- अमेरिका और ईरान के समझौता पर इजरायल ने सुरक्षा मुद्दे को लेकर चिंता जताई
- इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने कहा कि परमाणु प्रोग्राम और बैलिस्टिक मिसाइल मुद्दे अभी भी चिंता का कारण
- इजरायल ने ईरान के परमाणु हथियार बनाने की समय सीमा बढ़ाई और सुरक्षा के लिए तीन बफर जोन बनाए हैं
मिडिल ईस्ट में कई महीनों के संघर्ष के बाद आखिरकार अमेरिका-ईरान के बीच समझौते पर बात बन गई है. लेकिन इस समझौते पर भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने चिंता जताई है. उनका कहना है कि भले ही युद्धविराम हो गया है और होर्मुज स्ट्रेट फिर से खुल गया है, लेकिन इजरायल की सुरक्षा के लिए खतरा बने अहम मुद्दों को सुलझाने के बजाय सिर्फ टाल दिया गया है.
इजरायल को किस बात की चिंता?
NDTV के सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर आदित्य राज कौल के साथ एक इंटरव्यू में अजार ने कहा कि यह डील असल में होर्मुज से तुरंत गुजरने की सुविधा के बदले भविष्य में उन मुद्दों पर बातचीत का वादा है जिन्हें इजरायल अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है. इसमें ईरान का परमाणु प्रोग्राम, बैलिस्टिक मिसाइल का जखीरा और क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों को उसका समर्थन शामिल है.
राजदूत ने ये बातें हमास के 7 अक्टूबर को इजरायल पर हमले के बाद शुरू हुई जंग को लेकर कहीं. यह जंग बाद में ईरान और उसके प्रॉक्सी ग्रुप हिज्बुल्लाह के साथ सीधे टकराव में बदल गई. अजार ने कहा कि इजरायल ने ईरान के परमाणु हथियार बनाने की समय-सीमा को 'कुछ हफ्तों' से बढ़ाकर 'दो साल से ज्यादा' कर दिया है. साथ ही इजरायल ने तेहरान की बैलिस्टिक मिसाइल बनाने की क्षमता को भी कम किया है और इजरायली नागरिकों की सुरक्षा के लिए गाजा, लेबनान और सीरिया में तीन सुरक्षा बफर जोन बनाए हैं.
उन्होंने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के उस अनुमान का जिक्र किया जिसके मुताबिक इस संघर्ष से ईरान की अर्थव्यवस्था को लगभग एक ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है. उन्होंने कहा कि भले ही नई डील के तहत तेहरान को प्रतिबंधों से राहत मिल जाए, लेकिन उन्हें यह तय करना होगा कि वे इस राहत का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियारों के कार्यक्रम को फिर से खड़ा करने में करेंगे या इसे ईरानी जनता को देंगे.
इजरायल और अमेरिका की अलग-अलग राय
जब उनसे नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बीच मतभेद के बारे में पूछा गया, तो अजार ने रणनीतिक लक्ष्यों को लेकर किसी भी तरह के मतभेद से इनकार किया. लेकिन उन्होंने टैक्टिकल मतभेदों को स्वीकार किया और इसकी वजह अलग-अलग नेशनल इंटरेस्ट को बताया. उन्होंने कहा कि इजरायल और अमेरिका के नजरिए अलग-अलग हो सकते हैं क्योंकि उनके इंटरेस्ट भी अलग-अलग हैं. उन्होंने वॉशिंगटन के फैसलों पर असर डालने वाले कुछ कारणों की ओर इशारा किया, जैसे कि दुनिया भर में ऊर्जा की कीमतें और ईरान से खतरा महसूस करने वाले दूसरे देशों का दबाव. उन्होंने कहा कि ईरान ने जान-बूझकर उत्तरी इजरायल पर हिज्बुल्लाह के हमलों का इस्तेमाल दोनों सहयोगियों के बीच दरार पैदा करने के लिए किया.
ईरान के न्यूक्लियर एनरिचमेंट पर उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर तेहरान की लगातार चुप्पी 'बहुत चिंता की बात' है. उन्होंने तर्क दिया कि इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी ने ईरान को धोखाधड़ी करते हुए पाया था, इसलिए उन्हें एनरिचमेंट की गतिविधि जारी रखने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए और उनके फिसाइल मटीरियल को हटा दिया जाना चाहिए.
पाकिस्तान को लेकर क्या बोले?
अजार ने ईरान-अमेरिका के बीच समझौते पर मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान की भूमिका की कड़ी आलोचना की. उन्होंने हमास के लोगों और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के बीच संबंध होने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, 'हमें पाकिस्तान पर भरोसा नहीं है.' साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कतर का व्यवहार भी बहुत धोखेबाजी वाला रहा है.
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'भारत-इजरायल का संबंध लंबे समय के भरोसा वाला'
इस डील पर भारत की प्रतिक्रिया के बारे में बात करते हुए, अजार ने अपनी सरकार को इजरायल के विदेश मंत्रालय के पूर्व प्रवक्ता एलोन लेवी की टिप्पणियों से अलग किया. लेवी ने इस समझौते को भारत के लिए एक आपदा बताया था और नई दिल्ली से ईरान और पाकिस्तान के प्रति तटस्थता छोड़ने का आग्रह किया था. अजार ने इसे 'उनकी निजी राय' बताया. उन्होंने भारत-इजरायल संबंधों की तारीफ करते हुए कहा कि ये 'लंबे समय के भरोसे' पर आधारित हैं.
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