दिल्ली में 12-13 सितंबर को दुनिया के बड़े नेता जुटेंगे...मौका होगा 18वें ब्रिक्स सम्मेलन का जिसका आयोजन होगा भारत मंडपम में. इस दौरान भारत मंडपम सिर्फ दुनिया की उभरती ताकतों का राजनीतिक मंच नहीं होगा, बल्कि यहां भाषाओं का भी अनोखा संगम देखने को मिलेगा. आप जरा कल्पना कीजिए- एक हॉल में चीन के राष्ट्रपति मंदारिन में बोल रहे हैं, रूस का प्रतिनिधिमंडल रूसी में जवाब दे रहा है, ब्राजील के नेता पुर्तगाली में अपनी बात रख रहे हैं, ईरान से आए प्रतिनिधि फारसी में चर्चा कर रहे हैं, जबकि अरब देशों के नेता अरबी में अपनी बात रख रहे हैं... दरअसल BRICS Summit दरअसल सिर्फ देशों का जमावड़ा नहीं है, यह भाषाओं का भी महाकुंभ है, जहां दो दिनों में दुनिया की अरबों आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषाएं सुनाई देंगी.. इस रिपोर्ट में हम जानते हैं दो दिनों तक दिल्ली में कौन-कौन सी भाषाएं बोली जाएंगी और उनके आंकड़े क्या है? साथ ही साथ इस सवाल का भी जवाब ढूंढेगे कि जब कमरे में मौजूद ज्यादातर लोग एक-दूसरे की भाषा नहीं समझते, तब बातचीत कैसे चलती है?
दुनिया की आधी आबादी की भाषाएं भी पहुंचेंगी दिल्ली
18वें BRICS Summit में सदस्य देशों के अलावा पार्टनर देशों के प्रतिनिधि भी पहुंचेंगे. ऐसे में भारत मंडपम में हिंदी, अंग्रेज़ी, मंदारिन, रूसी, पुर्तगाली, अरबी, फारसी, इंडोनेशियाई, मलय और थाई जैसी भाषाएं सुनाई देंगी. इन भाषाओं को बोलने वालों की कुल संख्या दुनिया की आबादी के बड़े हिस्से तक पहुंचती है. यानी दिल्ली में सिर्फ राष्ट्राध्यक्ष नहीं, बल्कि दुनिया की अरबों आबादी का भाषाई प्रतिनिधित्व भी मौजूद होगा. अगर BRICS और उससे जुड़े प्रमुख देशों की भाषाओं को देखें तो तस्वीर बेहद दिलचस्प बनती है.
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ब्रिक्स देश: कौन सी भाषा कितनों की आवाज

यानि BRICS अब सिर्फ ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं है. इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, इंडोनेशिया, ईरान, थाईलैंड, मलेशिया और सऊदी अरब जैसे नए सदस्य भी शामिल हो चुके हैं. ऐसे में दिल्ली में होने वाले शिखर सम्मेलन में रूसी, हिंदी, अंग्रेज़ी, मंदारिन, पुर्तगाली, मलय, थाई, फारसी और अरबी जैसी भाषाएं सुनाई देना लगभग तय है. अब थोड़ा और करीब से चीजों को समझते हैं.
मंदारिन: सबसे ज्यादा लोगों की भाषा
अगर केवल मातृभाषा बोलने वालों की बात करें तो मंदारिन दुनिया की सबसे बड़ी भाषा मानी जाती है. चीन के प्रतिनिधिमंडल की बातचीत और आधिकारिक दस्तावेजों में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है. BRICS बैठक में यह सबसे ज्यादा बोलने वालों वाली भाषा होगी.
हिंदी: मेजबान देश की आवाज
भारत मेजबान है, इसलिए हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों का महत्व रहेगा. भारत में 60 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं और यह दुनिया की सबसे बड़ी भाषाओं में शामिल है. समिट के दौरान विदेशी मेहमानों के लिए अनुवाद की व्यवस्था होगी, लेकिन भारतीय प्रतिनिधियों की आवाज में हिंदी का रंग साफ दिखाई देगा.
रूसी: BRICS की शुरुआती ताकतों में से एक की भाषा
BRICS की शुरुआत करने वाले देशों में रूस भी शामिल था. रूसी भाषा यूरोप और एशिया के बड़े हिस्से में प्रभाव रखती है. रूस के राष्ट्रपति और अधिकारी अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रूसी भाषा को ही प्राथमिकता देते हैं. रूसी बोलने वाले लोगों की संख्या 25 करोड़ से अधिक है.
पुर्तगाली: ब्राजील की पहचान
BRICS में ब्राजील अकेला ऐसा देश है जिसकी मुख्य भाषा पुर्तगाली है. दुनिया में करीब 25 से 30 करोड़ लोग पुर्तगाली बोलते हैं. भारत में भले यह भाषा आम नहीं हो, लेकिन दिल्ली में होने वाली BRICS बैठकों में यह लगातार सुनाई देगी. वैसे दुनिया में पुर्तगाली भाषा बोलने वालों की संख्या 26 करोड़ है.
अरबी: नए BRICS की नई आवाज
मिस्र, UAE और सऊदी अरब के शामिल होने के बाद अरबी भाषा का महत्व और बढ़ गया है. मध्य पूर्व की राजनीति, ऊर्जा और व्यापार से जुड़े कई अहम नेता इसी भाषा में संवाद करते हैं. इस बार दिल्ली में अरबी सिर्फ एक विदेशी भाषा नहीं, बल्कि BRICS की प्रमुख भाषाओं में से एक होगी.
आखिर नेता एक-दूसरे को समझते कैसे हैं?
यह BRICS Summit का सबसे रोचक हिस्सा होता है. मान लीजिए चीन का कोई प्रतिनिधि मंदारिन में बोल रहा है और सामने बैठे ब्राजील, भारत या रूस के प्रतिनिधि उस भाषा को नहीं जानते. ऐसे में मंच के पीछे बने विशेष अनुवाद कक्ष सक्रिय हो जाते हैं. वहां मौजूद इंटरप्रिटर वक्ता की बात को रियल टाइम में दूसरी भाषा में बदलते हैं. यह प्रक्रिया इतनी तेज़ होती है कि वक्ता का वाक्य पूरा होने से पहले ही उसका अनुवाद दूसरे प्रतिनिधियों के हेडफोन तक पहुंचना शुरू हो जाता है. इसे Simultaneous Interpretation कहा जाता है. यानी अगर शी जिनपिंग मंदारिन में बोलें, तो भारत के प्रतिनिधि उसी समय अपने हेडफोन में अंग्रेज़ी या हिंदी अनुवाद सुन सकते हैं. इसी तरह रूसी, अरबी, पुर्तगाली या फारसी भाषण भी कुछ सेकंड के भीतर दूसरी भाषाओं में बदल जाते हैं. यही तकनीक दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक बैठकों को सुचारू रूप से चलाती है.
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