- नागपुर की लड़की ट्यूशन के बहाने युवक के साथ गई थी
- पुलिस ने उसे ढूंढकर उसकी कस्टडी मां को सौंप दी थी
- लड़की के दोबारा घर से चले जाने के बाद मां ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था
नागपुर: हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी बालिग लड़की ने अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुना है, तो उसकी कस्टडी वापस पाने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर नहीं की जा सकती. दरअसल, नागपुर की लड़की 17 साल की उम्र में ट्यूशन के लिए घर से निकली थी. बाद में सीसीटीवी में दिखा कि वह एक युवक के साथ गई है. पुलिस ने लड़की को ढूंढकर उसकी कस्टडी मां को सौंप दी थी, लेकिन उसके दोबारा घर से चले जाने के बाद मां ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
जब अदालत ने लड़की से सीधे बातचीत की, तो लड़की ने बताया कि वह अपनी मर्जी से मां का साथ छोड़कर युवक के साथ गई है और उसके साथ रहना चाहती है. सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि लड़की अब बालिग हो चुकी है. उसे अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार है.
युवक पर लड़की को अवैध कब्जे में रखने का था आरोप
अदालत ने मां के उस दावे को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग रहते हुए युवक ने उसे अवैध कब्जे में रखा था. संबंधित युवक के खिलाफ पॉक्सो के तहत मामला दर्ज न करने का भी आरोप था.
नागपुर खंडपीठ ने मां की याचिका खारिज की
बाल कस्टडी के मामलों में माता-पिता के अधिकारों से ज्यादा बच्चे का कल्याण सर्वोच्च है, हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का हवाला दिया. याचिका में अवैध कस्टडी साबित होना जरूरी था, चूंकि ऐसा साबित नहीं हुआ, इसलिए नागपुर खंडपीठ ने मां की याचिका खारिज कर दी.
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