- पंजाब चुनाव में 117 सीटों पर अकेले लड़ने की तैयारी के बीच पार्टियों को अपना संगठन बूथ स्तर तक मजबूत करना होगा.
- आम आदमी पार्टी और बीजेपी से मुकाबले से पहले उसे अपने गुटों और बड़े नेताओं के बीच एकता साबित करनी होगी.
- आम आदमी पार्टी को 5 साल का हिसाब देना होगा, तो अकाली दल को अपनी खोई जमीन और पंथक आधार वापस हासिल करना पड़ेगा.
पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है. चुनाव आयोग ने अभी चुनावी बिगुल नहीं बजाया है. लेकिन पंजाब 2027 की जंग शुरू हो चुकी है. फर्क सिर्फ इतना है कि फिलहाल यह लड़ाई वोटर के दरवाजे तक नहीं पहुंची है. अभी यह राजनीतिक पार्टियों के अंदर ही लड़ी जा रही है.
इस शुरुआती हलचल में एक दिलचस्प बात देखने को मिल रही है. इस समय पंजाब की राजनीतिक पार्टियां सिर्फ वोटरों को अपने पक्ष में करने की कोशिश नहीं कर रही हैं. सबसे पहले वे अपने ही कार्यकर्ताओं को सक्रिय, अनुशासित और कुछ मामलों में फिर से एकजुट करने में जुटी हैं.
वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता अब पंजाब का दौरा कर रहे हैं. बूथ कमेटियों को सक्रिय किया जा रहा है. रैलियां फिर से शुरू हो रही हैं और संगठन की बैठकें लगातार बढ़ रही हैं. चुनाव अभी दूर है, लेकिन चुनाव से पहले की तैयारी यानी कैंपेन से पहले का कैंपेन शुरू हो चुका है.
यही पंजाब 2027 की पहली बड़ी जंग हो सकती है.
बीजेपी के सामने सबसे बड़ा सवाल संगठन का विस्तार
भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी के लिए संदेश खास तौर पर साफ है. बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष ने पंजाब में दो दिन का दौरा किया और पटियाला, बठिंडा, लुधियाना, जालंधर और अमृतसर में जोनल बैठकें कीं. पार्टी का कहना है कि वह पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तैयारी बूथ स्तर तक पहुंच गई है. बीजेपी पंजाब में अपने संगठन को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा गहराई तक ले जाने पर काम कर रही है.

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष
राजनीतिक तौर पर इसका काफी महत्व है.
कई दशकों तक पंजाब में बीजेपी की राजनीतिक मौजूदगी शिरोमणि अकाली दल यानी बादल के साथ उसके गठबंधन से काफी हद तक जुड़ी रही. बीजेपी की ताकत मुख्य रूप से शहरी सीटों पर थी, जबकि अकाली दल गठबंधन के ग्रामीण और पंथक वोटों का बड़ा हिस्सा संभालता था.
अगर बीजेपी सच में सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ना चाहती है, तो उसे उन इलाकों में भी मजबूत संगठन खड़ा करना होगा जहां वह कभी अपने सहयोगी अकाली दल पर काफी निर्भर रहती थी.
इसलिए बीएल संतोष का पंजाब दौरा सिर्फ एक वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता का दौरा नहीं था. यह पार्टी कैडर के लिए एक संदेश था: ऐसे तैयारी करो जैसे चुनाव में कोई सहयोगी तुम्हारा बोझ उठाने वाला नहीं है.
हालांकि, अकेले चुनाव लड़ने की सार्वजनिक चर्चा के बावजूद बीजेपी और SAD के बीच संभावित समझौते की अटकलें अभी भी जारी हैं.
यही बीजेपी के सामने पहली आंतरिक चुनौती है. क्या उसका कैडर सच में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर सकता है, जबकि गठबंधन की संभावना पंजाब की राजनीति में अब भी चर्चा का हिस्सा बनी हुई है?

कांग्रेस की समस्या संगठन नहीं, नेताओं की एकजुटता
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामने लगभग उलटी समस्या है. उसके पास पहले से संगठन है. उसके वरिष्ठ नेताओं के अपने-अपने मजबूत स्थानीय आधार हैं और पारंपरिक वोट बैंक भी है. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नेता एक साथ मिलकर काम कर पाएंगे?
पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल ने जिलों का दौरा किया है और पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर संगठन को सक्रिय करने की कोशिश की है.
अब एक बड़ी राजनीतिक यात्रा की तैयारी हो रही है. राहुल गांधी के राज्यव्यापी बस यात्रा में शामिल होने की उम्मीद है. प्रस्तावित योजना के मुताबिक, वह सबसे पहले अमृतसर स्थित श्री दरबार साहिब यानी गोल्डन टेंपल में माथा टेकेंगे. इसके बाद यात्रा के शुरुआती चरण में अमृतसर से हुसैनीवाला तक का सफर किया जाएगा.
कागज पर यह पंजाब के लोगों तक पहुंचने की कोशिश है. लेकिन राजनीतिक तौर पर यह कांग्रेस के भीतर पहुंच बनाने की कोशिश भी हो सकती है.

चरणजीत चन्नी
प्रस्तावित यात्रा में प्रताप सिंह बाजवा, चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग जैसे वरिष्ठ नेता एक ही मंच पर दिखाई दे सकते हैं. यह ऐसे समय में होगा जब पार्टी के अंदर गुटबाजी और नेताओं के बीच मतभेद लगातार खबरों में रहे हैं.
इससे कांग्रेस के सामने एक अलग तरह की चुनावी चुनौती खड़ी होती है. पंजाब की जनता से दोबारा सत्ता का भरोसा मांगने से पहले कांग्रेस को यह दिखाना होगा कि उसके अपने नेता एक-दूसरे पर भरोसा कर सकते हैं.
इसलिए राहुल गांधी के सामने पंजाब में पहली चुनौती AAP, बीजेपी या अकाली दल को हराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना हो सकती है कि कांग्रेस अपनी ऊर्जा कांग्रेस से लड़ने में ही खर्च न कर दे.
AAP के सामने सत्ता बचाने की चुनौती
आम आदमी पार्टी की स्थिति अलग है, क्योंकि वह इस समय पंजाब में सत्ता में है.
2022 में आम आदमी पार्टी बदलाव की जोरदार लहर पर सवार होकर सत्ता में आई थी और उसने 117 में से 92 विधानसभा सीटें जीत ली थीं.
लेकिन 2027 में उसे एक बाहरी पार्टी के तौर पर बदलाव का वादा करते हुए वोट नहीं मांगना होगा. उसे सत्ता में रहते हुए अपने पांच साल के कामकाज का हिसाब देकर जनता के सामने दोबारा समर्थन मांगना होगा.
पंजाब प्रभारी मनीष सिसोदिया जिला स्तर पर संगठन की बैठकें कर रहे हैं. वहीं सभी 117 विधानसभा क्षेत्रों में बूथ प्रभारियों की बैठकें आयोजित करने की योजना है.

अरविंद केजरीवाल के साथ मनीष सिसोदिया
पार्टी का कहना है कि इसका उद्देश्य संगठन को मजबूत करना और भगवंत मान सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को सीधे घर-घर तक पहुंचाना है.
मुख्यमंत्री भगवंत मान भी लगातार राजनीतिक रूप से सक्रिय नजर आ रहे हैं.
राज्य सरकार 28 अगस्त को बाबा बकाला के पास रईया में रखड़ पुणिया के मौके पर बड़े राज्य स्तरीय कार्यक्रम की तैयारी कर रही है. यह ऐसा धार्मिक अवसर है जहां बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं और इसका धार्मिक के साथ-साथ राजनीतिक महत्व भी है.
आम आदमी पार्टी के सामने अब चुनौती है कि वह अपने शासन को राजनीतिक संदेश में कैसे बदलती है.
सरकारी योजनाएं लोगों को फायदा पहुंचा सकती हैं, लेकिन चुनाव सिर्फ काम के आधार पर नहीं, धारणा के आधार पर भी लड़े जाते हैं.
पार्टी कार्यकर्ताओं को बताना होगा कि सरकार ने क्या काम किया है. उन्हें लोगों की नाराजगी और असंतोष का जवाब देना होगा. साथ ही उन मतदाताओं से दोबारा जुड़ना होगा जिनमें 2022 जैसा उत्साह शायद अब नहीं है.

सुखबीर सिंह बादल
अकाली दल के लिए 2027 सिर्फ चुनाव नहीं, राजनीतिक वापसी की लड़ाई
इसके बाद आता है शिरोमणि अकाली दल. अकाली दल के लिए 2027 सिर्फ एक और विधानसभा चुनाव नहीं है. यह लगातार चुनावी गिरावट के बाद अपनी राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की लड़ाई है.
उसकी 'पंजाब बचाओ' रैलियां अब एक नए चरण में पहुंच गई हैं. अगस्त और सितंबर के दौरान पूरे राज्य में रैलियों और राजनीतिक सम्मेलनों की योजना बनाई गई है.
हाल ही में नांदेड़ में हुए हमले से उबरने के बाद सुखबीर सिंह बादल फिर सक्रिय राजनीति में लौट आए हैं.
बुधवार को उन्होंने मलोट में पंजाब बचाओ रैली को संबोधित किया. वह बाबा बकाला में पार्टी के राजनीतिक सम्मेलन को भी संबोधित करने वाले हैं.
अकाली दल उस चीज को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है जो कभी पंजाब की राजनीति में उसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक थी: जमीन से जुड़ा मजबूत कैडर नेटवर्क.
लेकिन हार, अंदरूनी मतभेद और नए पंथक राजनीतिक विकल्पों के उभरने से यह नेटवर्क कमजोर हुआ है.
अकाली दल वारिस पंजाब दे भी बाबा बकाला में "पंथ बचाओ, पंजाब बचाओ" सम्मेलन की तैयारी कर रहा है. यह इस बात का उदाहरण है कि पंजाब की पंथक राजनीति की जमीन अब अपने आप SAD की नहीं रह गई है.
इसी वजह से 28 अगस्त को अमृतसर के पास बाबा बकाला में होने वाला रखड़ पुणिया सिर्फ भाषणों की वजह से महत्वपूर्ण नहीं है.
अलग-अलग राजनीतिक दल इस मौके का इस्तेमाल अपनी ताकत दिखाने के लिए करने की तैयारी में हैं.
बीजेपी उन राजनीतिक इलाकों में अपना विस्तार करना चाहती है जहां वह ऐतिहासिक रूप से अकाली दल पर काफी निर्भर रही है.
AAP के पास सरकार के कामकाज को सामने रखने का फायदा होगा.
SAD यह दिखाने की कोशिश करेगा कि उसका कैडर अब भी जिंदा और संगठित है.
वहीं वारिस पंजाब दे उभरती पंथक राजनीति की जमीन पर अपना दावा मजबूत करने की कोशिश करेगा.
एक ही जगह पर पंजाब को आने वाले चुनाव की एक झलक देखने को मिल सकती है.
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लेकिन रैली और वोट में फर्क है
हालांकि रैलियों को वोट नहीं समझना चाहिए.
बड़ी भीड़ जुटाई जा सकती है. मंच भव्य बनाया जा सकता है. कोई राष्ट्रीय नेता सुर्खियां बना सकता है. लेकिन इनमें से कोई भी चीज अपने आप चुनावी लहर में नहीं बदलती.
फिर भी कैडर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है.
एक पार्टी का कार्यकर्ता ही रैली के मंच से निकली बात को गांव तक ले जाता है. वही प्रेस कॉन्फ्रेंस के संदेश को WhatsApp ग्रुप तक पहुंचाता है और नेता के भाषण को मतदान केंद्र तक ले जाने का काम करता है.
जब चुनाव बेहद करीबी और कई पार्टियों के बीच मुकाबले वाला हो, तब मजबूत और उत्साहित स्थानीय संगठन राजनीतिक शोर और वास्तविक वोट के बीच का फर्क पैदा कर सकता है.
यही वजह है कि अभी पंजाब में इतनी राजनीतिक गतिविधियां देखने को मिल रही हैं.
बीजेपी यह देख रही है कि क्या वह पूरे पंजाब में अपने दम पर खड़ी हो सकती है.
कांग्रेस यह देख रही है कि क्या उसके नेता एक साथ खड़े हो सकते हैं.
आम आदमी पार्टी यह देख रही है कि करीब पांच साल सरकार में रहने के बाद क्या वह 2022 जैसी असाधारण ऊर्जा दोबारा पैदा कर सकती है.
वहीं अकाली दल यह देख रहा है कि क्या उसका पुराना राजनीतिक परिवार फिर से उसके साथ लौट सकता है.
चारों पार्टियों के सामने चार अलग-अलग राजनीतिक चुनौतियां हैं. लेकिन सभी का रास्ता एक ही जगह पहुंचता है.
वोटर को अपने पक्ष में करने से पहले हर बड़ी पार्टी अपने ही कैडर को सक्रिय और मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
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