लॉटोलैंड आज का सितारा : रोहित कुलकर्णी ने इस गांव में शुरू की बच्ची के जन्म पर जश्न की परंपरा

'लॉटोलैंड आज का सितारा' रोहित कुलकर्णी एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, जिन्होंने गांव में काम करने के लिए एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ दी. 30 वर्षीय यह युवक ने गांव में हर बच्ची के जन्म को त्योहार और सार्वजनिक उत्सव में बदलकर सामाजिक परिवर्तन ला रहे हैं.

2004 में आशुतोष गोवारिकर की फिल्म स्वदेश आई थी. इस फिल्म में शाहरुख खान ने मोहन भार्गव की भूमिका निभाई थी जिन्हें 'कावेरी अम्मा' आत्मखोज की यात्रा पर भेजती हैं. वे एक दूर गांव में जाते हैं और पूरी तरह बदलकर लौटते हैं. इसी तरह रोहित कुलकर्णी की भी कहानी है. एमएनसी में काम करने वाले इस सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने तेलंगाना के हर दूसरे युवा की तरह ये सपना देखा कि वह भी सिलिकॉन वैली के लिए रवाना होंगे, लेकिन उनकी मां ने उन्हें एक साल गांव को देने और सेवा करने के लिए कहा. हरिदासपुर में ग्राम सचिव के रूप में रोहित ने काम करना शुरू किया और साढ़े तीन साल भी नहीं हुए पूरे कि रोहित अब खुद को अपने सपनों की इस भूमि से दूर जाते हुए नहीं देखना चाहते.

'लॉटोलैंड आज का सितारा' रोहित कुलकर्णी एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, जिन्होंने गांव में काम करने के लिए एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ दी. 30 वर्षीय यह युवक ने गांव में हर बच्ची के जन्म को त्योहार और सार्वजनिक उत्सव में बदलकर सामाजिक परिवर्तन ला रहे हैं.

जब एनडीटीवी ने गांव का दौरा किया तो इस आदिवासी गांव में बनोथ सरिता और आनंद के घर पर उत्सव का माहौल था, जिनके घर बच्ची आशीर्वाद के रूप में पैदा हुई थीं. न केवल आदिवासी लंबोदर बल्कि ऐसा लग रहा था कि तेलंगाना के हरिदासपुर गांव में हर कोई अपने घर पर नन्ही परी के आगमन का स्वागत करने के लिए  इकट्ठा हुआ हो. डांस में माता-पिता के साथ बड़े, चाचा-चाची आदि शामिल हुए. उसके बाद पूरे उल्लासभरे माहौल में बच्ची को ग्राम पंचायत ले जाया गया ताकि औपचारिक रूप से उनका सम्मान किया जा सके. ये गाना, डांस, उत्सव की रस्म अब गांव में हर बच्ची के जन्म की परंपरा बन गई है. पिछले ढाई साल में उन्होंने 85 बच्चियों के जन्म का जश्न मनाया है. गांव की ही सरिता कहती हैं कि पहले लड़के और लड़कियों के साथ अलग व्यवहार किया जाता था. अब लड़कियों के साथ भी समान व्यवहार किया जा रहा है.'

रोहित हमें 30 महीने की एक बच्ची भावयश्री के घर ले जाता है. वह नागेश गौड़ और सत्यवती की तीसरी और बिन मांगी बेटी के रूप में पैदा हुई थी. जब बच्ची के पैदा होने पर रोहित उनके घर गए तो वे हैरान रह गए थे कि खुशी की मुस्कान के बजाय क्रोध और आंसू थे. परिवार में इस बात को लेकर बवाल मचा था कि लो तीसरी भी बेटी पैदा हो गई. इसी के बाद रोहित ने फैसला किया कि इसे बदलने की जरूरत है और घोषणा की कि पूरा गांव बच्ची के जन्म का जश्न मनाएगा.

भव्यश्री की मां सत्यवती का कहना है कि जब उनकी तीसरी बेटी का जन्म हुआ तो बड़ी मुसीबत आ गई थी. मेरे तीनों बच्चे लड़कियां हैं. जब तीसरी का जन्म हुआ, तो परेशानी थी,  लेकिन अब मैं खुश हूं क्योंकि सचिव और सरपंच ने हमारा समर्थन किया. उन्होंने परिवार के सदस्यों को सलाह दी और कहा कि एक लड़की घर में देवी लक्ष्मी की तरह आती है.

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तीन लड़कियों के पिता नागेश गौड़ मानते हैं कि उन्हें वास्तव में एक बेटे की उम्मीद थी. हम थोड़े दुखी थे. सेक्रेटरी सर ने मुझमें विश्वास जगाया और उनके जन्म को उत्सव की तरह मनाया. मैंने सभी को खुश देखा और हम सब खा रहे थे और नाच रहे थे. मुझे अहसास हुआ कि बच्ची के जन्म पर शोक मनाना मेरी ओर से गलत था.