- वे स्वास्थ्य कारणों के अलावा लालू प्रसाद और सुशील मोदी की तरह राज्य सभा जाने की इच्छा को पूरा करना चाहते हैं
- नीतीश ने मार्च 2022 में राज्य सभा जाने की इच्छा जताई थी जबकि तब वे दो साल पहले दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे
- नीतीश कुमार बिहार में अपने अध्याय के अंत पर राज्य और देश की राजनीति में सभी सदनों के सदस्य बनेंगे
नीतीश कुमार राज्य सभा चुनाव के लिए गुरुवार सुबह ग्यारह बजे जब अपना नामांकन पत्र दायर कर रहे होंगे तब वे अपनी एक दबी इच्छा को पूरी करने की दिशा में कदम आगे बढ़ा रहे होंगे. वैसे तो उनके इस कदम ने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है कि चार महीने पहले ही अपने नाम पर प्रचंड बहुमत हासिल करने के बाद उन्होंने राज्य सभा जाने का फैसला क्यों किया. लेकिन उन्हें नजदीक से जानने वाले कहते हैं कि स्वास्थ्य कारणों के अलावा एक और कारण है जिसके चलते उन्होंने ऊपरी सदन का रास्ता चुना. वह कारण यह है कि वे लालू प्रसाद और सुशील मोदी की ही तरह राज्य सभा जाने की ख्वाहिश लंबे समय से दिल में पाले हुए थे.
नीतीश औऱ बीजेपी की पुरानी है यारी
उनकी यह ख्वाहिश 22 मार्च 2022 में खुल कर सामने आई थी. उस दिन विधानसभा में अपने कक्ष में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कहा था कि वे लोक सभा चुनाव तो नहीं लड़ेंगे लेकिन उन्हें राज्य सभा जाने से गुरेज नहीं है. तब पत्रकारों को बड़ी हैरानी हुई थी क्योंकि तब वे दो साल पहले ही 2020 में दूसरी बार लगातार मुख्यमंत्री बने थे. हालांकि तब जेडीयू का जनाधार सिकुड़ गया था और वह तीसरे नंबर की पार्टी बन गई थी. इसके बावजूद बीजेपी ने चुनाव पहले किए गए वादे के अनुसार नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया था. तब नीतीश कुमार की राज्य सभा जाने की इच्छा को किसी अन्य पद के लिए दिल्ली जाने से जोड़ कर देखा गया था.
नीतीश कुमार लालू प्रसाद और सुशील मोदी की तरह विधानसभा, विधान परिषद, लोक सभा के सदस्य रहे लेकिन उनकी तरह राज्य सभा के सदस्य कभी नहीं बने थे. विधानसभा, विधान परिषद, लोक सभा और राज्य सभा- चारों सदनों की सदस्यता का यह अद्वितीय रिकॉर्ड उनके समकक्षों में केवल लालू प्रसाद और सुशील मोदी के नाम ही है. अब राज्य सभा जाकर वे इस रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे.
लालू से तुलना में उनके मन में एक मलाल और भी रहा. वे कहते रहे कि उन्होंने कभी अपने बूते विधानसभा में बहुमत हासिल नहीं किया जैसा कि लालू प्रसाद ने किया था. 2010 में वे जरूर 117 सीटें जीते थे लेकिन यह बहुमत से पांच कम था.अब जबकि बिहार में नीतीश कुमार के अध्याय पर एक तरह से पर्दा गिर रहा है, वे राज्य और देश की राजनीति में ऐसे गिने-चुने नेताओं में रहेंगे जो सभी सदनों के सदस्य रहे हैं.
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