राजस्थान में नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पालिकाओं के चुनाव परिणाम आने के बाद अब मेयर और चेयरमैन चुनने की जंग शुरू हो गई है. राजनीतिक दल अपने-अपने बोर्ड बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं. इसी बीच फिर से प्रदेश की राजनीति में रिजॉर्ट पॉलिटिक्स चर्चा के केंद्र में आ गई है. इस बार पार्टियों की चिंता और बढ़ गई है क्योंकि स्थानीय निकाय चुनावों में दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होता. ऐसे में पार्षद मतदान के समय अपनी इच्छा से वोट कर सकते हैं. यही वजह है कि हर वोट की कीमत बढ़ गई है और पार्टियां कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं हैं.
आंकड़ों ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल
राजस्थान के 10 नगर निगमों में जयपुर, कोटा, उदयपुर और भीलवाड़ा में बीजेपी के पास स्पष्ट बहुमत है. बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस को बहुमत मिला है. वहीं भरतपुर, जोधपुर, अजमेर, अलवर और पाली में निर्दलीय पार्षद किंगमेकर की भूमिका में हैं. पाली और अजमेर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है जबकि अलवर में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. 47 नगर परिषदों में बीजेपी 13 और कांग्रेस 7 परिषदों में स्पष्ट बहुमत के साथ आगे है. बाकी 27 नगर परिषदों में सत्ता का फैसला निर्दलीयों और अन्य पार्षदों की भूमिका पर निर्भर है. इसके अलावा 252 नगर पालिकाओं में से 142 में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. बीजेपी 68 नगर पालिकाओं में सबसे बड़ी पार्टी है जबकि कांग्रेस 42 नगर पालिकाओं में सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है.

रिजॉर्ट में आकर रुक रहे पार्षद और नेता
अजमेर में सबसे बड़ा सियासी रोमांच
अजमेर नगर निगम का घटनाक्रम सबसे ज्यादा चर्चा में है. यहां कांग्रेस के 37 पार्षदों को शहर से बाहर ले जाया गया है. पार्टी को आशंका है कि मतदान से पहले उसके पार्षदों में सेंध लगाई जा सकती है.
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस नेता धर्मेंद्र राठौड़ इन पार्षदों को लेकर कर्नाटक के किसी अज्ञात स्थान पर गए हैं. इन पार्षदों से न तो फोन पर संपर्क हो पा रहा है और न ही उनकी कोई तस्वीर या वीडियो सामने आया है. कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि वे अब मतदान के दिन ही सामने आएंगे.
80 वार्ड वाले अजमेर नगर निगम में कांग्रेस के पास 37 पार्षद हैं. कुछ निर्दलीयों के समर्थन से वह बोर्ड बनाने की स्थिति में है. मेयर चुनाव के लिए उसे चार निर्दलीयों के समर्थन की जरूरत होगी. दूसरी ओर बीजेपी के पास 32 पार्षद हैं और वह भी पूरी सक्रियता से समीकरण साधने में जुटी है.

जयपुर में भी बहुमत के बावजूद सतर्क बीजेपी
जयपुर नगर निगम में बीजेपी के पास 78, कांग्रेस के पास 57 और निर्दलीयों के पास 15 सीटें हैं. संख्या बल के हिसाब से बीजेपी मजबूत स्थिति में है लेकिन इसके बावजूद पार्टी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती. जानकारी के अनुसार बीजेपी के 78 पार्षद जयपुर-अजमेर हाईवे स्थित एक रिजॉर्ट में ठहरे हुए हैं. पार्टी ने पहले प्रशिक्षण कार्यक्रम के नाम पर पार्षदों को एकत्र किया और बाद में उन्हें रिजॉर्ट में रखा गया.
मोहम्मद रईस ने बढ़ाया सियासी सस्पेंस
जयपुर के जालूपुरा वार्ड 109 के निर्दलीय पार्षद मोहम्मद रईस हाल के दिनों में चर्चा का बड़ा विषय बने हुए हैं. पहले उनकी बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के साथ मुलाकात और लड्डू खाते हुए तस्वीरें सामने आईं. इससे उनके बीजेपी में जाने की चर्चा शुरू हो गई. लेकिन अगले ही दिन उन्होंने वीडियो जारी कर कहा, "मैं कांग्रेस के साथ हूं. बीजेपी के साथ मेरा जो वीडियो आया था, वह मेरी भूल थी." हालांकि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का दावा है कि मोहम्मद रईस बीजेपी के साथ ही हैं. इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि पार्टियां एक-एक वोट को लेकर कितनी गंभीर हैं.

बीकानेर में बहुमत के बाद भी कांग्रेस सतर्क
बीकानेर नगर निगम की 80 सीटों में कांग्रेस के पास 42 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत है. बीजेपी के पास 27 सीटें हैं जबकि 11 सीटें निर्दलीयों और अन्य के खाते में हैं. इसके बावजूद कांग्रेस ने अपने सभी 42 पार्षदों को जैसलमेर के एक रिजॉर्ट में भेज दिया है. कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी उसके पार्षदों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है.
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा, "मुझे बीकानेर से जानकारी मिली है कि वे कांग्रेस के पार्षदों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं. जैसे जोधपुर में हमारे सात पार्षदों को बीजेपी ले गई है और हर उम्मीदवार को दो करोड़ रुपये दिए जा रहे हैं."

जोधपुर में कांटे की टक्कर
100 सदस्यीय जोधपुर नगर निगम में बीजेपी के 45 और कांग्रेस के 44 पार्षद हैं. यहां पूरा खेल 11 निर्दलीयों और अन्य सदस्यों पर टिका हुआ था. शुक्रवार सुबह 11 निर्दलीयों ने बीजेपी को समर्थन देने की घोषणा कर दी. इसके बाद दोनों पार्टियों ने अपने-अपने पार्षदों को सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया. सूत्रों के मुताबिक बीजेपी के पार्षद नाकोड़ा जी के जैन तीर्थ स्थल के पास एक होटल में हैं. वहीं कांग्रेस के पार्षद मंडोर क्षेत्र के एक होटल में ठहरे हुए हैं.
पुलिस कार्रवाई पर भी सियासी संग्राम
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि पुलिस उन पार्षदों तक पहुंच रही है जिनके वोट से चुनावी नतीजे प्रभावित हो सकते हैं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने दावा किया कि जैसलमेर सहित कई स्थानों पर पुलिस बिना वैध कारण के पहुंची और जांच के नाम पर पार्षदों पर दबाव बनाया गया.
उन्होंने कहा, "ऐसी 20 जगहें हैं जहां पुलिस बिना किसी वैध कारण के पहुंची है—मंडावा, नागौर, देवली-उनियारा, बानसूर और बीकानेर समेत कई जगहों पर. पुलिस यह कहकर पहुंचती है कि उन्हें चेक करना है. आरोप लगाया जाता है कि हम उम्मीदवारों को उनकी इच्छा के खिलाफ यहां लाए हैं. कहा जाता है कि गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज हुई है और हम जांच करने आए हैं. फिर पूछा जाता है—क्या आप अपनी मर्जी से यहां हैं? अगर उन्हें विवाद की गुंजाइश दिखती है तो वे उम्मीदवार को खुले तौर पर अपने साथ ले जाते हैं और बीजेपी को सौंप देते हैं. यह अभूतपूर्व है. यह लोकतंत्र की हत्या है."
कुचेरा के मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "अगर उम्मीदवार और उसकी पत्नी अपनी इच्छा से वहां हैं तो पुलिस क्यों वहां पहुंची ? एक रिश्तेदार , उमीदवार के साले ने कंप्लेंट करि और पुलिस वहां पहुँची , इसका क्या मतलब है पति पत्नी के बीच में साले का या लेना देना है , मैंने इससे बात को लेकर वरिष्ठ पुलिस अफसरों से भी बात की है , ये लोक तंत्र की हत्या है , मैंने ट्विटर पे इसका फोटो डाला है कुचेरा का "

सरकार ने आरोपों को बताया निराधार
राज्य के गृह मंत्री जवाहर सिंह बेढम ने कांग्रेस के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है. उन्होंने कहा, "कांग्रेस हताश और निराश है, इसलिए वह तरह-तरह के आरोप लगा रही है. लोग अपनी इच्छा से बीजेपी में शामिल हो रहे हैं और पुलिस अपना काम कर रही है. अगर कोई रिश्तेदार पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराता है कि उसका रिश्तेदार या परिवार का सदस्य लापता है, तो क्या पुलिस का काम जांच करना नहीं है?" उन्होंने आगे कहा, "अगर कोई व्यक्ति लापता है या उसे उसकी इच्छा के खिलाफ कहीं रखा गया है और हम उसकी जांच नहीं करते, तो आप इसे क्या कहेंगे?"
आखिर इतनी भागदौड़ क्यों?
राजस्थान की इस पूरी सियासी कहानी की सबसे बड़ी वजह दल-बदल विरोधी कानून का स्थानीय निकाय चुनावों में लागू नहीं होना है. मतदान के समय कोई भी पार्षद पार्टी लाइन से अलग जाकर वोट कर सकता है. यही कारण है कि चुनाव परिणाम आने के बाद भी राजनीतिक लड़ाई खत्म नहीं हुई है. रिजॉर्ट में निगरानी, निर्दलीयों पर नजर और हर वोट को बचाने की रणनीति जारी है. राजस्थान में अब असली मुकाबला चुनाव जीतने का नहीं बल्कि बोर्ड बनाने का है और इसका अंतिम फैसला मतदान के दिन ही सामने आएगा.
यह भी पढ़ें- राजस्थान निकाय चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस में घमासान, अशोक गहलोत ने पार्टी पर ही उठाए सवाल
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं