क्या वोटर लिस्ट में नाम हटाने की प्रक्रिया वास्तव में दिल्ली से सेंट्रलाइज्ड तरीके से संचालित होती है? क्या वोटर लिस्ट डेटाबेस को सेंट्रलाइज्ड कर दिया गया है? तो जवाब है-बिल्कुल नहीं. अब समझिए ऐसा कहने के पीछे कारण क्या हैं और एक लाइन में इसका उत्तर 'नहीं' क्यों है.
भारत में 4,000 से अधिक Electoral Registration Officers (EROs) मतलब निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी हैं, जो अलग-अलग प्रशासनिक पृष्ठभूमि से आते हैं और देश के विभिन्न हिस्सों में वोटर लिस्ट प्रक्रिया को संभालते हैं. यदि यह आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार या दिल्ली में बैठी कोई सेंट्रल टीम सीधे तौर पर योग्य मतदाताओं के नाम काट रही थी, तो इस दावे के समर्थन में दस्तावेजी प्रमाण क्या है?
यहां समझें क्या बदला और क्यों
- Representation of the People Act (RPA) के तहत वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने की वैधानिक प्रक्रिया ERO के स्तर पर होती है और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया जाता है. ERO इस प्रक्रिया में एक सक्षम वैधानिक ऑथोरिटी हैं. ऐसे में केवल मुख्य चुनाव आयुक्त का नाम लेकर पूरे वोटर लिस्ट रीविजन को एक व्यक्ति की व्यक्तिगत कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करना उस व्यापक संस्थागत निर्णय-प्रक्रिया की चेन और ERO की वैधानिक भूमिका को नजरअंदाज करता है. यदि सेंट्रलाइज्ड इंटरफेयरेंस का आरोप है, तो उसे स्थापित करने के लिए केवल आरोप नहीं, बल्कि दस्तावेजी या प्रक्रियात्मक साक्ष्य भी सामने रखना होगा. वोटर डेटाबेस के विकेंद्रीकरण में ERONET की भूमिका पहले भी डीसेंट्रलाइज्ड था और आज भी डीसेंट्रलाइज्ड ही है.
- सरल कारण यह है कि वोटर लिस्ट हर राज्य के ERO द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त की देखरेख में, तैयार और मेंटेन किया जाता है. इसलिए इसकी व्यवस्था शुरू से ही डीसेंट्रलाइज्ड रही है, और आज भी वैसी ही है. सच्चाई यह है कि ECINET के ERONET मॉड्यूल के तहत वोटर लिस्ट डेटाबेस को कभी भी सेंट्रलाइज्ड नहीं किया गया है. हर राज्य का वोटर लिस्ट डेटाबेस पहले की तरह डीसेंट्रलाइज्ड ही है और ERO के सभी वैधानिक तथा प्रक्रियात्मक अधिकार पहले की तरह बरकरार हैं.
- सिस्टम डिजिटल हुआ है, लेकिन वोटर लिस्ट की वैधानिक ऑथोरिटी और डीसेंट्रलाइज्ड स्ट्रक्चर में कोई बदलाव नहीं हुआ है. डिजिटल व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि काम आसान और पेपरलेस हो सके. पहले फिजिकल फॉर्म की वजह से समस्या यह होती थी कि लोग ट्रांसफर या घर बदलने पर पुरानी जगह से नाम नहीं कटवाते थे. नई जगह नाम जुड़वा लेते थे, क्योंकि पुरानी जगह से हटवाने के लिए अलग से फिजिकल आवेदन देना पड़ता था, जो लंबी और कठिन प्रक्रिया थी.
- अब डिजिटल सिस्टम ने इसे सरल बना दिया है. जैसे ही कोई मतदाता नई विधानसभा में खुद को पंजीकृत करता है और वह पहले कहीं और रजिस्टर्ड था, तो पुरानी विधानसभा में उसका फॉर्म 7 ऑटोमेटिक जेनरेट हो जाता है. पुरानी जगह का ERO संबंधित व्यक्ति को नोटिस भेजता है कि आप यहां से जा चुके हैं, क्या आपका नाम हटा दिया जाए? फिर प्रोपर वेरिफिकेशन और हियरिंग के बाद फाइनल डिस्पोजल करता है. यानी डिजिटल होने से काम आसान हुआ, ट्रांसपैरेंसी बढ़ी, लेकिन अधिकार और जिम्मेदारी पूरी तरह ERO के पास ही रही.
- यह भी एक भ्रामक नैरेटिव के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें वोटर लिस्ट की विकेंद्रीकृत और वैधानिक प्रक्रिया को एक व्यक्ति या केंद्रीय टीम की प्रत्यक्ष कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. इस तरह की प्रस्तुति से जनता में चुनाव आयोग के प्रति अविश्वास और आक्रोश पैदा होने की संभावना रहती है. आलोचकों के अनुसार, ऐसे दावे चुनाव आयोग की संवैधानिक और संस्थागत भूमिका को कमजोर करने की धारणा को बढ़ावा दे सकते हैं. हालांकि, किसी भी दावे के पीछे मंशा या उद्देश्य निर्धारित करने के लिए केवल नैरेटिव के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय उसके स्रोत, दस्तावेजी साक्ष्य और प्रक्रियात्मक तथ्यों की जांच आवश्यक है.
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