- सतपाल महाराज ने बद्रीनाथ मंदिर में शंख बजाने पर प्रतिबंध की वजह बताई है जो जानवर की हड्डी से जुड़ी है.
- चारधाम महापंचायत ने शंख और धार्मिक परंपराओं संबंधी बयान पर उनकी अध्ययन योग्यता पर सवाल उठाए हैं.
- शंख का प्राचीन धार्मिक महत्व है और भगवान कृष्ण ने भी शंख की ध्वनि का प्रयोग किया था.
बद्रीनाथ में DJ विवाद में अब उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की एंट्री ने मामला और गरमा दिया है. उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज विवादित बयान देते हुए कहा कि शंख को बद्रीनाथ मंदिर में इसलिए नहीं बजाया जाता है क्योंकि वह एक जानवर की हड्डी का बना होता है. सतपाल महाराज ने बद्रीनाथ में संगीत और साउंड को लेकर उठ रहे सवालों को सिरे से खारिज कर दिया. सतपाल महाराज ने कहा कि बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने के दौरान मिलिट्री बैंड और शंख बजाया जाता है. महाराज ने बद्रीनाथ धाम की पौराणिक महत्ता का जिक्र करते हुए कहा कि यहां नर और नारायण पर्वत विराजमान हैं और यहां की पूजा पद्धति परम वैष्णव पद्धति है. सतपाल महाराज ने कहा कि मंदिर परिसर के बाहर शंख बजाने पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है. यह हमारी पूजा पद्धति की विशेषता है, प्रतिबंध नहीं.
चारधाम महापंचायत ने सतपाल महाराज के अध्ययन पर उठाए सवाल
महाराज के इसी बयान को लेकर अब चारधाम महापंचायत ने सवाल खड़े किए हैं. खास बात यह है कि विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब बद्रीनाथ में हुए कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर पहले से ही धार्मिक संगठनों में नाराजगी है. चारधाम महापंचायत के महासचिव बृजेश सती ने सतपाल महाराज के ज्ञान और अध्ययन पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि महाराज को शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन करना चाहिए और इस तरह के बयान देने से पहले अपने सलाहकारों से चर्चा करनी चाहिए.
बद्रीनाथ धाम में नहीं रही शंख बजाने की परंपरा
वहीं स्थानीय बुजुर्गों और बद्रीनाथ धाम की परंपराओं से परिचित लोगों के अनुसार बद्रीनाथ में शंख बजाने की परंपरा नहीं रही है. बद्रीनाथ धाम के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल का मानना है कि शंख का प्रयोग सामान्यतः भगवान के आह्वान के लिए किया जाता है, जबकि बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु साक्षात विराजमान हैं, इसलिए यहां आह्वान के लिए शंख बजाने की आवश्यकता नहीं मानी जाती. स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार बद्रीनाथ क्षेत्र का संबंध माता वृंदा और तुलसी से भी जोड़ा जाता है. मान्यता है कि वृंदा ने यहां तपस्या की थी और आज भी बद्रीनाथ क्षेत्र के आसपास के पर्वतीय भूभाग में तुलसी की उपस्थिति को इसी धार्मिक आख्यान से जोड़ा जाता है. इसी कथा में शंखचूड़ का भी उल्लेख मिलता है, जिन्हें पूर्व जन्म में सुदामा से संबंधित माना जाता है. पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल ने कहा कि स्थानीय मान्यता के अनुसार शंखचूड़ और वृंदा की कथा तथा भगवान विष्णु से जुड़े प्रसंगों के कारण बद्रीनाथ धाम में शंख वादन से परहेज किया जाता है. कुछ स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में बद्रीनाथ मंदिर परिसर में शंख बजते हुए नहीं देखा हालांकि इन मान्यताओं के अलग-अलग धार्मिक आख्यान और स्थानीय संस्करण प्रचलित हैं इसलिए बद्रीनाथ धाम में शंख वादन को लेकर किसी भी निष्कर्ष को मंदिर की आधिकारिक परंपरा, धार्मिक ग्रंथों और बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अधिकृत पक्ष के संदर्भ में देखना उचित होगा.
शंख का प्रयोग प्राचीन परंपरा, कृष्ण ने किया था इस्तेमाल
श्री पंचायती महानिर्माणी अखाड़ा के अध्यक्ष रविंदर पूरी ने कहा कि शंख का प्रयोग भारत की प्राचीन परंपरा रही है. कोई भी मंगल और शुभ कार्य जब हम करते हैं तो शंख की ध्वनि करते हैं. भगवान श्री कृष्ण ने भी स्वयं 'पांचजन्य' शंख के द्वारा उद्घोष किया था और आज भी जब जन्माष्टमी होती है तो भगवान का जो बाल स्वरूप विग्रह है, उसका शंख के अंदर जल, पंचामृत, दूध आदि से अभिषेक होता है और आज भी प्रातः काल और संध्या काल में शंख की ध्वनि बजाई जाती है. इसे अगर आयुर्वेदिक दृष्टि से देखें तो जो व्यक्ति शंख का उद्घोष करता है, उसके फेफड़ों का व्यायाम होता है. हालांकि शंख समुद्र का जीव ही है.
शंखचूड़ नाम का एक राक्षस था, जानें शंख को लेकर क्या रही है परंपरा
शंख का उल्लेख शास्त्रों में भी आता है.शंखचूड़ नाम का एक राक्षस था इसलिए कई जगह इसे प्रतिबंधित भी किया जाता है. जैसे भगवान शिव के अभिषेक में शंख का प्रयोग नहीं होता. विष्णु आदि अनेक देवताओं की पूजा में शंख का प्रयोग होता है. अगर कोई व्यक्ति इस प्रकार की भाषा बोलता है कि शंख का प्रयोग नहीं करना चाहिए तो यह बिल्कुल शास्त्र के विरुद्ध है. शंख का इस्तेमाल प्राचीन काल से ही हमारी पूजा पद्धति में होता है. सारा संसार ही पंचभौतिक है और शंख में हड्डी मामले को लेकर कहना चाहता हूं कि शंख स्वयं एक जीव है. वो जीव का जब प्राण त्याग देता है तो उसे शुद्ध करके प्रयोग किया जाता है, जैसे बारहसिंगा से सींगी यानी शृंगी से भगवान शिव का अभिषेक होता है. उसके बाद बाघांबर है, मृगछाला है तो ये उसका शुद्धिकरण करके पूजा-पाठ में प्रयोग करने की एक प्राचीन परंपरा ऋषियों की और धर्म में रही है तो इसमें किसी प्रकार का कोई दोष नहीं है.बद्रीनाथ धाम के लिए कहा जाता है कि भगवान विष्णु (नर-नारायण रूप में) संसार के कल्याण और धर्म की स्थापना के लिए यहां ध्यान की मुद्रा में मौजूद हैं. बद्रीनाथ चार धाम में से एक है और यहां विष्णु भगवान के ही रूप बद्रीनारायण की मूर्ति है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं