आज 21 अगस्त है. इतिहास के पन्नों में ये तारीख एक ऐसी शख्सियत के नाम दर्ज है, जिसने अपने वक्त की तमाम बंदिशों को अपनी कलम की नोक से तार-तार कर दिया. हम बात कर रहे हैं उर्दू साहित्य की उस बेखौफ आवाज की, जिसे दुनिया इस्मत चुगताई के नाम से जानती है. साल 1911, उत्तर प्रदेश का बदायूं. ये वो दौर था जब महिलाओं को 'पर्दे' और चारदीवारी में कैद रखा जाता था, लेकिन इस्मत तो जैसे बगावत का दूसरा नाम थीं.
लिहाफ की कहानी और लाहौर हाईकोर्ट में केस
बात 1942 की है. उन्होंने एक ऐसी कहानी लिखी जिसने पूरे हिंदुस्तान में भूचाल ला दिया. कहानी का नाम था- 'लिहाफ'. बंद दरवाजों के पीछे महिलाओं की दबी हुई इच्छाओं और समलैंगिकता पर उन्होंने इतनी बेबाकी से लिखा कि उनके खिलाफ लाहौर हाईकोर्ट में अश्लीलता और राजद्रोह का मुकदमा ठोक दिया गया. लेकिन क्या वो डरीं? बिल्कुल नहीं. वो अदालत में डटकर लड़ीं, मुकदमा जीतीं और दुनिया को बता दिया कि उनकी कलम किसी की मोहताज नहीं है. इस्मत ने 'लिहाफ' से वो कर दिखाया था जिसकी उस दौर में कोई महिला कल्पना भी नहीं कर सकती थी. उन्होंने समाज की सबसे दुखती नब्ज पर हाथ रख दिया था- महिलाओं की अनकही यौन इच्छाएं और समलैंगिकता (होमोसेक्सुअलिटी). 'लिहाफ' को सिर्फ एक कहानी के चश्मे से मत देखिए. अगर आप इसे गहराई से समझेंगे, तो पाएंगे कि ये जेंडर, क्लास और ब्रिटिश गुलामी के मिले-जुले शोषण पर किया गया एक करारा प्रहार था.

इस कहानी ने उस दौर की महिला लेखिकाओं के लिए खींची गई 'लक्ष्मण रेखा' को हमेशा के लिए पार कर लिया. इस्मत चुगताई ने वो बंद दरवाजा खोल दिया, जिससे होकर आने वाली कई पीढ़ियों की लेखिकाओं ने समाज के तमाम वर्जित (taboo) और अछूते मुद्दों पर बेखौफ होकर अपनी आवाज बुलंद की.
ये भी पढ़ें: 4 साल की उम्र में बने जोधपुर के महाराजा, इंदिरा गांधी के फैसले से बदल गया सारा खेल, गज सिंह ने उम्मेद भवन को बनाया 25 हजार करोड़ की प्रॉपर्टी
वो प्रगतिशील लेखक संघ की जान थीं. मुंशी प्रेमचंद, सआदत हसन मंटो, कृष्ण चंदर जैसे दिग्गजों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस्मत ने उर्दू अदब को एक नई शक्ल दी. उनकी कहानियों में मध्यमवर्गीय समाज का वो दोहरा चरित्र नजर आता है, जिसे लोग अक्सर कालीनों के नीचे छिपाने की कोशिश करते हैं. उन्होंने समाज के खोखलेपन, महिलाओं के दमन, पितृसत्ता की आंखों में आंखें डालकर तीखे सवाल पूछे. और उनकी भाषा? वो आगरा और लखनऊ के घरों में बोली जाने वाली आम उर्दू और मुहावरों का ऐसा तीर चलाती थीं, जो सीधे निशाने पर लगता था.

भारत-पाकिस्तान बंटवारे पर बनी फिल्म 'गर्म हवा'
सिनेमा के पर्दे पर भी उनका सिक्का चला. 1973 में आई एमएस सथ्यू की आइकॉनिक फिल्म 'गर्म हवा' याद है आपको? ये इस्मत आपा की ही एक अनपब्लिश्ड कहानी पर बनी थी, जिसके लिए उन्हें बेस्ट स्क्रीनप्ले का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला.
टेढ़ी लकीर, जिद्दी, एक कतरा-ए-खून, कलियां, चोटें, एक बात उनकी प्रमुख रचनाएं हैं जो आज भी लोगों को झकझोर देती हैं.
जाते-जाते भी वो दुनिया को चौंका कर गईं. अपनी शर्तों पर जीने वाली इस बागी लेखिका की आखिरी ख्वाहिश थी कि मरने के बाद उन्हें दफनाया न जाए. और बिल्कुल वैसा ही हुआ, मुंबई के चंदनवाड़ी श्मशान घाट में उनका दाह-संस्कार किया गया.
ये भी पढ़ें: जिसके नाम से कांपता था रणथम्भौर, वो बाघ 'उस्ताद' अपनी 'नूर' के आगे बन जाता था भीगी बिल्ली, जुदाई देखकर रो पड़ा सारा जंगल

सआदत हसन मंटो
लोग उन्हें उर्दू साहित्य की 'लेडी मंटो' कहते हैं. लेकिन सच तो ये है कि इस्मत सिर्फ इस्मत थीं- बेखौफ, बेधड़क और बेमिसाल.
ये भी पढ़ें: मिजोरम के इस शख्स की मौत से 39 औरतें हो गईं विधवा, 4 दिन तक नहीं होने दिया अंतिम संस्कार, दुनिया आज करती है सैल्यूट
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं