मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने के मामले में सियासत गरमाई हुई है लेकिन इसकी कहानी की शुरुआत तेलंगाना से होती है. दरअसल हैदराबाद की एक अदालत में लंबित इस मामले का खुलासा होने के बाद भोपाल में कांग्रेस का पूरा गेम पलटा है. ऐसे में ये जानना जरूरी हो जाता है कि इस पूरे घटनाक्रम का कानूनी पहलू क्या है और इसमें क्या तकनीकि पेंच हैं. असल में इसका सबसे बड़ा कानूनी पेंच यह है कि नए कानून (BNSS) के तहत मीनाक्षी नटराजन इस मामले में तकनीकी रूप से 'आरोपी' नहीं बल्कि केवल एक 'प्रतिवादी' (रिस्पॉन्डेंट) हैं. कोर्ट ने अभी इस पर कोई संज्ञान भी नहीं लिया है, लेकिन चुनावी हलफनामे में इसी जानकारी को छिपाना कांग्रेस के लिए झटका साबित हुआ.
क्या है पूरा मामला और क्या हैं आरोप?
इस कानूनी विवाद की शुरुआत हैदराबाद की रहने वाली एक पूर्व कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव ए. श्रीलता की शिकायत से हुई. श्रीलता ने हैदराबाद के नामपल्ली स्थित एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में एक निजी याचिका दायर की थी. इस याचिका में उन्होंने कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को नामजद किया, जिसमें मीनाक्षी नटराजन को आरोपी नंबर 4 के तौर पर शामिल किया गया है. शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्होंने कांग्रेस नेता कुंभम शिवकुमार रेड्डी के आचरण, छेड़छाड़ और धमकियों को लेकर पार्टी नेतृत्व से शिकायत की थी. आरोप के मुताबिक, मीनाक्षी नटराजन और अन्य नेताओं ने इस जानकारी के बावजूद आरोपी नेता के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया और उसे कथित तौर पर राजनीतिक संरक्षण दिया.
No criminal case in the eyes of the law exists against Ms Meenakshi Natarajan.
— Ruchira Chaturvedi (@RuchiraC) June 10, 2026
There is no criminal case for her to disclose.
There is only a notice by Court of a private complaint which is not liable to be disclosed.
Rejection of her nomination is illegal.@DrAMSinghvi pic.twitter.com/LTjCAtllau
साल 2022 से 2025 तक की क्रोनोलॉजी ये है?
इस मामले से जुड़े आरोप और पुलिस शिकायतें काफी पुरानी हैं. शिकायतकर्ता महिला ने सबसे पहले साल 2022 में हैदराबाद पुलिस से संपर्क कर कुंभम शिवकुमार रेड्डी के खिलाफ मोर्चा खोला था. हालांकि, मीनाक्षी नटराजन को शामिल करते हुए जो निजी शिकायत दर्ज कराई गई, वह काफी बाद में यानी साल 2025 में कोर्ट के सामने आई. पुलिस सूत्रों का कहना है कि श्रीलता ने इससे पहले हैदराबाद और बेंगलुरु पुलिस में भी शिकायतें दी थीं, लेकिन साक्ष्यों की कमी के कारण पुलिस ने उन मामलों को बंद या डिस्पोज ऑफ कर दिया था. इसके बाद शिकायतकर्ता ने साल 2025 में नामपल्ली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए.
सिंघवी बोले- ये 'नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर' है
तेलंगाना से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अपने वीडियो बयान में इस पूरी कार्रवाई को कानूनी रूप से गलत और राजनीति से प्रेरित बताया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ कोई आपराधिक मामला या एफआईआर दर्ज नहीं है, बल्कि यह केवल एक प्रारंभिक नोटिस है जिस पर अदालत ने अभी तक कोई संज्ञान (Cognizance) भी नहीं लिया है. सिंघवी ने तर्क दिया कि नए कानून (BNSS) की तकनीकी प्रक्रियाओं को समझे बिना केवल एक राजनीतिक साजिश के तहत उनके नामांकन को दुर्भावनापूर्ण तरीके से खारिज किया गया है. उन्होंने भरोसा जताया कि यह फैसला कानूनी सिद्धांतों के विपरीत है और कांग्रेस पार्टी इस 'नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर' के खिलाफ न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाएगी, जहां कानून और न्याय की ही जीत होगी.
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आरोपी या प्रतिवादी? नया कानून क्या कहता है?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा कानूनी पेंच नए आपराधिक कानून से जुड़ा है, जो मीनाक्षी नटराजन के पक्ष को मजबूती देता है. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 223 के तहत मीनाक्षी नटराजन को इस मामले में केवल एक प्रतिवादी माना गया है, न कि कोई घोषित अपराधी या मुख्य आरोपी. यह धारा पुराने कानून (CrPC) की धारा 200 की जगह आई है, जिसके तहत मजिस्ट्रेट को किसी भी मामले में आगे बढ़ने से पहले शिकायतकर्ता का शपथ पर बयान दर्ज करना अनिवार्य होता है. चूंकि अदालत ने अभी तक इस मामले पर कोई संज्ञान (कॉग्निजेंस) नहीं लिया है और मामला शुरुआती चरण में है, इसलिए कानूनी रूप से इसे कोई सक्रिय आपराधिक केस नहीं कहा जा सकता.
बचाव पक्ष और पुलिस का आधिकारिक रुख
मीनाक्षी नटराजन के कानूनी सलाहकारों और वकीलों का स्पष्ट कहना है कि उनके खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला दर्ज नहीं है. यह केवल एक निजी याचिका है, जिसके तहत मिले अदालती नोटिस का नटराजन पहले ही औपचारिक और लिखित जवाब दाखिल कर चुकी हैं. वकील का तर्क है कि अदालत ने उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल निर्देश या दंडात्मक आदेश जारी नहीं किया है. पुलिस सूत्रों ने भी इसकी पुष्टि की है कि मामला अभी केवल सुनवाई के इंतजार में लंबित है. हालांकि, भोपाल में स्क्रूटनी के दौरान भाजपा ने इसी नोटिस और लिखित जवाब को आधार बनाकर दलील दी कि जब मामला अदालत में है और नटराजन जवाब दे चुकी हैं, तो इसकी जानकारी हलफनामे में होनी चाहिए थी, जिसे रिटर्निंग ऑफिसर ने स्वीकार कर लिया.
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