?

बीजेपी से क्या मिला है भरोसा?
आरोप लगे कि उद्धव गुट में नेताओं को विकासात्मक और संगठनात्मक ताकत नहीं मिल रही थी. चर्चा गर्म है कि शिंदे गुट और बीजेपी ने इन नेताओं को उनके क्षेत्रों के लिए भारी फंड, रुके हुए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी और सुरक्षित राजनीतिक भविष्य का भरोसा दिया.
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शिंदे को भी होगा फायदा
ये भी तय है की अगर 'ऑपरेशन टाइगर' सफल हुआ तो महायुति में एकनाथ शिंदे का कद भी कई गुना बढ़ जाएगा, सांसदों की संख्या बढ़ने से वे बीजेपी और अजित पवार गुट के सामने अपनी शर्तें मजबूती से रख सकेंगे. यह साबित कर देंगे कि वे केवल बीजेपी के सहारे नहीं हैं, बल्कि उनके पास अपना एक मजबूत जनाधार और नेताओं को आकर्षित करने की क्षमता है.
'ऑपरेशन टाइगर' के सफल होने का सीधा असर महायुति के आंतरिक समीकरणों पर पड़ेगा. अब तक शिंदे को बीजेपी के आश्रित के तौर पर देखने की जो राजनीतिक धारणा थी, वह टूट जाएगी. मजबूत संख्या बल के साथ शिंदे अब गठबंधन में अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में शायद दिखेंगे
महायुति में अजित पवार गुट की एंट्री के बाद शिंदे गुट में जो असहजता थी, वह इस ऑपरेशन से दूर हो सकती है . सांसदों की बढ़ती फौज शिंदे को गठबंधन का बड़ा क्षेत्रीय चेहरा बना देगी. उद्धव को फिर तोड़ने की ये कोशिश शिंदे को महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करेगी जिसे अब दिल्ली भी नजरअंदाज नहीं कर सकती. ऑपरेशन टाइगर केवल सांसदों को जोड़ने की कवायद नहीं थी, बल्कि यह एकनाथ शिंदे का अपना राजनीतिक वजूद कायम करने और महायुति की ड्राइविंग सीट पर बैठने का एक मास्टरस्ट्रोक साबित करने की बड़ी कोशिश रही.

2029 के चुनाव पर नजर!
कुल मिलाकर शिंदे की नजर केवल मौजूदा राजनीतिक समीकरणों पर नहीं बल्कि 2029 विधानसभा चुनाव से पहले बिग ब्रदर BJP के साथ सीट बंटवारे में अपनी स्थिति और मजबूत करना भी है
और फायदा NDA के खाते में इस तरह से पहुंचेगा कि एनडीए सरकार लोकसभा में भविष्य के महत्वपूर्ण विधेयकों, विशेष रूप से डिलिमिटेशन से जुड़े प्रस्तावों को लेकर अपनी संख्या और मजबूत कर पाएगी, अगर उद्धव गुट के सांसद एनडीए के समर्थन में आते हैं, तो NDA को बड़ी मदद मिलेगी.
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