राहुल गांधी 56 साल के हो गए हैं और उनका जन्मदिन बड़े धूमधाम से कांग्रेस दफ्तर में मनाया गया. इसी अवसर पर यह भी बात करनी जरूरी है कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के सामने क्या चुनौतियां हैं. राहुल गांधी के झोली कुछ सफलता हैं तो कुछ नाकामियां भी हैं.
2022-2023 में उनकी भारत जोड़ो यात्रा ने राजनीतिक रूप से उनकी छवि एकदम बदल दी और उसका फायदा कांग्रेस को चुनाव में हुआ. कांग्रेस को लोकसभा में 99 सीटें मिली और राहुल गांधी विपक्ष के नेता बने. विपक्ष के नेता के रूप में उनके प्रदर्शन पर सबकी निगाहें लगातार बनी रहती है. मगर हाल के दिनों में राहुल गांधी ने जिस तरह के फैसले लिए हैं उसकी काफी चर्चा है. सबसे पहले केरल में वी डी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला जबकि विधायक के सी वेणुगोपाल के पक्ष में बताए जा रहे थे. फिर तमिलनाडु में डीएमके को छोड़ कर एक्टर विजय की पार्टी टीवीके के साथ सरकार में शामिल होना.
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— Congress (@INCIndia) June 19, 2026
अलग वोट बैंक तैयार करते की रणनीति में जुटे राहुल गांधी
हालांकि राहुल गांधी के इस निर्णय पर बहुत बात की गई कि किस तरह से इंडिया गठबंधन ने अपना एक महत्वपूर्ण सहयोगी खो दिया है. उसके बाद राहुल गांधी का ममता बनर्जी के साथ खड़ा होना और उनके कहने पर इंडिया गठबंधन की मीटिंग बुलाना. इसके बाद राहुल गांधी का नीट की परीक्षा पर छात्रों के बीच जा कर संवाद करना. कहने का मतलब है कि राहुल गांधी इन युवाओं में अपनी स्वीकार्यता बढ़ा कर कांग्रेस के लिए एक अलग वोट बैंक तैयार करने में जुटे हैं.
छात्रों की बात करके वे उनके माता-पिता तक भी पहुंच सकते हैं. जैसा कि कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने एनडीटीवी से कहा, "देश के सामने चुनौतियां हैं. राहुल गांधी जिस संघर्ष को लेकर आगे बढ़ रहे हैं वो देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. पूरे देश के युवा उन्हें एक ऐसे इंसान की तरह देखते हैं जो उनकी उम्मीदों को बढ़ाना चाहता है. शिक्षा-परीक्षा प्रणाली पर लोगों का भरोसा टूट चुका है. लोगों के मन में असमंजस है. राहुल गांधी उसका मुकाबला करने के लिए, बड़ी ताकतों से लड़ने के लिए और लोगों को न्याय दिलाने का काम कर रहे हैं. उनकी मेहनत ज़रूर रंग लाएगी. सबने उनको शुभकामनाएं दी और कहा कि आपके संघर्ष में पूरा देश आपके साथ है."
राहुल गांधी के सामने क्या-क्या चुनौतियां?
ये सब तो ठीक है मगर राहुल गांधी के सामने चुनौतियां भी कम नही है. हर राज्य में पार्टी में गुटबाजी जैसे मध्यप्रदेश ,राजस्थान ,पंजाब , छत्तीसगढ़, बिहार. इसके चलते कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा है. अभी संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मध्यप्रदेश और झारखंड में हार गए. झारखंड में आरजेडी ने बिहार राज्यसभा चुनाव के तीन विधायकों द्वारा वोट ना करने का बदला लिया.
कहने का मतलब है कि कांग्रेस की सहयोगी दल भी उसे गाहे बगाहे आंख दिखाने से नहीं डरते. राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता पंजाब और राजस्थान में पार्टी में नई जान फूंकने की होगी और आगे आने वाले दिनों में इन राज्यों में संगठन में बदलाव भी होने वाले हैं. इसके साथ ही उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस किस तरह से समझौता करके 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ती है यह भी सबकी निगाहों में है.
जबकि कांग्रेस मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा ने एनडीटीवी से कहा, "देश की नौजवान पीढ़ी की चुनौतियां हम अपने ऊपर लेते हैं. हमारी जिम्मेदारी है कि हम चुनौतियों का सामना करेंगे और युवाओं के मन में जो अवसाद है उससे हम लड़ेंगे."
राहुल गांधी ने दक्षिण भारत में कांग्रेस के लिए ठीक-ठाक इंतजाम कर लिया है मगर उत्तर के राज्य खासकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़,राजस्थान, पंजाब, उत्तरप्रदेश, बिहार और गुजरात उनके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है. अगले साल पंजाब,उत्तरप्रदेश,उत्तराखंड,गोवा,मणिपुर और बाद में हिमाचल और गुजरात में होने वाले हैं. उसके बाद 2028 में मध्यप्रदेश, राजस्थान, कनार्टक छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव हैं और यही कांग्रेस का भविष्य तय करेंगे. इसके बाद 2029 का लोकसभा चुनाव.मगर तब तक कांग्रेस और राहुल गांधी की दशा और दिशा तय हो चुकी होगी.
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