- दस राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव 16 अक्तूबर को होंगे, जिसमें भाजपा सात सीटें जीतने की स्थिति में है
- सपा अपने दम पर दो सीटें जीतने की संभावना रखती है, लेकिन दसवीं सीट पर मुकाबला सपा और भाजपा के बीच है
- भाजपा के पास फिलहाल दो सौ अठावन विधायक हैं और वह सहयोगी दलों के समर्थन से आठवीं सीट जीतने की कोशिश कर रही है
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्तूबर को चुनाव होना है. भाजपा अपने दम पर 7 सीटें जीतने की स्थिति में है तो सपा भी आसानी से दो सीट जीत जाएगी. मसला 10वीं सीट का फंस रहा है. सपा तीसरा कैंडिडेट उतारने वाली है और भाजपा भी 8वां उम्मीदवार देगी. इस तरह दोनों मिलकर 10वीं सीट के मुकाबले को रोचक बना देंगे. बहुमत दोनों में से किसी भी दल के पास नहीं है, लेकिन भाजपा इसके ज्यादा करीब है. विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही यह मुकाबला होना है. इसलिए ना तो भाजपा इसे गंवाना चाहेगी और ना ही अखिलेश यादव. पीडीए की बातें करने वाले अखिलेश यादव तो इस सीट पर सफलता पाकर अपने अभियान को धार देने की कोशिश में होंगे.
भाजपा के लिए तो 8वीं सीट प्रतिष्ठा का चुनाव बन गई है. उत्तर प्रदेश में राज्य सभा की एक सीट जीतने के लिए 37 प्रथम वरीयता के वोट चाहिए. भाजपा के पास फिलहाल 258 विधायक हैं. उसने 255 सीटें 2022 में जीती थीं, लेकिन बाद में कुछ और सपा विधायकों के आने से आंकड़ा बढ़ा है. इस तरह वह अपने दम पर 7 सीटें जीतने की स्थिति में है. वहीं उसके सहयोगी दलों की बात करें तो अनुप्रिया पटेल की अपना दल के 13, जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल के 9, सुभासपा के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक हैं.
इस तरह के और सहयोगी दलों के पास सात सीटें जीतने के बाद 32 सरप्लस वोट बचते हैं. यानी आठवीं सीट जीतने के लिए केवल 5 अतिरिक्त वोट चाहिए. राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के दो और निर्दलीय विधायकों को मिला कर ये पूरे हो सकते हैं. पर अहम सवाल यह है कि कैसे इन सभी के वोट एकमुश्त भाजपा को मिलते हैं. ऐसे समय में जब अपने समाज के आरक्षण के लिए ओमप्रकाश राजभर आवाज उठा रहे हैं. संजय निषाद तो मल्लाह समाज के लिए 9 फीसदी अलग आरक्षण की ही मांग कर रहे हैं.
ऐसे में भाजपा से अकसर असंतोष के सुर में बात करने वाले संजय निषाद और ओपी राजभर के कितने विधायकों का भाजपा को समर्थन मिलता है, यह देखना होगा. इसके अलावा असेंबली में अकसर भाजपा के हिंदुत्व की लाइन पर ही बात करने वाले राजा भैया और उनके एक और विधायक किसका समर्थन करते हैं. इस पर भी नजर होगी. कभी सपा के साथ राजा भैया का सम्मान का रिश्ता था. मुलायम सिंह यादव की सरकार में तो वह मंत्री तक रहे थे. लेकिन राज्यसभा का ही एक चुनाव था, जब उन्होंने सपा को वोट नहीं दिया. तब से उनकी और अखिलेश की पहले जैसी बात नहीं रह गई है. ऐसे में माना जा रहा है कि वह भाजपा के उम्मीदवार को ही वोट देंगे. लेकिन आखिरी वक्त तक इंतजार करना ही सही है. इस तरह यह राज्यसभा चुनाव भाजपा के लिए ताकत को परखने वाला इलेक्शन भी है.
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