- सिंधु घाटी सभ्यता लगभग पांच हजार से ढाई हजार वर्ष पहले उत्तर-पश्चिम भारत और पाकिस्तान में विकसित हुई थी
- IIT गांधीनगर के शोध में पता चला कि लगातार भीषण सूखे और तापमान वृद्धि ने सभ्यता को धीरे-धीरे समाप्त किया
- चार लंबे सूखे अवधि आईं, जिनमें सबसे लंबा सूखा 164 साल तक चला और 91 प्रतिशत क्षेत्र को प्रभावित किया
भारत के इतिहास की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक यह रही है कि आखिर क्यों और कैसे दुनिया की सबसे प्राचीन शहरी सभ्यताओं में से एक सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilisation) कैसे खत्म हुई. हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, राखीगढ़ी और लोथल जैसे शानदार शहरों को छोड़कर लोग क्यों चले गए? अब IIT गांधीनगर के रिसर्चर ने इस रहस्य पर रोशनी डाली है. उनका कहना है कि यह सब अचानक नहीं हुआ, बल्कि लगातार पड़ने वाले भीषण सूखे ने इस सभ्यता को धीरे-धीरे खत्म कर दिया.
कब और कैसी थी यह सभ्यता?
सिंधु घाटी सभ्यता, जिसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है, लगभग 5,000 से 3,500 साल पहले उत्तर-पश्चिम भारत और पाकिस्तान के क्षेत्रों में फली-फूली थी. यह दुनिया की शुरुआती शहरी सभ्यताओं में से एक थी. शहरों में उन्नत जल निकासी प्रणाली थी. धातु शिल्प इतना विकसित था कि प्रसिद्ध ‘डांसिंग गर्ल' जैसी मूर्तियां बनाई गईं. व्यापार नेटवर्क और जल प्रबंधन के लिए यह सभ्यता मशहूर थी.
शोध में क्या सामने आया?
IIT गांधीनगर के प्रोफेसर विमल मिश्रा और उनकी टीम ने ‘Communications Earth and Environment' जर्नल में प्रकाशित शोध में बताया कि सभ्यता के दौरान औसत वार्षिक वर्षा में 10-20% की कमी आई. तापमान लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा, 4 बड़े सूखे आए, जिनमें से हर एक 85 साल से ज्यादा लंबे वक्त तक चला. सबसे लंबा सूखा का दौर 164 साल तक चला और इसने सभ्यता के 91% क्षेत्र को प्रभावित किया. इन सूखों ने जल उपलब्धता को गंभीर रूप से घटा दिया. में हाई-रिज़ॉल्यूशन जलवायु मॉडल और भूवैज्ञानिक साक्ष्यों (जैसे गुफाओं के स्टैलैक्टाइट्स और झीलों के अवसाद) का इस्तेमाल किया गया.
कृषि और बसावट पर असर
शुरुआती दौर में बस्तियां अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में थीं, मगर सूखे की मार की वजह से लोग सिंधु नदी के किनारे बसने लगे. किसानों ने गेहूं और जौ छोड़कर सूखा-सहनशील बाजरा उगाना शुरू किया, लेकिन यह भी लंबे सूखे का सामना नहीं कर सका. आखिरकर बड़े शहरों को छोड़कर लोग छोटे ग्रामीण समुदायों में बिखर गए.
वैश्विक जलवायु कारक
शोध में यह भी बताया गया कि अल नीनो घटनाएं और नॉर्थ अटलांटिक में ठंडक ने भारतीय मानसून को कमजोर किया. प्रशांत और हिंद महासागर के गर्म होने से भूमि-समुद्र तापमान अंतर घटा, जिससे मानसूनी बारिश में भी कमी आई.
अचानक नहीं, धीरे-धीरे हुआ पतन
पहले यह माना जाता था कि सभ्यता अचानक खत्म हो गई, लेकिन शोध बताता है कि यह एक धीमी और जटिल प्रक्रिया थी. सूखे के साथ सामाजिक और आर्थिक दबावों ने मिलकर सभ्यता को छोटे-छोटे समूहों में बांट दिया.
आज के लिए सबक
यह शोध बताता है कि जटिल समाज पर्यावरणीय तनाव के प्रति कितने संवेदनशील होते हैं. पानी का प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन आज भी उतना ही मायने रखता है, खासकर जब आधुनिक दुनिया जलवायु परिवर्तन और जल संकट का सामना कर रही है. शोधकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा समय में ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारतीय मानसून में अधिक वर्षा जुड़ सकती है, जो एक राहत की बात है.
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