मौसम विभाग मॉनसून को लेकर जो नक्शा जारी करता है, उसे उठाकर अगर आप देखेंगे तो उसमें ज्यादातर हिस्सा 'लाल' या 'पीला' ही नजर आएगा. ये दिखाता है कि 1 जून से लेकर अब तक कितनी कम बारिश हुई है. लेकिन इसी नक्शे में आप कुछ हिस्सों को 'गहरे नीले' और 'नीले' रंग में भी देखेंगे. ये वो जगहें हैं जहां इसी दौरान बहुत ज्यादा बारिश हुई है.
इस नक्शे को देखने पर पता चलता है कि भारत में मॉनसून कितना 'असंतुलित' हो गया है. कहीं बहुत ज्यादा बारिश हो रही है तो कहीं या तो बहुत कम बारिश हो रही है या फिर हो ही नहीं रही है.
मौसम विभाग के मुताबिक, 1 जून से लेकर 6 जुलाई तक 36 में से 21 राज्य ऐसे हैं जहां सामान्य से बहुत कम बारिश हुई है. इतना ही नहीं, 1 जुलाई से 6 जुलाई के बीच 741 में से लगभग आधे जिलों में बहुत कम बारिश दर्ज की गई है.

ऐसा क्यों हो रहा है?
इस बार बारिश कम होने की सबसे बड़ी वजह अल-नीनो है. इसी वजह से जिस मॉनसून को 1 जून तक केरल पहुंच जाना चाहिए था, वह इस बार तीन दिन की देरी से 4 जून को पहुंचा.
मॉनसून को आए एक महीने से ज्यादा हो गया है लेकिन अब भी बहुत बड़ा इलाका सूखा ही पड़ा है. लेकिन कुछ हिस्सों में जमकर बारिश हो रही है.
अब इसे ऐसे ही समझ लीजिए कि मुंबई में कुछ हफ्तों पहले तक सूखा पड़ने के आसार थे, लेकिन अब वही मुंबई जमकर भीग रही है. मुंबई में अब तक सामान्य से 34% ज्यादा बारिश हो चुकी है. लेकिन जून में मुंबई पूरी सूखी रही थी.
तो इसकी वजह क्या है? इसकी वजह मॉनसून का बदलता पैटर्न है. और ये पैटर्न सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में पड़ रहा है. बीते कुछ सालों से हो ये रहा है कि कम समय में ज्यादा बारिश हो जा रही है, जिस कारण बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं. इससे होता ये है कि बारिश तो ठीक हो जाती है लेकिन कई इलाके सूखे रह जाते हैं. उदाहरण के तौर पर 2025 में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई थी. फिर भी देश का 9% इलाका ऐसा था, जहां सूखा रह गया था, जहां सामान्य से बहुत कम बारिश हुई थी.
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इसका असर क्या पड़ रहा है?
मौसम विभाग के मुताबिक, मॉनसून अब एक्टिव हो गया है. कुछ राज्यों में भारी बारिश हो रही है, जिससे कई जगहों पर बाढ़ जैसे हालात बन गए हैं. फिर भी देश के बांधों की हालात चिंता बढ़ा रही है.
सेंट्रल वॉटर कमिशन (CWC) ने 2 जुलाई को अपना वीकली बुलेटिन जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि 2 जुलाई तक देश के 166 प्रमुख बांधों में कुल 47.725 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) पानी ही बचा है. जबकि, इन बांधों की कुल क्षमता 183.565 BCM है. इसका मतलब हुआ कि 166 डैम में सिर्फ 26% पानी ही बचा है.
ये बात दो कारणों से चिंताजनक है. पहला- पिछले साल इसी समय तक इन बांधों-जलाशयों में 78.077 BCM पानी था. दूसरा- ये हालात ऐसे समय बने हैं जब देश के ज्यादातर हिस्सों में मॉनसून पहुंच चुका है और ज्यादातर जलाशय तेजी से भरने लगते हैं.
CWC के अनुसार, 166 प्रमुख जलाशयों में से 69 में पानी का स्टोरेज सामान्य स्तर के 80% या उससे कम हो गया है. इनमें से 34 जलाशयों की स्थिति बेहद चिंताजनक है, जहां सामान्य स्टोरेज का 50% या उससे कम पानी बचा है.
सबसे ज्यादा चिंता की बात दक्षिणी राज्यों- कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना को लेकर है, जहां जलाशयों का जलस्तर सामान्य से 16 से 46% तक कम है. पूर्वी भारत में भी झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मिजोरम और नागालैंड में पानी का भंडार सामान्य से काफी कम रहा है. खास तौर पर, पश्चिम बंगाल में जलाशय का भंडार सामान्य से लगभग 62%, मिजोरम में लगभग 54%, कर्नाटक में लगभग 46% और ओडिशा में लगभग 19% कम है.
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तेजी से खत्म हो रहा ग्राउंडवॉटर
कम बारिश या फिर कम समय में ज्यादा बारिश, दोनों ही खतरनाक है. क्योंकि इससे कुछ खास फायदा होता नहीं है. कम समय में ज्यादा बारिश होने से बाढ़ आती है और बारिश का ज्यादातर पानी बर्बाद हो जाता है. एक अनुमान के मुताबिक, हर साल जितनी बारिश होती है, उसमें से सिर्फ लगभग 28% ही 'इस्तेमाल के लायक' होता है.
भारत के साथ ये समस्या इसलिए भी बड़ी है, क्योंकि यहां दुनिया की 18% आबादी रहती है, लेकिन पीने के साफ पानी के संसाधन सिर्फ 4% ही है. इसमें भी चिंता की बात ये है कि जितना पानी मौजूद है, उसमें से तकरीबन 70% दूषित है.
नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई समेत 21 बड़े शहरों में ग्राउंडवॉटर खत्म हो जाएगा. ये तब होगा, जब भारत में पानी की मांग आज की तुलना में दोगुनी हो जाएगी. रिपोर्ट बताती है कि भारत की 60 करोड़ से ज्यादा आबादी पर पानी का संकट मंडरा रहा है.
इंटरनेशनल सेंटर फॉर सस्टेनिबिलिटी के मुताबिक, पानी का संकट सीधे-सीधे तौर पर भारत में खाने का संकट खड़ा करेगा. क्योंकि भारत में 80% साफ पानी खेती में इस्तेमाल होता है. अगर साफ पानी नहीं होगा, तो खेती नहीं हो पाएगी.
सन् 1995 में वर्ल्ड बैंक के तत्कालीन उपाध्यक्ष डॉ. इस्माइल सेरागेल्डिन ने कहा था, 'यदि इस सदी के युद्ध तेल के लिए लड़े गए थे, तो अगली सदी के युद्ध पानी के लिए लड़े जाएंगे.'
इसका मतलब साफ था कि आने वाले समय में पानी की किल्लत होगी और लोग पानी के लिए लड़ेंगे. भारत में अगर पानी का संकट आता है तो इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा. क्योंकि पाकिस्तान के साथ सिंधु तो चीन के साथ ब्रह्मपुत्र नदी के साथ तनाव बना रहता है. कुल मिलाकर, सार यही है कि अगर कम समय में ज्यादा बारिश हो रही है तो उस पानी के सही इस्तेमाल के तरीके तलाशने होंगे, ताकि आने वाला कल सुरक्षित रहे.
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