- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सर्वाधिक 4398 दिनों तक रहे पूर्व PM जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है.
- PM मोदी के कार्यकाल के दौरान भारत यूपीआई, मोबाइल उत्पादन जैसे कई क्षेत्रों में शीर्ष देशों में शामिल हो गया.
- इस दौरान भारत ने अपनी विदेश नीति में अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देकर स्वतंत्र रुख दिखाया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटना इतिहास का हिस्सा बन गया था, तब उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लगातार तीसरे कार्यकाल की बराबरी की थी. अब पीएम मोदी ने सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री बने रहने के जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है. लेकिन इस उपलब्धि की चर्चा सिर्फ राजनीतिक कारणों से नहीं बल्कि पिछले 12 सालों के दरम्यान भारत की अर्थव्यवस्था, तकनीक, बुनियादी ढांचा, रक्षा और विदेश नीति में जो बदलाव देखने को मिले हैं, उसकी वजह से हो रही है.
सरकार इन बदलावों को अपनी पहचान बता रही है. यही वजह है कि पीएम मोदी की इस उपलब्धि को भारत के बदलते वैश्विक स्वरूप से जोड़ कर देखा जा रहा है.
दुनिया के मंच पर कहां-कहां नंबर-1 है भारत?
बीते 12 वर्षों में भारत ने कई ऐसे क्षेत्रों में बड़ी छलांग लगाई है, जहां कभी चीन, अमेरिका या अन्य विकसित देशों का दबदबा माना जाता था. इसमें सबसे बड़ा उदाहरण डिजिटल लेनदेन का है. आज रीयल-टाइम डिजिटल भुगतान के मामले में भारत दुनिया में पहले पायदान पर है. यूपीआई पेमेंट के जरिए होने वाले ट्रांजैक्शन का दायरा इतना बढ़ चुका है कि दुनिया के कुल डिजिटल ट्रांजैक्शन का लगभग आधा हिस्सा भारत में होता है.

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विदेशों में रहने वाले भारतीयों की भेजे जाने वाली रकम (रेमिटेंस) के मामले में भी भारत लगातार दुनिया में पहले स्थान पर बना हुआ है. एनआरआई समुदाय से आने वाला धन देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण ताकत बन चुका है. दक्षिण एशिया में निजी इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश आकर्षित करने के मामले में भी भारत सबसे आगे है. पूरे क्षेत्र में आने वाले निवेश का अधिकांश हिस्सा भारत को मिलता है.
वहीं मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. 2014 में जहां देश में केवल दो मोबाइल निर्माण इकाइयां थीं और बड़ी संख्या में फोन आयात होते थे, वहीं आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन उत्पादक देश बन चुका है. देश में बिकने वाले लगभग सभी मोबाइल फोन अब भारत में ही बन रहे हैं.
स्टील उत्पादन में भारत लगातार दुनिया में दूसरे स्थान पर बना हुआ है. इसके अलावा भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम, तीसरा सबसे बड़ा घरेलू उड्डयन बाजार और रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता के मामले में भी तीसरा सबसे बड़ा देश बन चुका है.
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बड़े फैसले, नए और बड़े कदम, बड़ी आर्थिक छलांग
मोदी सरकार के कार्यकाल की एक बड़ी पहचान ऐसे फैसले रहे हैं जिन्हें दशकों तक असंभव या कठिन माना जाता था. रक्षा क्षेत्र में पहली बार चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस का पद बनाया गया. तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल के लिए यह बड़ा संस्थागत सुधार माना गया.
भारतीय वायुसेना में राफेल लड़ाकू विमानों की एंट्री हुई और नौसेना को पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत मिला. इससे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा को मजबूती मिली.

डिजिटल क्रांति के क्षेत्र में कोविन प्लेटफॉर्म एक बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया. कोविड महामारी के दौरान इसी प्लेटफॉर्म के जरिए 220 करोड़ से अधिक वैक्सीन डोज का रिकॉर्ड डिजिटल प्रबंधन किया गया. नई संसद भवन का निर्माण और डिजिटल बजट पेश करने की परंपरा भी इसी दौर में शुरू हुई.
देश की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना मुंबई और अहमदाबाद के बीच शुरू की गई. वहीं दिल्ली-मेरठ RRTS यानी नमो भारत कॉरिडोर ने हाई-स्पीड क्षेत्रीय परिवहन की नई शुरुआत की.
अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलना भी एक बड़ा बदलाव रहा. आज सैकड़ों स्पेस स्टार्टअप लॉन्च व्हीकल, सैटेलाइट और अन्य अत्याधुनिक तकनीकों पर काम कर रहे हैं. रक्षा उत्पादन में भी निजी कंपनियों की भूमिका तेजी से बढ़ी है.
संविधान से जुड़े बदलाव और बड़े नीतिगत फैसले
इस दौर की सबसे चर्चित घटनाओं में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 और 35ए का हटाया जाना शामिल है. सरकार ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया.
तीन तलाक को अपराध घोषित करने वाला कानून भी पहली बार लागू हुआ. इसे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जोड़कर देखा गया.
नारी शक्ति वंदन अधिनियम के जरिए संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण का रास्ता भी खुला.
जन धन योजना के तहत करोड़ों लोगों के बैंक खाते खोले गए, जिससे सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थियों तक पहुंचने लगा. आयुष्मान भारत योजना के तहत करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा का लाभ मिला.
विदेश नीति में बदला भारत का अंदाज
मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की चर्चा जितनी घरेलू उपलब्धियों को लेकर है, उतनी ही विदेश नीति को लेकर भी है.
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल और रक्षा खरीद कम करने का दबाव बनाया. लेकिन भारत ने अपने ऊर्जा और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी.
चीन के साथ गलवान संघर्ष के बाद भारत ने चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने और सीमावर्ती इलाकों में सैन्य तैयारियां बढ़ाने जैसे कदम उठाए.
धारा-370 हटाने पर कई देशों की प्रतिक्रिया के बावजूद भारत ने इसे अपना आंतरिक मामला बताते हुए किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया.
जी20 की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाने की पहल भी भारत की स्वतंत्र वैश्विक सोच का उदाहरण मानी गई.
रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली खरीदने का फैसला भी इसी नीति का हिस्सा माना गया, जहां भारत ने संभावित अमेरिकी दबाव के बावजूद अपनी सुरक्षा जरूरतों को प्राथमिकता दी.
मध्य-पूर्व में भी भारत ने इजरायल और अरब देशों, दोनों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखकर संतुलित कूटनीति का उदाहरण पेश किया.
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बढ़ता वैश्विक सम्मान और बढ़ती स्वीकार्यता
पिछले वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया के विभिन्न देशों से 30 से अधिक सर्वोच्च नागरिक और राजकीय सम्मान मिले. इसे भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और कूटनीतिक प्रभाव का संकेत माना जा रहा है.
संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मान्यता मिलना और अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र को दो बार संबोधित करना भी इसी बदलती वैश्विक स्थिति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है.
तो लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी ने प्रधानमंत्री मोदी को भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं की सूची में और मजबूत स्थान दिया है. लेकिन इस दौर की असली कहानी डिजिटल शक्ति, विनिर्माण केंद्र, रक्षा उत्पादक और वैश्विक कूटनीतिक खिलाड़ी के रूप में भारत की अपनी नई पहचान गढ़ने की कोशिश रही है.
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