मेडिकल का छात्र कैसे बना कारगिल युद्ध का पहला शहीद? कैप्टन सौरभ कालिया की कहानी
मेडिकल के क्षेत्र में शानदार भविष्य होने के बावजूद सौरभ कालिया का सपना देश की सेवा करना था.
हर साल 26 जुलाई को देश कारगिल विजय दिवस मनाता है. भारत के वीर सपूतों ने पाकिस्तान की नापाक साजिश को परास्त करते हुए एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी. इस जीत के कई नायक थे. कई शहीद ऐसे थे जिन्होंने अपने से ऊपर अपने वतन को रखा और मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया. ऐसे ही देश के महान सपूत थे कैप्टन सौरभ कालिया जिन्हें कारगिल युद्ध के पहले शहीद के रूप में याद किया जाता है.
कैप्टन सौरभ कालिया का जन्म 29 जून 1976 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर शहर में हुआ था. उनके पिता का नाम डॉ. एन. के. कालिया और माता का नाम विजय कालिया है. उनके छोटे भाई का नाम वैभव कालिया है. सौरभ का बचपन अनुशासन और देशभक्ति के माहौल में बीता. देश सेवा की भावना उनके पूरे परिवार में थी.
सौरभ कालिया का शुरुआती जीवन
सौरभ कालिया ने अपनी शुरुआती पढ़ाई डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल, पालमपुर से की. कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं. सौरभ कालिया के साथ भी कुछ ऐसा ही था. वह बचपन से ही पढ़ाई में बहुत तेज थे. उनका अकादमिक रिकॉर्ड शानदार रहा. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 1997 में उन्होंने हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय से मेडिकल साइंस में स्नातक की डिग्री हासिल की. यह बात अपने आप में खास है क्योंकि आगे चलकर देश के वीर सपूत बने सौरभ कालिया का शुरुआती रुझान मेडिकल साइंस की ओर था. यहां भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और उन्हें कई स्कॉलरशिप अपने नाम की.
मेडिकल छोड़ सेना में कैसे पहुंचे सौरभ?
मेडिकल के क्षेत्र में शानदार भविष्य होने के बावजूद सौरभ कालिया का सपना देश की सेवा करना था. इसी वजह से उन्होंने मेडिकल के बेहतरीन करियर को छोड़कर भारतीय सेना के संघर्षपूर्ण पथ पर चलने का फैसला किया. देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने सेना को अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया. अगस्त 1997 में उन्होंने संयुक्त रक्षा सेवा यानी कि CDS परीक्षा पास की और इंडियन मिलिट्री अकादमी में प्रशिक्षण के लिए चुने गए. कठिन सैन्य प्रशिक्षण पूरा करने के बाद 12 दिसंबर 1998 को उन्हें भारतीय सेना में अधिकारी के रूप में कमीशन मिला.
कैप्टन सौरभ कालिया की नियुक्ति 4 जाट बटालियन, जाट रेजिमेंट में हुई. जाट रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे बहादुर और गौरवशाली रेजिमेंटों में से एक है. इस रेजिमेंट ने देश को कई वीर योद्धा दिए हैं. आगे चलकर इस रेजिमेंट को एक और वीर सपूत मिलने जा रहा था- सौरभ कालिया.
31 दिसंबर 1998 को उन्होंने बरेली स्थित जाट रेजिमेंटल सेंटर में रिपोर्ट किया. इसके बाद उनकी पहली फील्ड पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर में हुई. उस समय सौरभ कालिया बेहद युवा अधिकारी थे. सेना में उन्हें ज्यादा समय भी नहीं हुआ था, लेकिन परिस्थितियां ऐसी थीं कि उन्हें बहुत जल्दी परिपक्व होना पड़ा.
सौरभ कालिया का पहला मिशन
भारतीय सेना में शामिल होने के कुछ ही समय बाद कारगिल में तनाव बढ़ने लगा. अपनी जॉइनिंग के करीब चार महीने बाद ही सौरभ कालिया को उनका पहला मिशन मिला. उनकी 4 जाट बटालियन को आदेश मिला कि सौरभ कालिया ककसर क्षेत्र की लांगपा पोस्ट पर जाएं. यह बेहद ऊंचाई वाला इलाका है, जहां भारी बर्फबारी होती है. जब बर्फ पिघलती है, तब भारतीय सेना वहां गश्त शुरू करती है.
सौरभ कालिया अपने पहले मिशन पर केवल नियमित गश्त के लिए गए थे. उन्हें यह सुनिश्चित करना था कि ऊंची चोटियों से बर्फ पिघल चुकी है या नहीं. इस मिशन पर उनके साथ पांच और जवान भी थे.
जैसे ही सौरभ कालिया अपनी टीम के साथ ऊंची चोटी पर पहुंचे, खराब मौसम ने उनका स्वागत किया. लेकिन सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उन्होंने देखा कि वहां पहले से ही पाकिस्तानी सैनिक मौजूद थे. पाकिस्तान ने बर्फबारी का फायदा उठाकर भारतीय सीमा के भीतर ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया था.
कुछ देर तक दोनों ओर से भारी गोलीबारी होती रही. एक समय ऐसा आया, जब भारतीय जवानों के पास गोला-बारूद कम पड़ने लगा. सौरभ कालिया ने तुरंत अपनी यूनिट को संदेश भेजा, अतिरिक्त मदद की मांग की, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. पाकिस्तानी सैनिकों ने कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों को बंदी बना लिया. यह घटना उस समय हुई थी, जब कारगिल युद्ध आधिकारिक रूप से शुरू भी नहीं हुआ था.
पाकिस्तान की क्रूरता और कालिया की बहादुरी
जब सौरभ कालिया और उनकी टीम कई दिनों तक वापस नहीं लौटी तो भारतीय सेना ने उनकी तलाश के लिए दूसरी टीम भेजी. खोज अभियान के दौरान सेना को इस बात का एहसास हुआ कि पाकिस्तान ने एक बड़ी घुसपैठ की साजिश रच रखी है. उधर, पाकिस्तान की ओर से भी यह ऐलान कर दिया गया कि कैप्टन सौरभ कालिया और उनके साथी उनके कब्जे में हैं.
पाकिस्तानी सैनिकों ने कैप्टन सौरभ कालिया और उनके साथियों को 22 दिनों तक टॉर्चर किया. उनका मकसद भारतीय सेना से जुड़ी जानकारी हासिल करना था, लेकिन सौरभ कालिया एक अलग ही मिट्टी के बने थे. उन्होंने तमाम यातनाएं सह लीं, लेकिन कोई जानकारी पाकिस्तान को नहीं दी. देश के प्रति उनका प्रेम और साहस ऐसा रहा कि पाकिस्तान के हौसले पस्त होते गए.
15 मई को बंदी बनाए जाने के बाद 7 जून 1999 को भारतीय सेना को बेहद दुखद खबर मिली. पाकिस्तान ने कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों के शव भारत को सौंप दिए. ये वही छह जवान थे जिन्होंने सबसे पहले पाकिस्तान की घुसपैठ का पता लगाया था.
26 साल से संघर्ष करता एक पिता
जब भारत को अपने वीर सपूतों के शव मिले, तब पाकिस्तान की क्रूरता पूरी दुनिया के सामने आ गई. शवों पर अमानवीय यातनाओं के कई निशान थे. आंखों में पंचर, कानों में गर्म लोहे की सलाखें डाली गई थीं, शरीर में कई जगह फ्रैक्चर. पाकिस्तान के कायरों ने भारतीय सेना के जवानों के शव क्षत-विक्षत कर दिया कर दिए थे.
आज पूरी दुनिया कैप्टन सौरभ कालिया को एक शहीद के रूप में याद करती है. वहीं, उनके पिता डॉ. एन. के. कालिया पिछले 26 वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं. उनका मानना है कि उनके बेटे का सर्वोच्च बलिदान देश के लिए गौरव की बात है, लेकिन पाकिस्तान ने उनके साथ जो अमानवीय व्यवहार किया, वह अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन था और उसके लिए उसकी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए.
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