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केतन मर्डर केस में कोई चश्मदीद नहीं, क्या है 'पंचशील' टेस्ट? जिसके दम पर पुलिस कातिलों को दिलाएगी सजा

केतन मर्डर केस में कोई चश्मदीद गवाह नहीं है, इसलिए पुलिस सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'पंचशील सिद्धांतों' के तहत सबूत जुटा रही है. जानिए क्या होता है ये?

केतन मर्डर केस में कोई चश्मदीद नहीं, क्या है 'पंचशील' टेस्ट? जिसके दम पर पुलिस कातिलों को दिलाएगी सजा
पुलिस केतन हत्याकांड के आरोपियों को कैसे दिलाएगी सजा?
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  • पुणे के केतन हत्या मामले में पुलिस ने लोहगढ़ किले में सीन रीक्रिएशन किया
  • आरोपियों के चलने के तरीके की जांच कर फोरेंसिक गेट एनालिसिस के जरिए घटनास्थल पर मौजूदगी साबित करने की कोशिश
  • हत्या के मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं, केस को साबित करने में पंचशील सिद्धांत का करना होगा पालन

पुणे के केतन अग्रवाल मर्डर केस में कई खुलासे हो रहे हैं. केतन की मंगेतर सिया गोयल पर खाई में धक्का देकर जान लेने का आरोप है. सिया ने अपने कथित प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर इस वारदात को अंजाम दिया. इस बीच पुलिस आज भी सिया और चेतन को लेकर लोहगढ़ किले पहुंची. यहां पुलिस ने आरोपियों से पूछताछ करते क्राइम सीन रीक्रिएशन किया. कल भी पुलिस दोनों आरोपियों को लेकर यहां पहुंची थी. पुलिस ने गेट एनालिसिस यानी चलने के तरीके की भी जांच की, ताकि यह साबित किया जा सके कि चेतन ही वह हुड्डी पहने व्यक्ति था, जिसे हत्या के पहले केतन और सिया का पीछा करते हुए देखा गया था.

कोर्ट में केस साबित करना होगा चुनौती

पुलिस अधिकारियों और एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये दोनों कदम कोर्ट में केस साबित करने के लिए बहुत अहम होंगे क्योंकि हत्या का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है. सरकारी वकील को 1984 के ऐतिहासिक 'पंचशील' फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए उन मानकों को पूरा करना होगा, जो ऐसी विषम परिस्थितियों में सबूतों के आधार पर किसी को दोषी ठहराने से पहले जरूरी होते हैं.

आरोपी चेतन को बुधवार सुबह 7 बजे 25 से ज्यादा पुलिस अधिकारियों की टीम की कड़ी निगरानी में लोहगढ़ ले जाया गया, जबकि सिया को उससे एक दिन पहले वहां ले जाया गया था.

एक्सपर्ट्स ने बताया कि हत्या के मामले में आरोपी की मौजूदगी में घटनाक्रम को फिर से दोहराया जाता है. इससे पता चलता है कि आरोपी ने हत्या कैसे की, पीड़ित कहां खड़ा था, आरोपी उसके पास कैसे पहुंचा और हत्या किस तरह से की गई. इस री-एनेक्टमेंट को वीडियो रिकॉर्डिंग और गवाहों के जरिए रिकॉर्ड किया जाता है.

एक एक्सपर्ट ने कहा, 'गेट एनालिसिस यह साबित करने के लिए किया जाता है कि हत्या के दिन आरोपी घटनास्थल पर मौजूद था. आरोपी को उस जगह ले जाया जाता है और उसके चलने के तरीके, चेहरे के हाव-भाव, बॉडी लैंग्वेज, लंबाई और अंगों की लंबाई का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार किया जाता है.' उन्होंने कहा कि फोरेंसिक गेट एनालिसिस के रिकॉर्ड को कोर्ट में चुनौती देना मुश्किल होता है क्योंकि वे इस बात का सबूत होते हैं कि आरोपी घटनास्थल पर मौजूद था.

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क्या है पंचशील सिद्धांत?

1984 के शरद बिरधी चंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हत्या के मामले में चश्मदीद गवाह का न होना, अकेले ही आरोपी को बरी करने का आधार नहीं हो सकता.

कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में सबूतों के आधार पर उम्रकैद या मौत की सजा सुनाई जा सकती है. इसके लिए कोर्ट ने पांच बेहद सख्त शर्तें तय कीं, जिन्हें 'पांच गोल्डन सिद्धांत' या 'पंचशील' के नाम से जाना जाता है. ये शर्तें थीं:

  1. आरोपी के खिलाफ पेश की गई हर परिस्थिति और तथ्य पूरी तरह और पक्के तौर पर साबित होने चाहिए.
  2. सभी साबित तथ्य सिर्फ और सिर्फ आरोपी के दोषी होने की ओर इशारा करने चाहिए. यानी किसी और के शामिल होने का कोई शक नहीं रहना चाहिए.
  3. हालात और सबूत पूरी तरह ठोस, पक्के होने चाहिए, जिन्हें नकारा न जा सके.
  4. हालात ऐसे होने चाहिए कि आरोपी के बेगुनाह होने की हर तार्किक संभावना को पूरी तरह खत्म कर दें.
  5. सबूतों से एक ऐसी लगातार और पूरी कड़ी बननी चाहिए जो सिर्फ एक नतीजे पर ले जाए कि अपराध सिर्फ आरोपी ने ही किया था.
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केतन अग्रवाल मर्डर में भी होंगे लागू

केतन अग्रवाल मर्डर केस की जांच और कानूनी कार्यवाही पूरी तरह से इन्हीं पांच सिद्धांतों पर आधारित होगी.

एक एक्सपर्ट ने कहा, 'पुलिस के पास घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है. इसलिए लोहगढ़ में सीन रीक्रिएशन और गेट एनालिसिस कोर्ट के सामने इन 'हालात' को वैज्ञानिक तरीके से साबित करने की कोशिश है. पुलिस को कोर्ट में यह साबित करना होगा कि घटनाओं का क्रम- चेतन और सिया का घर से निकलना, लोहगढ़ पहुंचना, खुद घटना और उसके बाद के हालात  एक 'अटूट कड़ी' बनाते हैं जो सीधे तौर पर उन्हें कातिल साबित करते हैं.'

'पंचशील' सिद्धांत की एक अहम बात यह है कि अगर पुलिस जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों की कड़ी में एक भी जरूरी कड़ी टूट जाती है, तो बचाव पक्ष इसका फायदा उठा सकता है. एक्सपर्ट ने समझाया, 'अगर आरोपी के बेगुनाह होने की 1% भी तार्किक संभावना है, तो उन्हें 'बेनिफिट ऑफ डाउट' मिलेगा और उन्हें बरी किया जा सकता है.'

(इनपुट- पुणे से यशपाल सोनकांबले)

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