- महाराष्ट्र सरकार ने व्यावसायिक वाहनों के चालकों के लिए मराठी भाषा सीखना अनिवार्य करने का फैसला किया है.
- परिवहन मंत्री ने चालकों के लिए मराठी भाषा कक्षाओं का आयोजन कर प्रशिक्षण की सुविधा देने की घोषणा की है.
- चालकों को मराठी सीखने के लिए छह महीने से एक साल तक की मोहलत देने पर विचार किया जाएगा.
महाराष्ट्र में व्यावसायिक वाहनों के चालकों के लिए मराठी भाषा को अनिवार्य किए जाने के मुद्दे पर सियासी हलचल तेज हो गई है. राज्य के परिवहन मंत्री ने ऑटो-टैक्सी यूनियन नेताओं, शिवसेना नेताओं और अन्य हितधारकों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की. बैठक के दौरान यूनियन प्रतिनिधियों और नेताओं ने इस नियम के सख्ती से चालकों की रोजी-रोटी प्रभावित होने की आशंका जताई. उन्होंने मांग की कि ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए कम से कम 6 महीने से एक साल का समय दिया जाए.
बैठक के बाद परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने कहा कि सरकार का रुख स्पष्ट है. मराठी सीखना अनिवार्य रहेगा, लेकिन इसके लिए सरकार खुद प्रशिक्षण की व्यवस्था करेगी. उन्होंने बताया कि ड्राइवरों के लिए विशेष मराठी भाषा कक्षाएं आयोजित की जाएंगी, ताकि वे नियमों का पालन कर सकें.
मंत्री ने यह भी घोषणा की कि इस मुद्दे पर विस्तृत रणनीति तय करने के लिए 59 आरटीओ अधिकारियों की एक आपात बैठक बुलाई गई है. इस बैठक में नियम के संभावित समय-सीमा और राहत के पहलुओं पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा. संकेत दिए गए हैं कि ड्राइवरों को दी जाने वाली मोहलत पर फैसला भी इसी बैठक में किया जा सकता है.
वहीं, परिवहन विभाग अपना नियमित अभियान जारी रखेगा, जिसके तहत व्यावसायिक चालकों के परमिट और आवश्यक दस्तावेजों की सख्त जांच की जाएगी. बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में संजय निरुपम ने कहा कि इस मुद्दे पर चर्चा सकारात्मक रही. उन्होंने बताया कि जिन ऑटो और टैक्सी चालकों को मराठी नहीं आती, उनके लाइसेंस या परमिट तत्काल रद्द नहीं किए जाएंगे. उन्हें मराठी सीखने के लिए छह महीने का समय दिया जाएगा.
निरुपम ने यह भी जानकारी दी कि परिवहन विभाग 1 मई से एक विशेष सत्यापन अभियान शुरू करेगा, जिसके तहत परमिट दस्तावेजों की जांच की जाएगी. इस दौरान यह भी जांच होगी कि कहीं किसी बांग्लादेशी या रोहिंग्या नागरिक ने अवैध तरीके से परमिट तो हासिल नहीं कर लिया है. यदि ऐसा पाया गया, तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.
मराठी भाषा को प्राथमिकता देने का मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से संवेदनशील रहा है. हाल ही में इस नियम के लागू किए जाने की घोषणा के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों के बीच मतभेद सामने आए हैं. एक ओर क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय भाषा के संरक्षण की मांग है, तो दूसरी ओर रोजगार पर पड़ने वाले असर और प्रवासी चालकों की स्थिति को लेकर चिंताएं भी जताई जा रही हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है- एक तरफ मराठी भाषा को बढ़ावा देना और दूसरी तरफ लाखों ऑटो-टैक्सी चालकों की आजीविका को सुरक्षित रखना. अब सभी की निगाहें आरटीओ अधिकारियों की बैठक पर टिकी हैं, जहां इस विवादित लेकिन अहम फैसले की दिशा तय होगी.
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