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दिल्ली में फिर क्लाउड सीडिंग की तैयारी, ट्रायल के लिए IIT ने मांगी इजाजत

दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए सरकार फिर से क्लाउड सीडिंग के जरिए कृत्रिम बारिश की तैयारी कर रही है. अधिकारियों के अनुसार ट्रायल की तारीख आईआईटी कानपुर तय करेगा.

दिल्ली में फिर क्लाउड सीडिंग की तैयारी, ट्रायल के लिए IIT ने मांगी इजाजत
  • दिल्ली सरकार प्रदूषण कम करने के लिए अप्रैल से जून 2026 तक क्लाउड सीडिंग ट्रायल करने की अनुमति मांग रही है
  • क्लाउड सीडिंग तकनीक से बारिश करवा कर हवा से प्रदूषकों को कम करने की कोशिश की जाती है
  • पिछले साल अक्टूबर में दिल्ली में क्लाउड सीडिंग के दो ट्रायल किए गए थे, लेकिन वे सफल नहीं हो सके थे
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राजधानी दिल्ली हर साल प्रदूषण को झेलती है. जैसे-जैसे सर्दियां पास आती हैं दिल्ली की हवा जहरीली होना शुरू हो जाती है. इस बीच दिल्ली सरकार प्रदूषण से निजात पाने के लिए एक बार फिर से कृत्रिम बारिश यानी आर्टिफिशियल रैन का सहारा ले सकते हैं. सूत्रों ने NDTV को बताया कि IIT कानपुर ने नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) से अप्रैल और जून 2026 के बीच क्लाउड सीडिंग ट्रायल करने की अनुमति मांगी है.

प्रदूषण से राहत दिलाने की नई कोशिश

गर्मियों के लिए प्रस्तावित यह समय एक नई कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि यह परखा जा सके कि क्या मॉनसून से पहले की स्थितियां सफलता की संभावनाओं को बेहतर बना सकती हैं. इससे पहले हुए ट्रायल  राजधानी में बारिश कराने में असफल रहे थे.

पिछले साल की गई थी क्लाउड सीडिंग

क्लाउड सीडिंग प्रोजेक्ट सबसे पहले पिछले साल दिल्ली सरकार और IIT कानपुर के सहयोग से शुरू किया गया था. इसे 2025 की शुरुआत में एक MoU के जरिए औपचारिक रूप दिया गया था, जिसका उद्देश्य प्रदूषण के चरम स्तर के दौरान एक आपातकालीन उपाय के तौर पर काम करना था.

खराब मौसम और मंजूरी में महीनों की देरी के बाद, अक्टूबर 2025 के आखिर में दो दौर के ट्रायल किए गए. इस ऑपरेशन के लिए तैनात विमानों ने दिल्ली के कुछ हिस्सों में बादलों के ऊपर सिल्वर आयोडाइड, आयोडीन युक्त नमक और रॉक सॉल्ट का मिश्रण छोड़ा. इसका मकसद बारिश करवाना और हवा में मौजूद प्रदूषकों को जमीन पर बिठाने में मदद करना था. हालांकि, इस प्रयास का कोई नतीजा नहीं निकला.

क्या कह रहे एक्सपर्ट्स?

IIT कानपुर ने अपने आकलन में इस प्रयोग के असफल होने के कारण बादलों में नमी के कम स्तर को बताया. उन्होंने कहा कि उस समय बारिश के लिए स्थितियां अनुकूल नहीं थीं. एक्सपर्ट्स ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि क्लाउड सीडिंग से बादल नहीं बनाए जा सकते. यह तभी काम करता है जब बादलों का पर्याप्त जमाव और नमी मौजूद हो. इसके बाद भी, इस साल की शुरुआत में दिल्ली में एक और दौर का ट्रायल किया गया, सूत्रों ने NDTV को इसकी पुष्टि की.

हालांकि अधिकारी इस विकल्प पर विचार करना जारी रखे हुए हैं, लेकिन एक्सपर्ट क्लाउड सीडिंग को ज्यादा से ज्यादा एक अल्पकालिक और सप्लीमेंट्री तरीका मानते हैं. उनके अनुसार, यह प्रदूषण से केवल अस्थायी राहत दे सकता है और वह भी केवल अनुकूल मौसम की स्थितियों में ही.

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क्या है क्लाउड सीडिंग?

क्लाउड सीडिंग मौसम में बदलाव करने की एक तकनीक है, जिसमें मौजूदा बादलों में सिल्वर आयोडाइड या नमक जैसे पदार्थ छोड़े जाते हैं, ताकि बारिश की संभावना बढ़ाई जा सके. ये कण 'न्यूक्लिआई' का काम करते हैं, जिससे पानी की बूंदें बनने में मदद मिलती है और बारिश होती है. यह प्रक्रिया काफी हद तक वायुमंडलीय स्थितियों पर निर्भर करती है और अपने आप बादल नहीं बना सकती. इसी वजह से इसके परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं और मौसम पर निर्भर करते हैं.

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