Tribal Religion Conversion: ओडिशा के मयूरभंज जिले में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया. ‘पुनर्जन्म' जैसी परंपरा को सच कर दिखाते हुए एक पूरे परिवार ने गड्ढे से निकलकर अपने धर्म में वापसी की. किलकारी जैसी आवाजें निकालते हुए जब ये लोग बाहर आए, तो गांव में मौजूद लोग भावुक भी हुए और हैरान भी. इस अनोखी परंपरा के पीछे सदियों पुराना विश्वास और अपनी जड़ों से जुड़ने की कहानी छिपी है.
दरअसल, मयूरभंज जिले के खुंटा ब्लॉक के डुंगुरूडीही गांव में एक परिवार ने अपने मूल सारना (संताल) धर्म में लौटने का फैसला किया. लेकिन यह वापसी सामान्य तरीके से नहीं हुई. संताल समाज की परंपरा के अनुसार, इसे एक नए जन्म की तरह माना जाता है.
गड्ढे से निकलकर निभाई पुनर्जन्म की परंपरा
रिवाज के मुताबिक, परिवार के सभी सदस्यों को एक बड़े गड्ढे के अंदर भेजा गया. कुछ देर बाद वे वहां से छोटे बच्चों की तरह किलकारी मारते हुए और “कुआं-कुआं” की आवाज करते हुए बाहर निकले. यह पूरी प्रक्रिया उनके पुनर्जन्म का प्रतीक मानी जाती है. इस दृश्य को देखने वाले ग्रामीण भी आश्चर्य में पड़ गए.
नाभि काटने और शुद्धिकरण की रस्म
गड्ढे से बाहर आने के बाद परिवार के सदस्यों की पारंपरिक तरीके से “नाभि काटने” की रस्म निभाई गई. इसके बाद उन्हें घर ले जाया गया, जहां गांव वालों ने छत पर प्रहार कर शुद्धिकरण किया. घर के अंदर प्रतीकात्मक रूप से नाभि को मिट्टी में दबाया गया.
समाज से फिर जुड़ा पूरा परिवार
इसके बाद “एकईशिया” संस्कार किया गया, जिसमें पवित्र लेप और चीज़ों को परिवार के सदस्यों पर छिड़का गया. इस रस्म के बाद उन्हें दोबारा समाज और अपने धर्म में शामिल कर लिया गया. यह पल पूरे परिवार के लिए भावुक करने वाला था. अनुष्ठान के पूरा होने के बाद गांव में भोज का आयोजन किया गया. समाज को तीन हांड़िया (चावल से बनने वाला पारंपरिक पेय) अर्पित किए गए. यह परंपरा सामाजिक एकता और स्वीकार्यता का प्रतीक मानी जाती है.
क्यों छोड़ा था धर्म, फिर क्यों लौटे?
परिवार के मुखिया लेम्बु हांसदा ने बताया कि करीब पांच साल पहले वे बीमारी और निजी समस्याओं के कारण दूसरे धर्म में चले गए थे. उन्हें उम्मीद दिलाई गई थी कि इससे उनकी समस्याएं दूर हो जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
समय के साथ परिवार को अहसास हुआ कि उन्होंने अपने पूर्वजों की परंपराओं से दूरी बना ली है. इसके बाद उन्होंने अपने मूल धर्म में लौटने का फैसला किया. लेम्बु हांसदा ने कहा कि अब वे अपनी पुरानी परंपराओं और विश्वासों के साथ ही जीवन जीना चाहते हैं.
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