- आम तौर पर न्यूक्लियर रिएक्टर से बिजली बनाने के लिए यूरेनियम का इस्तेमाल किया जाता है, जो काफी कचरा छोड़ते हैं.
- लेकिन फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की खूबी यही है कि यह जितना ईंधन इस्तेमाल करता है उससे अधिक पैदा करता है.
- इसीलिए इसे ब्रीडर यानी पैदा करने वाला नाम दिया गया है.
कलपक्कम में स्वदेशी रूप से विकसित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) के सफलतापूर्वक निर्णायक मोड़ प्राप्त करने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई देते हुए कहा कि भारत अपने असैन्य परमाणु यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ा रहा है. चलिए आपको विस्तार से बताते हैं भारत के असैन्य परमाणु ऊर्जा के इस कार्यक्रम के बारे में और इसके अगले चरणों में क्या लक्ष्य है?
भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) वो उपलब्धि हैं जो न केवल ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाएगा बल्कि दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में भी खड़ा कर देगा जिनके पास यह उन्नत तकनीक मौजूद है.
PFBR को आसान शब्दों में समझें...
आम तौर पर न्यूक्लियर रिएक्टर से बिजली बनाने के लिए यूरेनियम का इस्तेमाल किया जाता है, जो काफी कचरा छोड़ते हैं. लेकिन फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की खूबी यही है कि यह जितना ईंधन इस्तेमाल करता है उससे अधिक पैदा करता है. इसीलिए इसे ब्रीडर यानी पैदा करने वाला नाम दिया गया है.
पीएफबीआर तीन चरणों वाले परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरा चरण है. चेन्नई के कलपक्कम में स्थित BHAVINI यानी भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड ने इसे बनाया है. इसे बनाने की योजना तो 1980 में हुई थी लेकिन वास्तविक निर्माण कार्यक्रम 2004 में शुरू हुआ. यह दुनिया के उन रिएक्टरों में से है, जिसमें कूलेंट के रूप में सोडियम का उपयोग किया गया है. सोडियम हवा या पानी के संपर्क में आते ही आग पकड़ लेता है. इसलिए इसकी इंजीनियरिंग बेहद जटिल थी. इसमें कई प्रयोग किए गए और आखिर बीते दिनों इसमें सफलता पाई गई.
6-7 अप्रैल को रिएक्टर ने क्रिटिकैलिटी पा ली, यानी रिएक्टर के अंदर परमाणु विखंडन की प्रक्रिया नियंत्रित तरीके से शुरू हो गई. यह एक इंजन के शुरू होने के जैसा है.
क्यों इतनी बड़ी सफलता मानी जा रही है?
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर, परंपरागत रिएक्टर्स की तुलना में थोड़े अलग होते हैं. परंपरागत रिएक्टर्स जहां बतौर फ्यूल यूरेनियम का इस्तेमाल करते हैं वहीं फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स फ्यूल के तौर पर प्लुटोनियम का इस्तेमाल करते हैं. साथ ही यह जितना यूरेनियम-238 फ्यूल इस्तेमाल करते हैं उससे अधिक ऊर्जा के तौर पर प्लुटोनियम-239 पैदा करते हैं. इसकी यही क्षमता इसे ऊर्जा के अक्षय पात्र के रूप में परिभाषित करती है, क्योंकि अगर ये रिएक्टर अनवरत चलता रहा तो इससे पैदा होने वाली ऊर्जा कभी खत्म ही नहीं होगी.
PFBR में अब तक कितना खर्च हुआ?
आपको बता दें कि जब यह कार्यक्रम शुरू हुआ था तब इसमें 3,500 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया था. लेकिन इसकी तकनीकी जटिलताओं के कारण न केवल इसमें समय लगता गया बल्कि इसका बजट भी बढ़ता गया. फिलहाल यह अनुमान है कि इसमें संशोधित लागत 7,700 करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है. सरकार ने इस तकनीक को भविष्य का निवेश माना है. क्योंकि यह एक प्रोटोटाइप है, तो जब एक बार यह सफल हो गया तो आगे इसके अनुरूप ही बनने वाले रिएक्टरों में लागत काफी कम हो जाएगी.
PFBR के अगले चरणों में आगे क्या-क्या होगा?
क्रिटिकैलिटी हासिल करने के बाद काम खत्म नहीं हुआ है बल्कि एक नया अध्याय शुरू हुआ है. अब अगले कुछ महीने रिएक्टर को बहुत कम पावर पर चलाया जाएगा. वैज्ञानिक यह देखेंगे कि क्या रिएक्टर का कोर और सुरक्षा प्रणालियां उम्मीद के मुताबिक काम कर रही हैं.
सोडियम हीटिंग और सर्कुलेशनः लिक्विड सोडियम के बहाव और गर्मी सोखने की क्षमता की गहन जांच की जाएगी.
टर्बाइन सिंक्रोनाइजेशनः जब रिएक्टर स्थिर हो जाएगा तो इससे निकलने वाली भाप में टर्बाइन को घुमाया जाएगा और उसे बिजली के ग्रिड से जोड़ा जाएगा. धीरे-धीरे इसकी क्षमता बढ़ाई जाएगी और इसे इसकी पूरी क्षमता 500 मेगावाट तक पहुंचाया जाएगा.
कमर्शियल ऑपरेशन: उम्मीद है कि यह जल्द ही पूरी तरह से व्यावसायिक रूप से बिजली उत्पादन शुरू कर देगा. इस परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीसरे स्टेज में, जिसमें थोरियम-बेस्ड रिएक्टर शामिल हैं, भरपूर थोरियम रिजर्व के इस्तेमाल का रास्ता साफ भी साफ होगा.
प्रधानमंत्री ने भी इससे जुड़े वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई देते हुए यही कहा कि यह उपलब्धि परमाणु कार्यक्रम के तीसरे चरण के तहत भारत के विशाल थोरियम भंडार के प्रभावी उपयोग का मार्ग प्रशस्त करती है.
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