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This Article is From Nov 13, 2025

डर लगता है, ये लोग फिर वही करेंगे... निठारी कांड में न्याय की आस में बैठे परिवार टूट गए!

डी-5 कोठी के बाहर बैठी लक्ष्मी, जिसकी आठ साल की बेटी 2006 में गुम हुई थी, आज भी उसी सवाल के साथ जी रही है - “हमारी बच्ची का क्या क़सूर था?” लक्ष्मी कहती हैं, “हमको पुलिस से उम्मीद थी, लेकिन हमें न्याय नहीं मिला. इतने साल बीत गए, अब तो हम खुद को हारा हुआ महसूस करते हैं.”

डर लगता है, ये लोग फिर वही करेंगे... निठारी कांड में न्याय की आस में बैठे परिवार टूट गए!
निठारी कांड के दोनों आरोपी  मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली अदालत से पूरी तरह से बरी हो चुके हैं.
  • निठारी कांड 2006 में उजागर हुआ था, जब नोएडा सेक्टर-31 स्थित डी-5 कोठी के पास मानव अवशेष मिले थे.
  • जांच के बाद कोठी के मालिक कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर और उनके नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार किया गया था.
  • दोनों आरोपी मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली को अदालत ने सभी मामलों में बरी कर दिया है.
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नोएडा:

नोएडा के सेक्टर-31 के निठारी गांव में आज भी सन्नाटा पसरा है, वही सन्नाटा जो 2006 के उस खौफनाक मंजर के बाद इस गांव की पहचान बन गया था. जिस डी-5 कोठी से एक के बाद एक बच्चों के कंकाल बरामद हुए थे, आज वहां सिर्फ टूटी उम्मीदें और अधूरा न्याय बचा है. सालों से न्याय की आस में बैठे परिवार आज हताश हैं. सुप्रीम कोर्ट से राहत की उम्मीद अब टूट सी गई है. निठारी कांड के दोनों आरोपी  मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली अदालत से पूरी तरह से बरी हो चुके हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि जिन बच्चों के कंकाल इस घर से मिले… उनकी मौत का जिम्मेदार आखिर कौन है?

निठारी कांड क्या था?

निठारी कांड 2006 में उजागर हुआ था, जब नोएडा सेक्टर-31 स्थित डी-5 कोठी के पास मानव अवशेष मिले थे. यह मामला देश के सबसे भयावह अपराधों में से एक बन गया. जांच के बाद कोठी के मालिक कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर और उनके नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार किया गया. दोनों पर बच्चों और युवतियों के अपहरण, यौन उत्पीड़न, हत्या और शवों के निपटान के आरोप लगे थे.

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2011 में सुरेंद्र कोली को एक मामले में मौत की सज़ा सुनाई गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था. हालांकि, 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अन्य 12 मामलों में दोनों को बरी कर दिया, यह कहते हुए कि अभियोजन के सबूत अविश्वसनीय और जांच प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी. इसके बाद जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपीलें खारिज कर दीं.

सुरेंद्र कोली ने अपनी पुरानी दोषसिद्धि के खिलाफ क्यूरेटिव याचिका दाखिल की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में स्वीकार करते हुए उसकी सज़ा रद्द कर दी. इसके साथ ही, निठारी कांड के दोनों आरोपियों को सभी मामलों में बरी कर दिया गया.

“हम हारे हुए महसूस कर रहे हैं…”

डी-5 कोठी के बाहर बैठी लक्ष्मी, जिसकी आठ साल की बेटी 2006 में गुम हुई थी, आज भी उसी सवाल के साथ जी रही है - “हमारी बच्ची का क्या क़सूर था?” लक्ष्मी कहती हैं, “हमको पुलिस से उम्मीद थी, लेकिन हमें न्याय नहीं मिला. इतने साल बीत गए, अब तो हम खुद को हारा हुआ महसूस करते हैं.” उनका कहना है कि जांच के दौरान ग़रीब परिवारों की आवाज़ नहीं सुनी गई.

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वो बताती हैं, “2006 में जब बच्चे ग़ायब हो रहे थे, तब सबको डर लगा रहता था. कई अफवाहें फैलती थीं कोई कहता था डॉक्टर आते थे, कोई कुछ और  लेकिन सच्चाई कभी सामने नहीं आई.”

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अब फैसले के बाद लक्ष्मी कहती हैं, “हमें योगी जी से उम्मीद है कि किसी तरह हमें न्याय मिलेगा.” निठारी की गलियों में जैसे-जैसे NDTV की टीम आगे बढ़ती है, दर्द और गहराता जाता है. लोगों की आंखों में वही डर है जो 2006 में था.

“अगर मेरी बेटी ज़िंदा होती, तो आज मेरे नाती होते”

गाँव के भीतर, झब्बू और सुनीता का घर है — जो अब भी अपनी दस साल की बेटी ज्योति की तस्वीर संभाले हुए हैं. झब्बू बताते हैं, “हम पंढेर के घर के कपड़े प्रेस करते थे. हमारी ज्योति दुपट्टे का पीको कराने गई थी, फिर कभी वापस नहीं आई. उसके कपड़े और चप्पल उसी के घर से मिले.” सुनीता की आंखों में आज भी वही दर्द है, “अगर मेरी बेटी ज़िंदा होती, तो आज मेरे नाती होते. अब तो बस ऊपरवाला ही न्याय देगा.”

“डर लगता है… ये लोग फिर वही करेंगे”

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निठारी की महिलाएं अब भी कहती हैं, “2006 में डर लगता था, आज भी लगता है. जो छूट गए हैं, फिर वही कांड करेंगे. इन्हें फांसी लगनी चाहिए थी.” निठारी के लोगों के मन में आज भी यही सवाल गूंजता है - “क्या ग़रीबों के बच्चों की जान की कोई क़ीमत नहीं?”

कैमरे के पीछे भी वही सन्नाटा

निठारी में आज मीडिया की गाड़ियां फिर पहुंची हैं, लेकिन गांव वालों के चेहरों पर अब कैमरे के लिए भी कोई उम्मीद नहीं बची. कई लोग अब बात नहीं करना चाहते, कहते हैं - “कहने से क्या होगा? सब भूल जाते हैं.”

इस दर्द के बीच NDTV की टीम ने देखा कि जो परिवार कभी न्याय के नाम पर अदालतों में दौड़े थे, आज वही परिवार कहते हैं - “अब बस ऊपरवाला ही न्याय देगा.”

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