कर्नाटक हाईकोर्ट ने पिछले दिनों एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. अदालत ने निचली अदालत के एक फैसले को सही बताते हुए एक महिला की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी. इस महिला ने पति से भरण-पोषण की मांग की थी. यह महिला कोरोना काल में अपने माता-पिता की सेवा करने मायके गई थी. लेकिन पति द्वारा बार-बार बुलाने पर भी वह वापस नहीं लौटी. उसने मैसूरु फैमिली कोर्ट में दो बेटियों के साथ पति से भरण-पोषण की मांग की थी. इसी तरह के झारखंड में एक महिला ने पति पर नपुंसकता और घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए गुजारा भत्ता मांगा था, लेकिन उसके आरोप साबित नहीं हो पाए. वहीं मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महिला की इसी तरह की याचिका खारिज कर दी. याचिकाकर्ता मायके में रहकर ब्यूटी पार्लर चला रही थी. राजस्थान हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि गुजारा भत्ता तत्काल आर्थिक सहारा देना है, पति पर आर्थिक बोझ डालना नहीं. आइए देखते हैं कि अदालतों ने पिछले दिनों गुजारा भत्ते को लेकर क्या फैसले सुनाए हैं.
इस मामले में याचिकाकर्ता महिला ने अपनी दो बेटियों के साथ मैसूरु फैमिली कोर्ट में पति से भरण-पोषण की मांग की थी. अजदालत ने पत्नी और बड़ी बेटी का दावा खारिज किया, जबकि छोटी बेटी के लिए विवाह या लाभकारी रोजगार मिलने तक हर महीने आठ हजार रुपये भरण-पोषण के रूप में मंजूर किया था. नवंबर 2023 में दिए अपने आदेश में अदालत ने पति को छोटी बेटी की शिक्षा पूरी होने तक उसका पूरा शैक्षणिक खर्च उठाने का निर्देश दिया था.
कैसे मिलता है भरण-पोषण का अधिकार
पत्नी ने अपने दावे को खारिज किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की. कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस डॉ. चिलकुर सुमलता ने भरण-पोषण की मांग करने वाली पत्नी की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि वैवाहिक घर छोड़ने का उचित और वाजिब कारण साबित नहीं होने पर पत्नी पति से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती. अदालत ने पाया कि पत्नी कोविड के दौरान बीमार माता-पिता और बहन की देखभाल के लिए मायके गई थी और बाद में पति के वापस लौटने के आग्रह के बावजूद वैवाहिक घर नहीं लौटी.
अदालत ने कहा कि भरण-पोषण का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता. इसके लिए पत्नी को यह साबित करना होता है कि पति ने उसका भरण-पोषण करने से इनकार किया या उसकी उपेक्षा की, वह स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है और पति के पास उसे बनाए रखने के पर्याप्त साधन हैं.
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दोनों का विवाह 1995 में हुआ था. उनके बीच 25 साल से अधिक समय तक कोई बड़ी वैवाहिक परेशानी नहीं रही. पति के मुताबिक 2021 में कोविड महामारी के दौरान पत्नी अपने माता-पिता और बहन की देखभाल के लिए मायके चली गई थी. वे कोविड से संक्रमित थे और इसी दौरान उसके पिता को दिल का दौरा भी पड़ा था. पति का कहना था कि कुछ समय बाद उसने पत्नी से वापस वैवाहिक घर लौटने का अनुरोध किया लेकिन वह नहीं आई. पति जब उसे वापस लाने के लिए उसके माता-पिता के घर गया तो पत्नी ने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी.
पति-पत्नी का विवाद
दूसरी ओर पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे पति की ओर से प्रताड़ना और क्रूरता का सामना करना पड़ा और वैवाहिक घर की परिस्थितियों ने उसे वहां से जाने के लिए मजबूर किया. हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि क्रूरता और प्रताड़ना के आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया. अदालत ने कहा कि केवल आरोप लगाए जाने से यह साबित नहीं होता कि पत्नी के पास वैवाहिक घर छोड़ने का उचित कारण था.
अदालत ने कहा कि ऐसे में परिवार अदालत द्वारा पत्नी को भरण-पोषण से वंचित करने का फैसला सही है. अदालत ने परिवार अदालत के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए पत्नी की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और छोटी बेटी के लिए परिवार अदालत के निर्देश में कोई बदलाव नहीं किया.
पति को नपुंसक बताकर मांगा भरण-पोषण
एक ऐसे ही मामले में झारखंड के सरायकेल खरसांवा जिले में एक पत्नी ने पति को नपुंसक और घरेलू हिंसा का आरोप लगाकर भरण-पोषण मांगा. लेकिन अदालत की जांच में यह बात साबित नहीं हो पाई. इस पर अदालत ने पत्नी के भरण पोषण दावा को खरिज कर दिया. सरायकेला की फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश वीरेश कुमार की अदालत में दायर याचिका में पत्नी ने पति पर नपुंसक होने के साथ-साथ घरेलू हिंसा और प्रताड़ना का आरोप लगाया था. यह मामला जिले के नीमडीह थाना क्षेत्र का है.
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आरोप लगाने वाली महिला का विवाह अप्रैल 2022 को हिंदू रीति से हुआ था.उसका आरोप था कि पति नपुंसक है और वह उसके साथ घरेलू हिंसा करता है. इसी आधार पर अक्टूबर 2022 में पत्नी पति का घर छोड़ मायके में रहने लगी. उसने पति से भरण-पोषण की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट की शरण ली. सुनवाई के दौरान पति ने अपनी शारीरिक जांच डॉक्टर से कराई.अदालत में पेश मेडिकल रिपोर्ट में पति को शारीरिक रूप से स्वस्थ बताया गया. पति ने पत्नी को वापस लाने के लिए वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के उद्देश्य से कुटुंब न्यायालय, सरायकेला में अलग वाद भी दायर किया था. इसमें उसे पत्नी के विरुद्ध डिक्री प्राप्त हुई थी. इस मामले में भी पति ने अपनी मेडिकल रिपोर्ट को साक्ष्य के रूप में पेश किया. अदालत ने सबूतों, मेडिकल रिपोर्ट और कानूनी तर्कों के आधार पर पत्नी के भरण-पोषण की याचिका को खारिज कर दिया.
बिना उचित कारण के अलग रहने पर क्या भरण-पोषण मिलेगा
वहीं मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस साल जुलाई में सुनाए एक फैसले में कहा कि पति का अपने माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल करना पत्नी के अलग रहने और भरण-पोषण मांगने का पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है. हाई कोर्ट के इंदौर बेंच के जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने फैमिली कोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को 10 हजार रुपये और दोनों बच्चों को 5-5 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था. कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी बिना उचित कारण पति से अलग रहती है, तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं होगी. हालांकि, अदालत ने दोनों नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण की राशि बढ़ाने का निर्देश दिया.
भरण पोषण महिला को सहारा देना है पति पर बोझ डालना नहीं
इसी तरह राजस्थान हाईकोर्ट ने इस साल मई में सुनाए एक फैसले में कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद पत्नी को तत्काल आर्थिक सहारा देना है, न कि पति पर ऐसा भारी बोझ डालना जिसे वह चुका ही न सके. जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने कहा कि अदालतों में वर्षों की देरी के बाद आवेदन की तारीख से बड़ी रकम का भुगतान करने का आदेश देना सीमित आय वाले व्यक्ति के लिए असहनीय हो सकता है. मामले में पत्नी ने 2014 में भरण-पोषण की मांग की थी, जबकि निचली अदालत ने 2025 में 2014 से 20 हजार रुपये मासिक देने का आदेश दिया था. हाईकोर्ट ने इसे बदलकर 2025 के आदेश की तारीख से भरण-पोषण देने का निर्देश दिया.
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