- इतिहास में समुद्री शक्ति रखने वाले देशों ने वैश्विक प्रभुत्व स्थापित किया है, जैसे रोमन, ब्रिटिश साम्राज्य
- भारत ने जापान के साथ हिंद-प्रशांत महासागर में मुक्त आवागमन और डिफेंस सहयोग बढ़ाने पर समझौते किए हैं
- भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के लिए स्वदेशी क्षमता बढ़ा रहा है और चीन पर निर्भरता कम कर रहा है
इतिहास गवाह है कि समंदर पर जिस-जिस देश ने राज किया है, उसने दुनिया पर राज किया है. रोमन साम्राज्य से लेकर पुर्तगाली राज तक, ओटोमन साम्राज्य से लेकर ब्रिटिश राज तक और फिर अमेरिका के वर्चस्व तक को अगर देखा जाए तो ये बात साबित होती है. चीन का उदय भी दुनिया ने तभी माना जब उसने अपनी नौसेना को शक्तिशाली किया. अब भारत भी इसी रास्ते पर बढ़ निकला है.
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की विदेश यात्राओं पर नजर डालें तो इसका मकसद समंदर ही नजर आता है. पीएम मोदी 6 से 11 जुलाई तक तीन देशों इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा करेंगे. अगर इन देशों को देखें तो इंडोनेशिया हिंद महासागर में एक रणनीतिक जगह पर है. न्यूजीलैंड दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर के पास एक द्वीपीय देश है. ऑस्ट्रेलिया भी द्वीपीय देश है. इसके पूर्व में प्रशांत महासागर और पश्चिम और उत्तर पश्चिम में हिंद महासागर है. किसी भारतीय प्रधानमंत्री की 40 वर्षों में पहली और पीएम मोदी की पहली आधिकारिक न्यूजीलैंड यात्रा है. इन तीनों देशों की यात्रा के जरिए भारत समंदर में एक रणनीतिक बढ़त लेना चाहता है.
कैसे लेगा भारत बढ़त
तो आपको पता होगा कि चीन प्रशांत महासागर में है. इस महासागर का पश्चिमी भाग चीन के पूर्वी तट से लगता है. इसे चीन दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर कहता है. जापान और ताइवान भी प्रशांत महासागर में ही हैं. अभी बृहस्पतिवार को ही जापान की पीएम की नई दिल्ली में मौजूदगी के दौरान भारत-जापान के बीच कई समझौते हुए. इसमें हिंद और प्रशांत महासागर में दोनों देशों ने मुक्त आवागमन पर सहयोग का वादा किया. साथ ही डिफेंस सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया. क्वाड पहले ही हिंद और प्रशांत महासागर को लेकर एक्टिव है. दुनिया भर के एक्सपर्ट और सुरक्षा एजेंसियां ये मानकर चल रही हैं कि अगर तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो वो प्रशांत महासागर में ही होगा और उसकी गूंज हिंद महासागर तक सुनाई देगी. कारण अगर चीन ने ताइवान पर अटैक किया और अगर अमेरिका ने अपनी सेना भेजी तो जाहिर है कि ये बहुत ही भयानक जंग होगी. ताइवान पर अगर अमेरिका ने अपने मित्र देशों के साथ मिलकर चीन को नहीं रोका या ऐसा करने में असफल रहा तो इसके बाद चीन अपनी मनमानी पर आ जाएगा. फिर जापान से लेकर भारत और यूरोप और यहां तक की अमेरिका की भी मुश्किलें बढ़ जाएंगी.

भारत को क्या फायदा
भारत के दो पड़ोसी पूरी तरह से उसके खिलाफ हैं. चीन और पाकिस्तान से उसका विवाद है. ऑपरेशन सिंदूर में तो चीन ने खुलकर पाकिस्तान की मदद की. रूस अब चीन-पाकिस्तान के गठजोड़ के खिलाफ भारत की मदद करने की स्थिति में नहीं है. हां, वो भारत की दोस्ती के कारण बस चुपचाप बैठा रह सकता है. मगर अगर ताइवान पर अगर चीन-अमेरिका के साथ अन्य देश युद्ध में कूदे तो ये देखने वाली बात होगी कि रूस कहां रहेगा. कारण ये तो तय है कि अगर भारत इस युद्ध में कूदा तो वो चीन के खिलाफ ही होगा. अब बात फायदे की. तो चीन लगातार भारत को हिंद महासागर में घेरने की कोशिश कर रहा है. साथ ही पाकिस्तान की नौसेना को भी मजबूत कर रहा है. ऐसे में भारत के पास चीन को प्रशांत महासागर में घेरने के अलावा और कोई ऑप्शन नहीं बचता.

सुरक्षा के साथ ये भी एक कारण
दूसरा उससे भी बड़ा कारण ये है कि भारत अपने लोगों की तरक्की के लिए खुद को दुनिया का मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाना चाहता है. मगर चीन ये होने नहीं देना चाहता. इसके लिए वो रेयर अर्थ मिनरल्स से लेकर जरूरी मशीनों की सप्लाई पर खेल कर रहा है. साथ ही भारतीय उद्योगों को खत्म करने के लिए अपने सस्ते सामानों की डंपिंग भी कर देता है. इससे एक तरफ जहां जरूरी सामान के लिए भारत के उद्यमियों को जहां संकट का सामना करना पड़ता है, वहीं अपने सामान को अपने ही देश में बेचने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है. लिहाजा देश का मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर कभी ग्लोबल नहीं हो पाया. भारत अब अमेरिका-यूरोप की मदद से रेयर अर्थ मिनरल्स से लेकर हैवी मशीनों तक से चीन पर अपनी निर्भरता घटाने में लगा हुआ है. साथ ही अपने बने सामान को यूरोप और अमेरिका तक सीधे पहुंचाने के लिए नये सी रूट पर भी काम कर रहा है.
स्वदेशी का भी जोर
यही कारण है कि सितंबर 2023 में भारत में हुए जी 20 शिखर सम्मेलन के दौरान तय किया गया कि भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा बनाया जाएगा. इसका उद्देश्य भारत, खाड़ी देशों और यूरोप के बीच व्यापार को तेज, सस्ता और आसान बनाना है. मगर पहले कोविड और अब ईरान युद्ध ने इस योजना को सिरे चढ़ने से रोक रखा है. मगर अब भारत इसके लिए फिर से काम करने लगा. अभी 28 जून को पीएम मोदी की सेशेल्स यात्रा में भी यह दिखाई दिया. 15 मई से 20 मई 2026 को पीएम मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE), नीदरलैंड, स्वीडन, वॉर्वे और इटली की यात्रा की. इस यात्रा का मकसद भी तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा और डिफेंस ही था. भारत स्वदेशी स्तर पर भी अपनी ताकत लगातार बढ़ा रहा है. अभी हाल ही में भारत ने तीन युद्धपोत समंदर में उतारे. मकसद साफ है समंदर के जरिए व्यापार को गति देना और सुरक्षा को मजबूत करना.
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