समाजवादी पार्टी ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड में एक बड़ा दांव चल दिया है. पार्टी ने उत्तराखंड की कमान 35 साल के महंत शुभम गिरी को सौंप दी है. इसकी घोषणा बुधवार को की गई थी. इसे सपा की बीजेपी को धर्म की राजनीति के मोर्चे पर मात देने और अपना आधार बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव एक साथ 2027 में होने हैं. विधानसभा चुनाव से पहले सपा ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है.
उत्तराखंड में समाजवादी कोशिश
सपा ने एक साल पहले ही उत्तराखंड में अपनी सभी इकाइयों को भंग कर दिया था. उसी के बाद से पार्टी अपने नए अध्यक्ष की तलाश कर रही थी. उसकी तलाश महंत शुभम गिरी के रूप में पूरी हुई है. वो हरिद्वार के ही रहने वाले हैं और पिछले काफी समय से सपा से जुड़े हुए हैं. वो साधु-संतों के बीच में काफी सक्रिय रहते हैं.
उत्तराखंड के गठन के बाद समाजवादी पार्टी राज्य में कोई राजनीतिक कमाल नहीं दिखा पाई है. अलग उत्तराखंड राज्य के निर्माण के दौरान हुए रामपुर तिराहा कांड सपा पर एक दाग की तरह चिपका रहा. हालांकि राज्य पहाड़ी इलाकों को छोड़कर मैदानी इलाके में सपा थोड़ा बहुत अच्छा प्रदर्शन करती रही है. सपा ने 2004 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार लोकसभा सीट पर जीत भी दर्ज की थी. सपा के टिकट पर राजेंद्र कुमार बाड़ी जीते थे. उसके बाद सपा यह प्रदर्शन नहीं दोहरा पाई थी. वहीं अगर पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो सपा ने राज्य की 70 में से 54 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे कहीं जीत नहीं मिली थी. उसे केवल एक सीट पर तीसरा स्थान मिला था. सपा ने उस चुनाव में 0.3 फीसदी वोट हासिल किए थे.
— Samajwadi Party (@samajwadiparty) January 21, 2026
समाजवाद बनाम धर्म की राजनीति
ऐसे में सपा ने एक साधु को प्रदेश की कमान सौंप कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वो अब समाजवादी राजनीति के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी रखती है. इसी तरह से वो उत्तर प्रदेश में इन दिनों अपने पीडीए (पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक) के साथ धार्मिक आधार पर भी ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है. इसी रणनीति का हिस्सा है कि सपा प्रमुख लगातार उत्तराखंड के ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के प्रयागराज के माघ मेले में चल रहे धरने का समर्थन कर रहे हैं. उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से टेलीफोन पर बात कर अपना समर्थन भी दोहराया था.
उत्तराखंड का मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही होता आया है. राज्य गठन के बाद से हुए चुनावों में किसी तीसरे दल की जगह बनती कभी नहीं दिखाई दी है, यहां तक कि अलग उत्तराखंड राज्य की मांग की शुरूआत करने वाली उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) भी चुनाव में कभी ऐसा प्रदर्शन नहीं कर पाया, जिससे लगे कि राज्य में किसी तीसरे दल की जरूरत है. यूकेडी का वर्तमान विधानसभा में कोई सदस्य नहीं है. उसने अबतक सबसे अधिक चार सीटें 2002 में हुए राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में जीती थीं. उत्तराखंड की राजनीति में सपा से बड़ा वोट बैंक बसपा का है. साल 2022 के विधानसभा चुनाव बसपा ने भी 54 सीटों पर जीता था. उसे दो सीटों पर जीत और 4.9 फीसदी वोट मिले थे.
इस राजनीतिक हालात में उत्तराखंड में एक साधु को कमान सौंपना यह दिखाता है कि वह राज्य में हिंदुत्व की राह पर बढ़ते हुए एक विकल्प देने की कोशिश कर रही है. इसलिए उसने उसी हरिद्वार के एक नेता का चुनाव किया है, जहां उसे 2004 के लोकसभा चुनाव में जीत मिली थी. अब यह आने वाला समय ही बताएगा कि सपा अपनी इस कोशिश में कितनी कामयाब होती है.
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