मोदी सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उनके इस्तीफा देने के बाद शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी प्रह्लाद जोशी को दी गई है. मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में चार शिक्षा मंत्री आ चुके हैं, लेकिन कोई भी अपने पांच साल पूरे नहीं कर पाया है.
स्मृति ईरानी: 26 मई 2014- 5 जुलाई 2016
केंद्र में जब पहली बार मोदी सरकार बनी थी तब स्मृति ईरानी को सबसे पहले शिक्षा विभाग दिया गया था. तब इस मिनिस्ट्री का नाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय था. अपने कार्यकाल के दौरान स्मृति ईरानी ने कुछ बड़े फैसले लिए थे. उदाहरण के लिए उन्होंने शिक्षा मंत्री बनते ही दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को वापस लिया था. तब तर्क दिया गया था कि साल 2013 में UGC अधिनियम और दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम ठीक तरीके से पालन नहीं हुआ था, बिना तैयारी के ही चार वर्षीय कोर्स शुरू कर दिया गया.
छात्र भी उस कार्यक्रम का विरोध कर रहे थे. उनका कहना था कि यूनिवर्सिटी के पास पर्याप्त संसाधन ही नहीं थे कि वे इस तरह के कार्यक्रम को पूरा कर सकें. देश में आज जो नई शिक्षा नीति लागू है, उसका शुरुआती मसौदा भी स्मृति के कार्यकाल में शुरू हो गया था. इसे भी उनकी कामयाबी के तौर पर देखा जाता है. उनके शिक्षा मंत्री रहते नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क तैयार कर लिया गया था. इसके बाद से उच्च शिक्षण संस्थानों को रैंकिंग दी जाने लगी थी.
वैसे उनके कार्यकाल के कुछ विवाद भी रहे. साल 2016 में जब जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन हुए थे, कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया गया था, तब उनका मंत्रालय सवालों में था. संसद में भी स्मृति को विपक्ष के सवालों का सामना करना पड़ा था. इसी तरह 2016 में ही हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या मामले ने भी काफी तूल पकड़ा था. तब भी उनके मंत्रालय पर सवाल उठे थे.
इन विवादों के बीच पांच जुलाई 2016 को स्मृति ईरानी का मंत्रालय बदल दिया गया था. मानव संसाधन विकास मंत्रालय के बजाय उन्हें कपड़ा मंत्रालय सौंप दिया गया था.
प्रकाश जावड़ेकर: 5 जुलाई 2016-30 मई 2019
पांच जुलाई 2016 में स्मृति ईरानी को जब कपड़ा मंत्रालय दिया गया, तब प्रकाश जावड़ेकर को मानव संसाधन विकास मंत्री बना दिया गया. उनके कार्यकाल के दौरान भी शिक्षा की दिशा में कई अहम कदम उठाए गए. उनके कार्यकाल को कुछ बड़े फैसलों के लिए याद किया जाता है. उनके कार्यकाल में ही सबसे पहले IIM संस्थानों को Institution of National Importance का तमगा दिया गया था. इस एक फैसले की वजह से IIM संस्थानों को काम करने की एक अलग आजादी मिली थी. फीस से लेकर दूसरे प्रशासनिक फैसलों के लिए उन्हें हर बार मंत्रालय से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं थी.
जो नेशनल टेस्टिंग एजेंसी आज विवादों में है, उसकी स्थापना भी प्रकाश जावड़ेकर के कार्यकाल के दौरान ही हुई थी. उस समय कहा गया था कि देश की सभी प्रमुख परीक्षाओं को अगर एक ही संस्था द्वारा आयोजित किया जाएगा तो उससे पारदर्शिता बढ़ेगी और बेहतर तालमेल भी देखने को मिलेगा. प्रकाश जावड़ेकर ने शिक्षा मंत्री रहते हुए एक बड़ा फैसला 'नो डिटेंशन पॉलिसी' को लेकर भी लिया था. उन्होंने इसमें एक बड़ा संशोधन किया था जिसके तहत 5वीं से 8वीं तक के छात्रों को स्कूल में फेल करना है या नहीं, यह फैसला ही राज्यों पर छोड़ दिया गया था.
प्रकाश जावड़ेकर का कार्यकाल विवादों में तब आया था जब सीबीआई बोर्ड परीक्षा का प्रश्न पत्र लीक हो गया था. इसके बाद 2019 में जब फिर मोदी सरकार बनी, प्रकाश जावड़ेकर को पर्यावरण और सूचना मंत्रालय दिया गया. फिर जुलाई 2021 के बड़े मंत्रिमंडल फेरबदल से पहले जावड़ेकर ने मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में इस्तीफा दे दिया.
रमेश पोखरियाल निशंक: 30 मई 2019-7 जुलाई 2021
रमेश पोखरियाल निशंक ने 30 मई 2019 को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली थी. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा भी उनके कार्यकाल के दौरान ही हुई थी. ऐसे में इसका एक बड़ा श्रेय निशंक को जाता है. लेकिन कहा जाता है कि उनके कार्यकाल के दौरान इस नीति के तहत जमीन पर जो जरूरी बदलाव होने थे, उसकी रफ्तार कुछ धीमी थी. इसके अलावा शिक्षा मंत्रालय के कई महत्वपूर्ण पद लंबे समय तक खाली भी रहे. वहीं पांच प्रमुख IIT संस्थानों को अपने डायरेक्टर भी नहीं मिल पाए थे.
इसके बाद रमेश पोखरियाल कोरोना से संक्रमित हो गए और वे एक महीने तक अस्पताल में भर्ती रहे. बाद में खराह स्वास्थ्य की वजह से ही उन्होंने बतौर शिक्षा मंत्री इस्तीफा दे दिया.
धर्मेंद्र प्रधान: जुलाई 2021- 25 जुलाई 2026
मोदी सरकार में सबसे लंबे समय तक शिक्षा मंत्री बने रहने का रिकॉर्ड धर्मेंद्र प्रधान के नाम है. वे इस पद पर 1,844 दिन तक रहे. लेकिन 25 जुलाई को उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बीच अपने पद से इस्तीफा दिया. उन्होंने नैतिकता का हवाला देते हुए वो पद छोड़ दिया.
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को और तेजी से लागू करने और मातृभाषा को एजुकेशन सिस्टम में बढ़ावा देने के लिए याद किया जाता है. बतौर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने PM-SHRI योजना से जुड़े कई कार्यक्रमों को भी आगे बढ़ाया था. लेकिन बाद में पेपर लीक के मुद्दे ने उनके कार्यकाल को विवादों में ला दिया. इसके अलावा नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की विश्ननीयता पर उठे सवालों ने भी उनकी मुश्किलों को बढ़ा दिया.
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