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मदर्स डे: कहानी उन मांओं की जिनकी कोख तो भरी लेकिन गोद नहीं…

मदर्स डे के मौके पर आज उन मांओं की बात जिन्होंने कोख से बच्चे को जन्म दो दिया, लेकिन उनकी गोद नहीं भर पायी. मां बनकर उन्होंने किसी का घर तो रोशन कर दिया, लेकिन उनके जीवन एक याद और खालीपन जरूर आया...

मदर्स डे: कहानी उन मांओं की जिनकी कोख तो भरी लेकिन गोद नहीं…
मदर्स डे पर प्रतीकात्मक फोटो (AI)
  • सेरोगेसी एक चुनौतीपूर्ण अनुभव है, जिसमें मां 9 महीने बच्चे को पेट में रखकर जन्म के बाद उसे सौंप देती है.
  • भारत में 2021 के सरोगेसी विनियमन अधिनियम के तहत कमर्शियल सेरोगेसी पूरी तरह बैन है.
  • सेरोगेट माताओं की मानसिक और शारीरिक देखभाल के साथ भावनात्मक समर्थन भी जरूरी होता है.

मां बनना कुदरत का ऐसा तोहफा है, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है, लेकिन उनका क्या जिनकी कोख तो भरती है, लेकिन गोद नहीं भर पाती.  त्याग भी ऐसा कि बिना आह किए 9 महीने बच्चे को पेट में रखना और फिर जन्म होते ही दूसरे को सौंप देना... आज मदर्स डे है तो  बात कर लेते हैं, उन मांओं की जिनकी गोद मां बनकर भी खाली रह गई. 9 महीने तक अपनी कोख में वो एक जीव को सांसों के साथ जोड़े रहती है, लेकिन जन्म के साथ ही उसकी सांसों का बंधन उस बच्चे से टूट जाता है और पीछे रह जाता है शरीर और मन का एक खालीपन, और वो कल्पना जिसके सहारे वो जिंदगीभर याद करती रहती है कि आज बच्चा इतने दिन का हो गया होगा, आज उसका जन्मदिन होगा, पता नहीं ऐसा होगा, पता नहीं कैसा होगा.

सेरोगेट मदर बनना आसान नहीं है. शुरुआत तो इसकी मजबूरी से होती है, जो दंपति किसी भी शारीरिक या किसी ओर कमी की वजह से माता-पिता नहीं बन सकते तो उन्हें जरूरत होती है एक ऐसी किराये की कोख की जिसके जरिए वह अपने बच्चे को जन्म दिलवा सके. सेरोगेसी पर नया कानून बनने से पहले अधिकतर पैसों की जरूरतमंद महिलाएं इससे जुड़ रही थीं और इसके जरिए वे आर्थिक तौर पर मजबूत होकर अपने परिवार और बच्चों की जरूरतों को पूरा कर रही थीं.बेशक, ऐसी मांओं को सलाम है, जो अपने शरीर का 9 महीने का कष्ट नहीं देख रही थीं, शरीर पर पड़ने वाले उस असर को नहीं देख रही थीं, जो बच्चे के जन्म के बाद उसमें पड़ता है, उस अवसाद को नहीं देख रही थीं, जो बच्चे को सौंपने के बाद वो महसूस करती हैं और उस रिस्क को भी नहीं देख रही थीं जो कि बच्चों के जन्म के दौरान उन्हें हो सकता था. वो भी उस देश में जहां बच्चों के जन्म के मामलों में माता मृत्युदर का नंबर उच्च ही रही है. खैर, अब कमर्शियल यानी पैसे देकर बच्चा पैदा करवाना पूरी तरह बैन है, अब पूरी तरह परोपकार की भावना के तहत ही सेरोगेसी लीगल है. अब सेरोगेसी के लिए मापदंड तय हैं, वह आपकी रिश्तेदार भी होनी चाहिए. 

फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट के तौर पर मेरा काम सिर्फ लैब में भ्रूण या डिलीवरी रूम में बच्चे का स्वागत करना नहीं होता, मेरा असली काम एक पुल बनाना है, सेरोगट मदर और बच्चे की उम्मीद खो चुके माता-पिता के बीच भावनाओं और विश्वास की डोर से बनता है. मुझे ये सुनिश्चित करना होता है कि सेरोगेट मां को केवल बच्चा पैदा करने का जरिया न समझा जाए, उन्हें वह सम्मान और देखभाल मिले जिसकी वह हकदार हैं. सरोगेसी के 9 महीनों में मैं सिर्फ उनका मेडिकल चेकअप नहीं करती, बल्कि उनकी वो बातें भी सुनती हूं, जो वे किसी और से नहीं कह पातीं. घंटों उनके साथ बैठती हूं. एक मां ने तो मुझसे ये भी कहा था, डॉक्टर साहिबा बच्चा सौंपने के बाद मेरी गोद तो खाली हो गई, लेकिन मेरे दिल में सुकून है किसी के घर का चिराग तो जल गया.

डॉ सोनाली गुप्ता

द ब्लीस IVF एंड गायनी केयर

आइये आज मदर्स डे के मौके पर उन महिलाओं के अनुभवों और भावनाओं के बारे में जानते हैं, जिन्होंने किसी परिवार के अंधेरे को चिराग से दूर किया.

जब पेट में हलचल करता है तो उसे लोरी सुना लेती हूं, पता नहीं फिर मौका मिले या न मिले

एक सेरोगेट मदर सुनीता (बदला हुआ नाम) ने बताया कि जब मैं रात को अकेले सोती हूं तो बच्चा पेट में हलचल करता है, मैं उसे लोरी सुना लेती हूं, क्योंकि फिर तो मुझे ये मौका नहीं मिलेगा. मुझे पता है कि ये बच्चा किसी और का सपना है, लेकिन इस सपने को बुनने के लिए खून-पसीना तो मेरा ही लग रहा है ना. ये कहते हुए सुनीता रो पड़ी...

मैं उसकी मां नहीं बन पाई, बस चाची हूं

एक सेरोगेट मदर परवीन (बदला हुआ नाम) ने बताया कि वह अपनी जेठानी के लिए सेरोगेट मदर बनने को तैयार हुईं, लेकिन जब तक बच्चा पेट में था तब तक तो सब ठीक था, लेकिन बच्चे के जन्म के बाद उसे जेठानी को सौंपने में न जाने क्यों मेरा मन भारी हो रहा था, हालांकि मैंने इसी भावना से इस बच्चे को जन्म दिया था कि मेरी जेठानी की गोद भर जाएगी, लेकिन परिवार के दबाव में मैंने बच्चे को दे तो दिया लेकिन मेरा पूरा मन बच्चे में ही रहा. मेरी छाती से दूध बह रहा था, लेकिन एक हफ्ते के बाद मैं बच्चे को पिला नहीं पाई, क्योंकि मेरे पति और सास-ससुर का कहना था कि ज्यादा दिन मेरे साथ रह लेगा तो मैं उसे सौंप नहीं पाऊंगी. इसकी वजह से मुझे मानसिक और शारीरिक आघात पहुंचा. खैर मेडिसिन के जरिए करीब दो हफ्ते में मेरा दूध तो सूख गया, लेकिन मेरा मन और आत्मा उसी बच्चे में घर कर गई. मुझे मूड स्विंग्स होने लगे, जिसे मैं ज्यादा जाहिर भी नहीं कर पाई. घुट-घुटकर मैं बीमार रहने लगी. इससे उबरने में मुझे बहुत लंबा समय लगा. मेरे लिए ये बिल्कुल आसान नहीं था. आज भी मैं उसे देखती हूं, दुलारती हूं, लेकिन मैं उसकी मां नहीं सिर्फ चाची ही हूं. मगर मुझे खुशी है कि मेरी जेठानी के घर में चिराग जल गया है. पूरा परिवार बहुत खुश है.

मैंने अपना शरीर काटकर बच्चा पैदा किया और सौंप दिया, वो कहती है तुम उससे नहीं मिलोगी

सरोगेट मदर वर्षा (बदला हुआ नाम) ने बताया कि मैं अपनी रिश्तेदार के लिए सेरोगेट मदर बनी, लेकिन अब इसी बात को लेकर काफी दुखी रहती हूं. मैंने उनसे कोई पैसा नहीं लिया, ये पूरी तरह कानून के हिसाब से ही था. बच्चे को जन्म देकर दान कर दिया. अपना शरीर काटकर पैदा किया, लेकिन उन्होंने क्या किया, आज वह बच्चे की केयर नहीं करती. नौकरी चली जाती है, उसने कहा था कि वह बच्चे के लिए नौकरी छोड़ देगी. पति भी अच्छी नौकरी में है. बच्चे को समय पर खाना-पीना और प्यार नहीं मिल पाता. ये देखकर मेरा जी जलता रहता है. मुझे भी बच्चे से ज्यादा मिलने नहीं देती. उसे लगता है कि मैं अधिकार जताने न लग जाऊं. उसमें असुरक्षा की भावना है. लेकिन इस बच्चे के जन्म के बाद मैं मेरा मन काफी दुखी है, मैं अभी तक संभल नहीं पाई हूं.

ननद नहीं मेरी सहेली थी, उसके जीवन का अंधेरा मैंने दूर कर दिया

रीटा (बदला हुआ नाम) रीटा ने बताया कि मेरी ननद को बच्चा नहीं था, मेरी ननद से मेरी बस्टे फ्रेंड है और मुझसे उसका दुख नहीं देखा गया और मैंने उससे कहा कि तुम्हारे लिए मैं सेरोगेट मदर बनने को तैयार हूं, क्योंकि मेरे दो बच्चे हो चुके हैं और मुझे कोई परेशानी नहीं है अगर तुम्हारे जीवन का अंधेरा दूर हो जाए. IVF तकनीक आसान नहीं है, जितना की बोलने से लगती है. कई आईवीएफ फेल होने के बाद मैं प्रेग्नेंट हुई, इस दौरान काफी दर्द से भी गुजरना पड़ा, लेकिन ननद ने मेरा हौसला बढ़ाया, 9 महीने तक मेरी पूरी केयर की और मैंने सुंदर-सी बेटी को जन्म दिया. मगर जन्म के बाद न जाने क्यों मुझे उसको खुद से दूर करने में दुख हो रहा था, लेकिन जो वादा किया था, वैसे ही मैंने किया, बच्ची को  ननद को दे दिया. इसके बाद काफी दिन तक मुझे एक खालीपन और अवसाद ने जकड़ लिया और मुझे मेडिकल हेल्प भी लेनी पड़ी. ननद भी बीच-बीच में बच्ची को मेरे पास ले आती थीं और कहती थी कि तुम ही इसकी बड़ी मां हो. अब वह 10 साल की हो चुकी है, मैं भी इस सदमे से निकल चुकी हूं, लेकिन बच्चा पैदा करके किसी और को सौंपना आसान नहीं है. 9 महीने वो आपके अंदर आपसे ही बनता है. 

(AI इमेज)

हम कलंक नहीं, मसीहा हैं

सना (बदला हुआ नाम) ने बताया कि सेरोगेसी पर नया कानून (2021) बनने से पहले वह सेरोगेट मदर बन चुकी थीं. दरअसल, तब उनके पति रिक्शा चलाते थे और वह फैक्ट्री में काम करती थीं, उस समय 3,500 रुपये मिलते थे, पति भी रोज का 100 रुपये करीब कमाकर लाते थे. सना ने बताया कि तीन बच्चे थे पढ़ने वाले और किराये का मकान. खर्चा पूरा नहीं होता था. ऐसे में सहेली ने उन्हें सेरोगेसी के बारे में बताया और कहा कि ये कोई गंदा काम नहीं है, पैसा भी अच्छा मिलेगा. मुझे लगा कि मेरा घर बन जाएगा... चाहे एक कमरे का ही सही. लेकिन मेरा पति इसके लिए राजी नहीं था. मैंने अपने पति को बताया कि मेरा उस मर्द से कोई रिश्ता नहीं रहेगा.. मैं कोई गलत काम थोड़े ही कर रही हूं. काफी समझाने के बाद मेरा पति राजी हो गया. हमने रिश्तेदारों और आस-पड़ोस से ये बात छिपाकर रखी. बच्चे का जन्म हो गया तो मुझे बस ये बोलना पड़ा कि बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ है. मैं घर आ गई. मुझे जो आर्थिक मदद वहां से मिली उसी से मैंने एक कमरे का घर खरीदा. किराये के पैसे बचे तो मैंने अपने बच्चों की पढ़ाई में लगाया. आज मेरे बच्चे नौकरी कर रहे हैं. हम खुश हैं कि किसी की मदद करने का मौका मिला.बस समाज से छिपाना पड़ा, क्योंकि मेरी ही सहेली के बारे में जब पता चला था तो समाज ने उसे बहुत भलाबुरा कहा था. उसके परिवार ने भी पैसा तो ले लिया, लेकिन कोई सामने आकर नहीं बोला कि इसने परिवार की आर्थिक स्थिति के लिए ऐसा किया. उसे कलंक बना दिया गया, लेकिन वो कलंक नहीं, मसीहा है, उसने तो मदद की, अपने परिवार की भी और दूसरे की भी.

उन्हें बच्चा चाहिए था और मुझे मेरे बच्चों के लिए खाना

भतेरी देवी (बदला हुआ नाम) ने अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा कि उन्हें बच्चा चाहिए और हमें पैसा, मैं अपने बच्चे को पढ़ाना चाहती थी, मेरे पास पेट भर खाना भी नहीं था. मुझे मौका मिला तो मैंने इसके लिए तुरंत हामी भर दी, क्योंकि मेरा पति हमें छोड़कर पहले ही जा चुका था. हामी तो भर दी लेकिन जिस एरिया में मैं रहती हूं वहां कौन समझने वाला था कि सेरोगेसी क्या होती है? उन्हें तो बस यही लगा कि दूसरे के बच्चे को जन्म दे रही हूं, मैं जब कुछ उल्टा सीधा सुनती थी तो मुझे दुख होता था, लेकिन मैंने बहुत दिल से इन बातों को नहीं लगाया क्योंकि मैं अपने बच्चों की तरफ देखती थी, अगर मैं कमजोर होती तो मेरे बच्चों का क्या होता क्योंकि पिता तो पहले ही जा चुका था. बच्चे को हमने सौंपा और मुझे जो पैसा मिला उससे मैंने दूर जाकर मकान लिया, क्योंकि वहां रहना मुश्किल हो जाता.रिश्तेदारों ने मुझे खराब औरत कहकर छोड़ दिया, लेकिन मैंने सिर्फ अपने बच्चों की मदद की.
 

लेखक के बारे में
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वंदना वर्मा
Deputy Editor
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