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मनोज मीणा: ISRO की सरकारी नौकरी ठुकराई, बंद होने वाला था स्टार्टअप, आज है 1000 करोड़ की कंपनी

Manoj Meena Atomberg Success story: ISRO की सरकारी नौकरी को लात मारकर इस IITian ने शुरू की थी अपनी कंपनी. कभी बंद होने की कगार पर पहुंच चुका यह स्टार्टअप आज 1000 करोड़ का साम्राज्य बन चुका है.

मनोज मीणा: ISRO की सरकारी नौकरी ठुकराई, बंद होने वाला था स्टार्टअप, आज है 1000 करोड़ की कंपनी
Manoj Meena and Shibbrat Das Atomberg story

राजस्थान के छोटे से गांव से आईआईटी बॉम्बे का सफर करने वाला शख्स ISRO की सरकारी नौकरी ठुकरा देता है. और खुद की ऐसी कंपनी खड़ी कर देता है, जो कभी बंद होने की कगार पर थी. आज वो कंपनी 1000 हजार करोड़ की बन चुकी है. इस कंपनी ने देश के करोड़ों घरों की बिजली बचाने का सबसे बड़ा जरिया ढूंढ निकाला. ये कहानी है कि मनोज मीणा और उनकी कंपनी 'एटमबर्ग' की.

सरकारी नौकरी को मार दी लात 

कहानी शुरू होती है IIT Bombay के कैंपस से. मनोज मीणा नाम के एक लड़के ने पढ़ाई पूरी की और उसके सामने उसका सुनहरा भविष्य बिल्कुल तैयार खड़ा था. देश की सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसी ISRO में उनके लिए एक शानदार सरकारी नौकरी तैयार थी.

राजस्थान के एक छोटे से गांव से आने वाले मनोज के परिवार के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा था. गांव का लड़का और इसरो में पक्की सरकारी नौकरी. जरा सोचिए, पूरा परिवार कितना खुश रहा होगा. लेकिन मनोज के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था. उन्होंने एक ऐसी राह चुनी जो बिल्कुल अनजानी थी और जहां हर कदम पर खतरा था.

मनोज ने उस सुरक्षित सरकारी नौकरी को ठुकरा दिया. उन्हें नौकरी नहीं करनी थी, उन्हें तो कुछ नया बनाना था. आईआईटी में रोबोटिक्स और इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया में खोए रहने वाले मनोज का मानना था कि असली इंजीनियरिंग वो है, जो आम लोगों की रोजमर्रा की दिक्कतों को दूर कर सके. घरवाले परेशान थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर लड़का क्या करना चाहता है. पर मनोज ने फैसला कर लिया था. उन्होंने अपनी जिद की राह पर कदम बढ़ा दिए. और इसी पागलपन से जन्म हुआ 'एटमबर्ग टेक्नोलॉजीज' (Atomberg Technologies) का. 

शुरुआत पंखे से नहीं हुई थी

साल 2012 में मनोज ने कंपनी शुरू की. 2013 में उनके साथ जुड़े आईआईटी बॉम्बे के ही उनके सीनियर शिबब्रत दास. शुरुआती कुछ साल बेहद संघर्ष वाले थे. आईआईटी बॉम्बे के इनक्यूबेटर (SINE) के एक छोटे से कमरे से शुरू हुई इस कंपनी के पास कोई बड़ा फंड नहीं था. दोनों दोस्तों ने जो काम मिला, वो किया. कभी डेटा एक्विजिशन सिस्टम बनाया, कभी मोटर कंट्रोल पर काम किया, तो कभी गाड़ियों को ट्रैक करने वाला सिस्टम (Vehicle Tracking) बनाकर बेचने की कोशिश की.

दोनों खुद ही सब कुछ करते थे. तकनीक भी खुद बनाते, ग्राहकों के घर जाकर सर्विस भी खुद देते और मशीनें भी खुद ठीक करते. उनके पास कमाल की काबिलियत तो थी, लेकिन वो एक ऐसे 'आइडिया' की तलाश में थे जो उनकी जिंदगी और इस देश को बदल सके.  

IIT Bombay Alumnus Manoj Meena Success story rejected ISRO job Founded 1000-Crore Value Atomberg Technologies

चार साल का लंबा इंतजार 

साल 2015 में आखिरकार वो पल आ ही गया, जिसका उन्हें इंतजार था. मोटर और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स पर काम करते-करते इन दोनों दोस्तों की नजर हमारे घरों की छत पर लटकने वाले उस साधारण से पंखे पर गई. सालों बीत गए थे, लेकिन उस पंखे की तकनीक में कोई बदलाव नहीं हुआ था. वो पुराना पंखा बिजली का भूखा था. करीब 75 से 80 वाट बिजली खा जाता था.

मनोज और उनकी टीम ने हार नहीं मानी. उन्होंने एक ऐसी तकनीक खोजी जिसे BLDC (ब्रशलेस डीसी) मोटर कहते हैं. उन्होंने एक ऐसा पंखा तैयार किया जो उतनी ही हवा सिर्फ 28 वाट बिजली में दे सकता था. यानी सीधे-सीधे 65% बिजली की बचत. 

यह एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी आविष्कार था. उन्होंने देश के करोड़ों घरों की एक बहुत बड़ी समस्या का समाधान ढूंढ लिया था. साल 2015 में उन्होंने 'गोरिल्ला' (Gorilla) ब्रांड नाम से अपना पहला पंखा बाजार में उतारा. 

तुम्हारा पंखा खरीदेगा कौन?

शुरुआत में उन्होंने कंपनियों को सीधे पंखे बेचे, लेकिन असली चुनौती तब आई जब उन्होंने सीधे आम ग्राहकों के बीच जाने का फैसला किया. बाजार में बजाज, क्रॉम्पटन, हैवेल्स और ऊषा जैसे बड़े-बड़े दिग्गजों का कब्जा था. ऊपर से ये दोनों नौजवान अपने पंखे ऑनलाइन बेचना चाहते थे, जबकि भारत के लोग पंखा हमेशा दुकान पर जाकर छूकर और देखकर खरीदते थे.

निवेशकों ने सीधे मुंह मना कर दिया. सबने एक ही सवाल पूछा, "इस अनजान स्टार्टअप का पंखा खरीदेगा कौन?" मनोज और शिबब्रत हर दरवाजे पर गए, हर किसी के सामने हाथ फैलाए, लेकिन हर जगह से उन्हें सिर्फ न सुनने को मिली.

साल 2019 तक आते-आते कंपनी हर दिन करीब 1,000 पंखे बनाने लगी थी और रेवेन्यू भी 37 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था. व्यापार तो बढ़ रहा था, लेकिन कंपनी को चलाने के लिए और पैसों की जरूरत थी जो कहीं से मिल नहीं रहे थे. 

आखिरी 30 दिन...सब कुछ खत्म होने वाला था

साल 2019 का वो दौर इस स्टार्टअप के लिए सबसे भयानक था. कंपनी के पास सिर्फ एक महीने का खर्च चलाने का पैसा बचा था. को-फाउंडर शिबब्रत दास आज भी उस दौर को याद करके सिहर उठते हैं. कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए पैसे नहीं थे, वेंडर रोज तगादा कर रहे थे और फंड की बातचीत हर जगह फेल हो रही थी. सालों की मेहनत पानी में मिलने की कगार पर थी. दोनों दोस्तों के मन में यह सवाल उठने लगा था कि क्या अब कंपनी को बंद कर देना चाहिए? 

तभी एक चमत्कार हुआ. उन्हें एक नए इन्वेस्टमेंट फंड के बारे में पता चला. उम्मीद बहुत कम थी, लेकिन डूबते को तिनके का सहारा. उन्होंने ईमेल भेजा और उधर से तुरंत जवाब आ गया. चीजें इतनी तेजी से बदलीं कि कुछ ही हफ्तों में एटमबर्ग के पास जरूरत का पूरा फंड आ गया. मौत के मुंह से निकलकर इस स्टार्टअप को एक नया जीवन मिल गया था. 

सिर्फ एक पंखा नहीं, एक 'स्मार्ट' गैजेट

फंड मिलते ही एटमबर्ग ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने अपने पंखे को सिर्फ बिजली बचाने वाला साधन नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक 'स्मार्ट तकनीक' में बदल दिया. BLDC तकनीक की वजह से पंखे छोटे और बेहद खूबसूरत हो गए. उन्होंने इसमें रिमोट कंट्रोल, एलईडी लाइट, वाई-फाई और ऐप से चलने वाले फीचर्स जोड़ दिए. धीरे-धीरे यह पंखा हर भारतीय घर की पहली पसंद बन गया. आज एटमबर्ग सिर्फ पंखे तक सीमित नहीं है. यह तकनीक अब मिक्सर ग्राइंडर, वॉटर प्यूरीफायर और यहां तक कि AC और ड्रोन की मोटरों में भी इस्तेमाल हो रही है. 

1,000 करोड़ का साम्राज्य

जिस कंपनी को कभी कोई निवेशक घास डालने को तैयार नहीं था, आज उसने भारतीय बाजार में तहलका मचा दिया है. साल 2025 में एटमबर्ग का ऑपरेटिंग रेवेन्यू करीब 958 करोड़ रुपये तक पहुंच गया और कुल टर्नओवर 1,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया. मनोज मीणा को नेशनल एंटरप्रेन्योरशिप अवॉर्ड, फोर्ब्स इंडिया '30 अंडर 30' और फोर्ब्स एशिया जैसी लिस्ट में शामिल किया जा चुका है. शिबब्रत को भी इन सभी प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है. 

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