देश के भीतर नशे का एक ऐसा खतरनाक नेटवर्क सक्रिय हो चुका है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है. मणिपुर से शुरू होने वाला नया ड्रग कॉरिडोर देश के अन्य राज्यों तक फैल रहा है. इस ‘मणिपुर ड्रग कॉरिडोर' के जरिए म्यांमार और नॉर्थ-ईस्ट से नशे की खेप देश के दूसरे कोने यानी राजस्थान तक पहुंच रही है. हाल के महीनों में राजस्थान एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स (ANTF) ने कई ऐसी खेप पकड़ी हैं, जिनके तार सीधे मणिपुर और पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़े मिले हैं. जांच में सामने आया है कि तस्कर अब पुराने रास्तों को छोड़कर नए नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं. जानिए आखिर ये नेटवर्क कैसे काम करता है और इसके तार कहां तक जुड़े हैं.
ड्रग्स माफियाओं ने बदला रूट
कभी पाकिस्तान सीमा और अफगानिस्तान से जुड़े गोल्डन क्रेसेंट नेटवर्क को सबसे बड़ा खतरा माना जाता था. लेकिन तालिबान के शासन के बाद इस इलाके में अफीम की खेती पर प्रतिबंध लगा तो म्यांमार दुनिया में अफीम की अवैध खेती का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया. म्यांमार से अफीम की सप्लाई मणिपुर होते हुए देशभर में होने लगी है. यही वजह है कि राजस्थान की सुरक्षा एजेंसियों को इस खतरनाक ट्रेंड का पता लगा है. एक ऐसा नेटवर्क, जो कई हजारों किलोमीटर तय फैल चुका है. जांच एजेंसियों का मानना है कि ड्रग्स माफिया अब उन रूट का इस्तेमाल कर रहे हैं, जहां निगरानी कम है.
ट्रक के तहखाने में छुपा होता है नशा का सामान
म्यांमार, लाओस और थाईलैंड का इलाका गोल्डन ट्रायंगल कहलाता है. यह क्षेत्र लंबे समय से अफीम और सिंथेटिक ड्रग्स के उत्पादन के लिए कुख्यात रहा है. अब इसी क्षेत्र से निकलने वाली अफीम की खेप मणिपुर के रास्ते देश में प्रवेश कर रही है. मणिपुर से शुरू होने वाला यह नेटवर्क असम, बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा से होकर राजस्थान पहुंचता है. तस्कर ट्रकों की स्टेपनी, चेसिस और गुप्त तहखानों में नशे का सामान छिपाकर हजारों किलोमीटर की दूरी तय करते हैं.
सिंथेटिक ड्रग्स-एमडी की खेप भी पहुंच रही
जोधपुर में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने भीनमाल क्षेत्र में एक ट्रक की स्टेपनी से 41 किलोग्राम अफीम का दूध बरामद किया था. जांच में पता चला था कि यह खेप लगभग तीन हजार किलोमीटर दूर मणिपुर से लाई गई थी. इसकी आपूर्ति जालोर तथा बाड़मेर क्षेत्र में की जानी थी. इस कार्रवाई ने पहली बार बड़े स्तर पर यह संकेत दिया था कि पूर्वोत्तर भारत से अफीम राजस्थान तक पहुंच रही है. इससे साफ हो गया है कि राजस्थान अब सिर्फ खपत का केंद्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क की एक अहम कड़ी बन चुका है. ANTF आईजी विकास कुमार के मुताबिक, तस्करों ने ना सिर्फ रूट बदला, बल्कि रणनीति में भी बड़ा बदलाव किया है. मामला अफीम या हेरोइन तक सीमित नहीं है, सिंथेटिक ड्रग्स, एमडी और अन्य केमिकल आधारित नशीले पदार्थ भी तेजी से इस नेटवर्क के जरिए पहुंच रहे हैं.
इन दो रास्तों से होती है तस्करी
म्यांमार से निकलने वाली खेप सबसे पहले मणिपुर पहुंचती है. इसके बाद यह नेटवर्क असम, बिहार और उत्तर प्रदेश के रास्ते आगे बढ़ता है. यहां से तस्कर दो अलग-अलग कॉरिडोर का इस्तेमाल करते हैं.
पहला रास्ता- उत्तर प्रदेश से आगरा और भरतपुर होते हुए सीधे पश्चिमी राजस्थान की तरफ जाता है. इस रूट का इस्तेमाल खासतौर पर जालोर, बाड़मेर, जोधपुर और पाली जैसे जिलों तक खेप पहुंचाने के लिए किया जाता है. जबकि दूसरा रास्ता- उत्तर प्रदेश से हरियाणा के पलवल, हिसार और सिरसा की तरफ मुड़ता है. इसके बाद खेप राजस्थान के हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिलों में प्रवेश करती है.
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