जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची नई दिल्ली यात्रा पर हैं. पीएम मोदी ने जापान के साथ भारत के हजारों साल पुराने धार्मिक, सांस्कृतिक संबंधों का जिक्र किया है. भारत और जापान का धार्मिक, सांस्कृतिक रिश्ता 1400 साल से भी अधिक पुराना है. कहा जाता है कि 552 ईस्वी यानी लगभग 1400 साल पहले जब कोरिया के राजा ने जापानी सम्राट को बौद्ध धर्म की प्रतिमाएं और पवित्र ग्रंथ भेंट स्वरूप भेजे थे. यहीं से भारत में शुरू हुआ बौद्ध धर्म चीन, कोरिया के रास्ते जापान तक पहुंचा. सन 752 में भारत के एक महान तमिल बौद्ध भिक्षु बोधिसत्व भारद्वाज यानी बोधिसेन जापान पहुंचे. उन्होंने नारा शहर के प्रसिद्ध तोदाई जी मंदिर में भगवान बुद्ध की विशाल कांस्य प्रतिमा की आंखें खोलने की रस्म को मुख्य पुरोहित बनकर निभाया. भारत की ध्यान परंपरा चीन में चान और जापान में जेन बौद्ध धर्म बनी, जो आज जापानी जीवनशैली का मूल आधार है.जापान के 8वीं शताब्दी के ग्रंथ शोकू निहोनगी भारतीय भिक्षु बोधिसेन की जापान यात्रा का जिक्र है.
जापानी धार्मिक परंपरा में भारतीय देवी-देवता
जापान में बौद्ध धर्म के साथ ही हिंदू देवी-देवताओं को भी शिंतो और बौद्ध धर्म परंपराओं में समाहित किया गया. जापान में बड़े पैमाने पर इनकी पूजा होती है. विद्या और संगीत की देवी सरस्वती को जापान में बेंजाईतेन के तौर पर पूजा जाता है. मां सरस्वती जैसे उनके हाथों में भी बीवा (जापानी वीणा) होती है. संकटमोचक गणेश को जापान में कंगितेन या शोटेन कहा जाता है. उन्हें सौभाग्य और सुख-समृद्धि और व्यापार में शुभ-लाभ का देवता माना जाता है. धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी को जापान में किचिजोतेन कहकर पूजा जाता है. धन के देवता कुबेर को जापान में दाइकोकुतेन को जापान में कहते हैं. जापान के 7 भाग्यशाली देवताओं में वो सबसे प्रमुख हैं. शिंतो और बौद्ध मंदिरों के रिकॉर्ड और जापान के क्योटो, नारा और कामाकुरा शहरों के प्राचीन मंदिर इसके जीवंत उदाहरण हैं.

India Japan Relations
भाषा और लिपि का संगम
धर्म ही नहीं, संस्कृति में भी भारत-जापान करीब हैं. जापानी बौद्ध भिक्षु जब बौद्ध धर्म और संस्कृत के अध्ययन के लिए भारत और चीन आए तो संस्कृत के मंत्रों को लिखने के लिए सिद्धम लिपि को अपनाया. जापानी में इसे शित्तन कहा जाता है. आज भी जापान के सैकड़ों प्राचीन बौद्ध मठों और मंदिरों के प्रवेश द्वारों पर पवित्र चट्टानों पर संस्कृत के मंत्र और बीज-अक्षर लिखे मिलेंगे. जापानी वर्णमाला काना के अक्षरों के उच्चारण, स्वर और उनकी पर संस्कृत व्याकरण का गहरा प्रभाव दिखता है.
राधाबिनोद पाल को मानते हैं भगवान
द्वितीय विश्व युद्ध में जापान समेत हारे देशों के सैन्य जनरलों और नेताओं पर युद्ध अपराधों का मुकदमा दो सैन्य ट्रिब्यूनल में चला. जर्मनी के लिए न्यूरेमबर्ग ट्रायल्स और जापान के लिए टोक्यो ट्रायल्स नाम दिया गया. टोक्यो ट्रायल्स में पूरी दुनिया के 11 जजों को शामिल किया गया था. इनमें कोलकाता हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस राधाबिनोद पाल भी थे. टोक्यो में 1946 में यह मुकदमा शुरू हुआ, तो मित्र देशों अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ ने मिलकर जापान के पूर्व पीएम हिदेकी तोजो सहित 28 शीर्ष सैन्य और नागरिक नेताओं पर युद्ध अपराधों में मुकदमा चलाया.

टोक्यो ट्रायल्स क्या है
अन्य जजों 1948 के फैसले में फांसी की सजा का ऐलान किया. वहीं राधाबिनोद पाल ने इसे बदला लेने की कार्यवाही करार दिया. उन्होंने 1235 पन्नों का असहमति पत्र लिखते हुए ऐतिहासिक फैसला दिया. जस्टिस पाल ने जापानी नेताओं के जुल्मों का समर्थन नहीं किया था. मगर सजा देने में अंतरराष्ट्रीय कानून की धज्जियां उड़ाए जाने का विरोध किया था. उन्होंने लिखा, जापान के सभी आरोपी सभी आरोपों से पूरी तरह निर्दोष हैं और उन्हें तुरंत रिहा किया जाना चाहिए.
स्वामी विवेकानंद की यात्रा
स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो जाने से पहले जापान की यात्रा की थी. जापान के राष्ट्रवाद, तकनीकी तरक्की और अनुशासन को देखकर उन्होंने भारतीय युवाओं को जापान से सीखने की प्रेरणा दी थी.
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का प्रभाव
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने 1916 से 1929 के बीच 5 बार जापान की यात्रा की थी. उन्होंने जापानी संस्कृति, प्रकृति-प्रेम और कला को करीब से देखा. जापानी कविता विधा हाइकु को समझा और शांति निकेतन में जापानी संस्कृति और मार्शल आर्ट्स को सिखाने की व्यवस्था की.
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