क्या अंतरिक्ष में उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों के आपस में टकराने का खतरा बढ़ रहा है? संसद के बजट सत्र में केंद्र सरकार ने इस सवाल का हां में जवाब दिया है. केंद्र सरकार में राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में बढ़ती भीड़ के कारण टकराव का जोखिम लगातार बढ़ रहा है और इसरो लगातार स्थिति की निगरानी कर रहा है.
LEO: सबसे व्यस्त और सबसे खतरनाक कक्षा
सरकार के मुताबिक, LEO यानी Low Earth Orbit पृथ्वी से 160-2000 किमी ऊंचाई का क्षेत्र है. यही वह कक्षा है जहां, सबसे अधिक सैटेलाइट मौजूद हैं. अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) भी इसी कक्षा में स्थित है. उपग्रह सबसे तेज गति से पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं. संचार, इंटरनेट, निगरानी और सेना से जुड़े अधिकतर सैटेलाइट यहीं तैनात रहते हैं.
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LEO में भीड़ बढ़ने की वजह से सैटेलाइट, रॉकेट के अवशेष और निष्प्रभावी यान एक-दूसरे से टकराने के उच्च जोखिम में रहते हैं.
क्या है खतरा?
ISRO ने सरकार को बताया कि कक्षा में अधिक भीड़ होने से टकराव की संभावना बढ़ती जा रही है. सैटेलाइट अपने मिशन पूरे होने के बाद भी कक्षा में घूमते रहते हैं, जिससे स्पेस डेब्रिस बढ़ता है. एक टकराव कई और टुकड़े बनाकर 'स्पेस जंक चेन रिएक्शन' पैदा कर सकता है. ऐसे हादसे सक्रिय उपग्रहों और नेविगेशन सिस्टम के लिए बड़ा खतरा हैं.
इसीलिए इसरो कोशिश करता है कि भारतीय सैटेलाइट कम भीड़ वाली कक्षाओं में भेजे जाएं.
दूसरी कक्षाएं कौन‑सी हैं?
LEO के बाद कक्षाएं इस प्रकार हैं-
- MEO (Medium Earth Orbit)
- GEO या Geosynchronous Orbit- लगभग 35,786 किमी
- High Earth Orbit
मौसम और संचार वाले स्थिर उपग्रह अधिकांशतः GEO में भेजे जाते हैं, क्योंकि वे पृथ्वी की घूर्णन गति के बराबर घूमते हैं और एक स्थान पर स्थिर दिखते हैं.
LEO में स्पेस जंक सबसे बड़ा खतरा
LEO में पुराने उपग्रह, रॉकेट के अवशेष, प्रयोग पूरे कर चुके यान, टकराव से बने हजारों छोटे‑बड़े टुकड़े लगातार खतरा पैदा करते हैं.
ISOR की बड़ी पहल: 2030 तक LEO को 'कचरा‑मुक्त' करना. बढ़ते खतरे को देखते हुए इसरो ने 2024 में Space Debris Mitigation Mission शुरू किया है. लक्ष्य है कि 2030 तक LEO को भारतीय सैटेलाइटों के कचरे से मुक्त करना.
इस मिशन में सरकारी व गैर‑सरकारी दोनों उपग्रह शामिल होंगे. मिशन खत्म होने पर सैटेलाइट को डी‑ऑर्बिट करने के लिए रॉकेट में अतिरिक्त ईंधन अनिवार्य रूप से रखा जा रहा है. सैटेलाइट्स को नियंत्रित तरीके से वातावरण में प्रवेश कर नष्ट किया जाएगा.
जैसे-जैसे पृथ्वी के निचली कक्षा में उपग्रहों की भीड़ बढ़ रही है, अंतरिक्ष में टकराव का खतरा बढ़ता जा रहा है. भारत ने इस चुनौती को पहचानते हुए न सिर्फ अपने उपग्रहों की सुरक्षित कक्षाएं चुनी हैं, बल्कि 2030 तक LEO को कचरा‑मुक्त करने का लक्ष्य भी तय किया है- जो वैश्विक स्पेस सुरक्षा में भारत का महत्वपूर्ण योगदान होगा.
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