क्या है 5जी वारफेयर, जिसकी NDTV डिफेंस समिट में दिखी गूंज; रक्षा मंत्री से आर्मी चीफ तक ने किया जिक्र

आइए जानते हैं, आखिर 5जी वारफेयर क्या है और इसे ही हाइब्रिड वारफेयर क्यों कहा जाता है... 

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने NDTV डिफेंस समिट में 5जी वारफेयर की बात की तो वहीं सेना प्रमुख धीरज सेठ ने भी इसका जिक्र किया. कई मेहमानों ने युद्धों की बदलती तकनीक जिक्र करते हुए हाइब्रिड वारफेयर से लेकर 5जी वारफेयर तक की बात कही. रक्षा मंत्री ने तो इसका जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि अब युद्ध सिर्फ सीमा पर ही नहीं लड़े जाते. ऐसे में सवाल यह है कि आखिर 5जी वारफेयर क्या है, जिसकी डिफेंस समिट में इतनी चर्चा देखने को मिली. ऑपरेशन सिंदूर के बाद युद्ध का परिदृश्य भी बदला है. यूक्रेन, ईरान, रूस से लेकर इजरायल और तुर्की तक ने ड्रोन वारफेयर, साइबर वारफेयर जैसी चीजों को जंग में प्रभावी हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है. भारत भी इस दिशा में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है और विशेषज्ञता भी हासिल करने का प्रयास कर रहा है. आइए जानते हैं, आखिर 5जी वारफेयर क्या है और इसे ही हाइब्रिड वारफेयर क्यों कहा जाता है... 

युद्ध की तकनीकें समय के साथ बदलती रही हैं. कभी हाथी ही युद्ध में सवारी थे और फिर चपलता कम होने के चलते इनकी जगह घोड़ों ने ली थी. इसके अलावा कभी तोप ने युद्ध के तरीको में बदलाव किया तो कभी फाइटर जेट शामिल हुए तो तस्वीर ही बदल गई. युद्ध के मैदानों में तकनीकों के तेजी से होते बदलाव को ही कालक्रम के अनुसार 1 जी से 5जी तक में विभाजित किया गया है. वर्तमान समय में आए बदलावों को 5जी वारफेयर की संज्ञा दी गई है.  इस तरह 1जी, 2जी और अब 5जी वारफेयर तक का सफर युद्धक्षेत्र में पूरा हो चुका है. एक दौर में जो तरीके अमल में आते थे, उनमें से कुछ अब भी कालबाह्य भले न हुए हों, किंतु कई का सम्मिश्रण नए परिवेश में देखने को मिलता है.

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यही वजह है कि अब नए दौर के युद्ध को हाइब्रिड वारफेयर भी कहा जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि नए दौर की युद्ध की तकनीकों के साथ ही कुछ पुरानी चीजें भी जस की तस हैं. इस बात का जिक्र जनरल धीरज सेठ ने भी किया, जब उन्होंने कहा कि आज भी जंग में योद्धा अहम है. इसके अलावा जमीन पर हासिल की गई जीत ही निर्णायक और निर्विवाद है. जानकार मानते हैं कि हाइब्रिड वारफेयर मिक्स ऑफ वारफेयर है. इसमें युद्ध में नई तकनीकों का प्रयोग तो होता ही है. इसके साथ ही पुराने दौर में इस्तेमाल किए जाने वाले तरीके भी इस्तेमाल किए जाते हैं.

युद्धों की प्रकृति के आधार पर भी नए दौर की जंगों के कई नामकरण किए गए हैं. इन नामों से कुछ हैं- ग्रे जोन वारफेयर, पॉलिटिकल वारफेयर, साइबर वारफेयर, इन्फॉर्मेशन वारफेयर और इकनॉमिक वारफेयर. इसीलिए हाइब्रिड वारफेयर की परिभाषा को आसानी से समझने के लिए सबसे सटीक शब्द के तौर पर मिक्स ऑफ वारफेयर का इस्तेमाल किया जाता है.

कभी तीर-धनुष और तलवार थे हथियार, अब बने मेले के खिलौने

दरअसल तकनीक और नए आविष्कारों के साथ युद्ध लड़ने के तरीकों और रणनीतियों में बदलाव होता रहा है. वर्तमान दौर में लाइन ऐंड कॉलम पद्धति से सेनाओं का लड़ना पुरानी बात हो गया है. इसी तरह तलवारबाजी के करतब दिखाते हुए हमले करना भी सदियों पुरानी बात हो चली है. कभी तीर- कमान भी हथियार ही थे, किंतु आज ये किसी मेले के खिलौने रह गए हैं. वजह यही कि तकनीक और तरीकों में इतनी तेजी से बदलाव हुए हैं कि कल के युद्ध में अनिवार्य रहीं चीजें आज जरूरी नहीं हैं. भारत में ही वारफेयर के इतिहास की बात करें तो रामायण, महाभारत काल में तीर-धनुष और रथ युद्ध के मुख्य उपकरण थे. किंतु एक दौर में रथ युद्ध से हटते चले गए. भारत में हाथियों का भी इस्तेमाल काफी होता था, लेकिन सिकंदर के हमले में घोड़ों का इस्तेमाल किया गया और कहा जाता है कि पोरस की सेना हाथियों पर सवार थी, जिसे देख खुद सिकंदर भी हैरान था. 

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सिकंदर आया तो लड़ाई हाथी से शिफ्ट होकर घोड़ों पर पहुंची

हाथी देखने में तो विशालकाय थे, लेकिन चपलता में कम थे. पोरस पर सिकंदर के भीषण हमले में उसे अपने घोड़ों से भी मदद मिली थी। इस प्रकार भारत ने युद्ध में घोड़ों के महत्व को समझा. इसी प्रकार 1526 में बाबर ने जब भारत पर आक्रमण किया तो सिकंदर लोदी की सेना 30 से 40 हजार के करीब थी, जबकि बाबर के पास 15,000 सैनिक ही थे. पानीपत की इस पहली लड़ाई में विजय बाबर की ही हुई थी और इसके लिए उसकी बेहतर रणनीति और हथियारों की उपलब्धता को वजह माना जाता है. बाबर की सेना में सबसे बड़ी ताकत 24 तोपों की थी, जिनसे गोले दागे जाने से युद्ध का रुख ही बदल गया था. यह उन पहली लड़ाइयों में से एक थी, जिसमें मुगलों ने बारूद, आग्नेयास्त्रों और तोपों का प्रयोग किया. भारत के लिए यह नया अनुभव था और वर्तमान शासकों के लिए तोप एक पहेली के समान थी. 

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

जब बाबर के आने से भारत में जंगों का हिस्सा बनी तोप, बदली तस्वीर

इस प्रकार भारत ने युद्ध में एक नई तकनीक का अनुभव किया और फिर स्वदेशी शासकों ने भी तोपों के निर्माण पर जोर दिया. भारत के लिए युद्ध के मैदान में तोपों का इस्तेमाल एकदम नया आविष्कार था और यहां से वारफेयर में एक नए युग की शुरुआत हुई थी. 21 अप्रैल, 1526 को इब्राहिम लोदी से हुई बाबर की जंग में जय और पराजय के अलावा मुगल आक्रांता की युद्ध रणनीति एवं तकनीक की आज भी चर्चा की जाती है. पानीपत के इस प्रथम युद्ध में बाबर की तुलुगमा और उस्मानी पद्धति की आज भी चर्चा की जाती है. इस तरह युद्ध लगातार बदलते रहे हैं. ऐसे ही भारत पर जब जम्मू-कश्मीर में  1947-1948 में पाकिस्तान ने हमला किया था तो वह प्रॉक्सी वारफेयर था. 

1948 में श्रीनगर में उतरती भारतीय सेना

1948 में श्रीनगर में उतरती भारतीय सेना

पाकिस्तान ने 1947-48 में ही थोपा था भारत पर छद्म युद्ध

गिलगित-बाल्टिस्तान और मुजफ्फराबाद के इलाके में पाकिस्तानी सेना के ही जवान कबायली वेश में आकर घुसे थे. यह छद्म युद्ध की शुरुआत थी. फिर कारगिल के हमले में भी ऐसी ही स्थिति दिखी और सीमा पार आतंकवाद से तो भारत लगातार कई दशकों से जूझ रहा है. यह सीमा पार आतंकवाद इस बात का प्रमाण है कि कैसे जंग में नॉन-स्टेट एक्टर्स का इस्तेमाल किया जाता है. भारत लगातार इस खतरे का सामना कर रहा है और अब तो सीमा पार से कई बार ड्रोनों का इस्तेमाल भी बढ़ा है. साइबर हैकिंग, ड्रोन वारफेयर और हनी ट्रैप जैसी चीजों का इस्तेमाल पाकिस्तान ने बीते कुछ सालों में तेजी से बढ़ाया है. इस तरह भारत और पाकिस्तान के बीच भी अब 5जी वारफेयर प्रत्यक्ष रूप में मौजूद है. यही कारण है कि एनडीटीवी के डिफेंस समिट में भी इसकी गूंज सुनाई दी. डिफेंस मिनिस्टर राजनाथ सिंह, आर्मी चीफ धीरज सेठ समेत रक्षा क्षेत्र के तमाम जानकारों ने इसकी बात की और इसके अनुसार देश की तैयारियों पर भी जोर दिया.