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शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद: सुप्रीम कोर्ट में उद्धव गुट का दावा, चुनाव आयोग ने दस्तावेज सही से नहीं देखे

शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट की ओर से कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए.

शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद: सुप्रीम कोर्ट में उद्धव गुट का दावा, चुनाव आयोग ने दस्तावेज सही से नहीं देखे
शिवसेना विवाद में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
NDTV
  • सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद मामले की सुनवाई में उद्धव गुट की ओर से कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा
  • कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग पर दस्तावेजों की जांच में लापरवाही का आरोप लगाया
  • सिब्बल ने कहा कि पार्टी ने सभी आवश्यक जानकारियां चुनाव आयोग को दी थीं और उप-नेता निर्वाचित थे, मनोनीत नहीं

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद मामले की सुनवाई हुई. उद्धव ठाकरे गुट (UBT) की ओर से सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा और चुनाव आयोग (ECI) की प्रक्रिया पर सवाल उठाए. सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग ने दस्तावेजों को ठीक से देखा ही नहीं और यह कह दिया कि उसके पास पार्टी का नवीनतम संविधान नहीं है.

RP Act की धारा 29A का हवाला

सिब्बल ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) की धारा 29A का हवाला देते हुए कहा कि कानून के तहत पार्टी के नाम, मुख्य कार्यालय, पदाधिकारियों या पते में किसी भी बदलाव की जानकारी चुनाव आयोग को देना अनिवार्य है. उन्होंने कहा कि शिवसेना (UBT) ने आयोग को सभी आवश्यक जानकारियां दी थीं, लेकिन इसके बावजूद अनावश्यक विवाद खड़ा किया गया. सिब्बल ने कहा कि आयोग यह नहीं कह सकता कि उसे 2018 के संविधान की जानकारी नहीं थी, क्योंकि भेजे गए पत्रों में 'शिवसेना पक्ष प्रमुख' का स्पष्ट उल्लेख था.

क्या बोले सीजेआई?

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने कहा कि जब तक कोई बदलाव नहीं होता, तब तक चुनाव आयोग को सूचित करने की जरूरत नहीं होती. इस पर सिब्बल ने कहा कि UBT गुट ने कानून के तहत जो भी जरूरी था, वह किया. उनका आरोप था कि चुनाव आयोग ने दस्तावेजों को ठीक से देखा ही नहीं और यह कह दिया कि उसके पास पार्टी का नवीनतम संविधान नहीं है.

'उप-नेता निर्वाचित थे, मनोनीत नहीं'

सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग का यह दावा गलत है कि सभी उप-नेता मनोनीत थे. उन्होंने कहा कि उप-नेता निर्वाचित थे और इसकी जानकारी आयोग को दी गई थी. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बागी गुट ने अपनी तरफ से 'पक्ष प्रमुख' के पद में बदलाव किया, जबकि पार्टी संविधान के अनुसार यह पद चुनावी प्रक्रिया के जरिए तय होता है.

2018 के संविधान का हवाला

सिब्बल ने अदालत को बताया कि 2018 में पार्टी की सामान्य सभा में 12 उप-नेता मनोनीत किए गए थे, जबकि 21 पदाधिकारी निर्वाचित हुए थे. उन्होंने कहा कि संबंधित दस्तावेज पर 4 अप्रैल की तारीख है और उस पर निर्वाचन आयोग की मुहर भी लगी हुई है. सिब्बल ने तर्क दिया कि 2018 में सबके सामने हुई कार्यवाही के दस्तावेजों में बाद में हेरफेर का सवाल ही नहीं उठता.

जस्टिस बागची के सवाल

जस्टिस बागची ने पूछा कि फरवरी में नेताओं की संख्या में बदलाव हुआ था, क्या उस संबंध में निर्वाचित सदस्यों के नामों की जानकारी आयोग को दी गई थी? इस पर सिब्बल ने जवाब दिया कि पार्टी ने मनोनीत और निर्वाचित, दोनों तरह के पदाधिकारियों की जानकारी निर्वाचन आयोग को दी थी। उन्होंने कहा कि पार्टी का संविधान भी आयोग को सौंपा गया था.

जब जस्टिस बागची ने कहा कि दूसरी तरफ का दावा है कि यह दस्तावेज बाद में तैयार किया गया था, तब सिब्बल ने जवाब दिया कि दस्तावेज पर चुनाव आयोग की मुहर लगी हुई है. अगर आयोग को लगता है कि दस्तावेज बाद में तैयार किया गया था, तो उसे इस मामले में कार्रवाई करनी चाहिए.

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