- तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के बीच गठबंधन के बावजूद सत्ता में साझेदारी को लेकर विवाद चल रहा है
- कांग्रेस स्टालिन सरकार में छह मंत्री पदों की मांग कर रही है जबकि डीएमके ने इनकार कर दिया है
- विजय की पार्टी टीवीके कांग्रेस को अधिक सीटें देने और सत्ता में साझेदारी का प्रस्ताव दे रही है
अप्रैल–मई में होने वाले 5 विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस आलाकमान ने बैठकों का सिलसिला शुरू कर दिया है. शनिवार शाम राहुल गांधी और खरगे तमिलनाडु कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ अहम बैठक करेंगे जिसके बाद उम्मीद की जा रही है कि तमिलनाडु को लेकर कांग्रेस की भावी रणनीति को लेकर जारी सस्पेंस खत्म हो सकता है.
दरअसल तमिलनाडु में करीब दो दशक से कांग्रेस का डीएमके के साथ गठबंधन है. लेकिन अब प्रदेश कांग्रेस में कुछ नेता अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके के साथ गठबंधन करने की पैरवी कर रहे हैं. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या कांग्रेस नई पार्टी के लिए पुराने सहयोगी से किनारा डीएमके से किनारा कर पाएगी? बहरहाल हम आपको बताते हैं कि कांग्रस–डीएमके के बीच पेंच कहाँ फँसा है और टीवीके की तरफ़ कांग्रेस नेता उम्मीद से क्यों देख रहे हैं?
सीट बंटवारा और सत्ता में भागीदारी का पेंच
दरअसल, तमिलनाडु में डीएमके, कांग्रेस समेत अन्य सहयोगी दलों के साथ गठबंधन केवल चुनाव तक सीमित रखती है, सरकार में साझेदार नहीं बनाती. लेकिन अब चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस सत्ता में भागीदारी की मांग कर रही है. सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस स्टालिन सरकार में कम से कम छह मंत्री पद चाहती है. हालांकि डीएमके के नेता साफ़ कर चुके हैं कि कांग्रेस को सरकार में शामिल करने की गुंजाइश नहीं है.
डीएमके का ऑफ़र 19 , कांग्रेस की मांग 35 : सूत्र
सत्ता में बंटवारे के साथ–साथ सीटों के बंटवारे को लेकर भी कांग्रेस डीएमके में बात नहीं बन पा रही. 2021 के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 25 सीटें मिली थी. इस बार कांग्रेस को ज़्यादा सीटों की उम्मीद थी. लेकिन सूत्रों के मुताबिक डीएमके केवल 19 सीटें कांग्रेस को दे रही है. दूसरी तरफ कांग्रेस डीएमके को पहले के चुनावों का हवाला देकर कहीं ज़्यादा सीटें मांग रही है.
2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 41, 2011 में 63 और 2006 में 48 सीटें मिली थी. सूत्रों के मुताबिक़ 2026 के चुनाव में कांग्रेस डीएमके से करीब 35 सीटें हासिल करना चाहती है. हालांकि कांग्रेस में मोलभाव 60–70 सीटों से करना शुरू किया गया था. कांग्रेस की कोशिश थी कि 15 दिसंबर तक सीट बंटवारे का फ़ार्मूला तय हो जाए लेकिन उस डेडलाइन के महीने भर बाद भी बात नहीं बनी है.
विजय की टीवीके कांग्रेस को क्यों भा रही है?
दूसरी तरफ़ कांग्रेस के उच्च सूत्रों का कहना है कि टीवीके ना केवल कांग्रेस को 60 से ज़्यादा सीटें देने को बल्कि सरकार बनने पर सत्ता में साझेदार बनाने को भी तैयार है.
कांग्रेस के सर्वे में टीवीके मजबूत
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के सर्वे में टीवीके को तीस प्रतिशत वोट मिलता नजर आ रहा है. जाहिर है कांग्रेस को लगता है कि विजय की लोकप्रियता के सहारे वो तमिलनाडु में डीएमके के "चंगुल" से निकल पाएगी. विजय की लोकप्रियता दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भी है. वो ईसाई धर्म से ताल्लुक रखते हैं. उनके सहारे कांग्रेस को केरल के ईसाई वोटों को साधने में भी मदद मिल सकती है.
विजय के साथ खुलकर आए राहुल गांधी
हाल में ही राहुल गांधी ने सेंसर बोर्ड में अटकी विजय की फ़िल्म जन नायकन के समर्थन में सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए पीएम मोदी पर निशाना साधा. इससे पहले करूर भगदड़ के बाद राहुल गांधी ने विजय से फ़ोन पर बात की थी. राहुल गांधी के करीबी नेता प्रवीण चक्रवर्ती ने कुछ समय पहले ना केवल विजय से मुलाकात की थी बल्कि डीएमके सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर खुल कर सवाल उठाए.
कांग्रेस आलाकमान का रूख टीवीके के पक्ष में?
कांग्रेस नेतृत्व के करीबी सूत्रों की मानें तो वो उस पार्टी के साथ जाना बेहतर समझते हैं जहां कांग्रेस को बेहतर "डील" मिले. हालांकि प्रदेश के ज्यादातर नेता “राजनीतिक सुविधा” के मद्देनजर डीएमके का साथ जरूरी मानते हैं. जाहिर है तमिलनाडु कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ राहुल गांधी और खरगे की शनिवार को होने वाली बैठक में डीएमके के साथ सीट बंटवारे और सत्ता में साझेदारी के मुद्दे पर चर्चा होगी. साथ ही टीवीके के साथ गठबंधन का मुद्दा भी बैठक में उठ सकता है. इस बैठक में टीवीके को लेकर कांग्रेस आलाकमान के रूख को लेकर कुछ संकेत मिलने की उम्मीद है.
हालांकि, डीएमके जैसे पुराने सहयोगी को छोड़ कर नया प्रयोग कर पाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा. जानकारों का मानना है कि टीवीके के बहाने कांग्रेस डीएमके पर बस दबाव बना रही है. तमिलनाडु में कांग्रेस का अपना जनाधार नहीं बचा है. डीएमके की बदौलत ही बीते दो लोकसभा चुनाव में यूपीए/इंडिया गठबंधन ने क्लीन स्वीप किया था. केंद्र की सियासत के लिहाज से कांग्रेस के लिए डीएमके काफ़ी अहम है. ऐसे में कांग्रेस आलाकमान राज्य में पार्टी के हितों की क़ुर्बानी कर सकता है. तमिलनाडु में 1967 के बाद से कांग्रेस अपना सीएम नहीं बना पाई है. देखना होगा कि डीएमके से मोलभाव में कांग्रेस को कुछ फ़ायदा होता है या फिर इस बार कांग्रेस तमिलनाडु में नया प्रयोग करती है?
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