संसद के मॉनसून सत्र में सरकार एक बार फिर परिसीमन बिल को लाने की तैयारी कर रही है. अप्रैल में जब इस बिल को लाया गया था, तब दो-तिहाई बहुमत नहीं होने के कारण ये पास नहीं हो पाया था. लेकिन अप्रैल से जुलाई के बीच राजनीतिक समीकरण बदले हैं और सरकार को उम्मीद है कि इस बार बिल पास हो जाएगा.
अगर यह बिल पास हो जाता है तो देश में लोकसभा सीटों का परिसीमन होगा और सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 तक पहुंच जाएंगी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अप्रैल में बताया था कि सभी राज्यों में 50% सीटें बढ़ाई जाएंगी.
कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने आरोप लगाया कि इस बिल को महिला आरक्षण के नाम पर लाया गया था, लेकिन इसका मकसद परिसीमन का रास्ता साफ करना और राजनीतिक फायदे के लिए सीटों का पुनर्गठन करना था.
परिसीमन को लेकर अक्सर दो तरह के विवाद बने रहते हैं. पहला- अगर परिसीमन होता है तो उत्तर के राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, जबकि दक्षिणी राज्यों का घट जाएगा. इसलिए परिसीमन पर 1976 में रोक लगा दी गई थी. दूसरा- परिसीमन होता है तो इससे सरकार को राजनीतिक फायदा मिल सकता है.
देश में आखिरी बार 2008 में परिसीमन हुआ था. 1973 के बाद यह पहली बार था जब परिसीमन हुआ था. सीटों की संख्या बढ़ाने पर संवैधानिक रोक थी, लेकिन 90% से ज्यादा सीटों की सीमाएं बदल दी गई थीं. इससे देश का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल गया था.
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क्या हुआ था 2008 में?
आजादी के बाद हर 10 साल बाद देश में जनगणना के आधार पर परिसीमन होता था. आखिरी बार 1971 के बाद 1973 में परिसीमन हुआ था और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 543 हो गई थी. लेकिन इसके बाद 1976 में संवैधानिक संशोधन कर परिसीमन पर 2001 तक रोक लगा दी थी. 2001 में इस रोक को बढ़ाकर 2026 तक कर दिया गया.
2002 में केंद्र सरकार ने परिसीमन आयोग बनाया. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुलदीप सिंह इसके अध्यक्ष थे. आयोग का काम 2001 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का नए सिरे से परिसीमन करना था.
2008 में परिसीमन आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी. सीटों की संख्या नहीं बढ़ी लेकिन 543 में से 499 सीटों की सीमाएं बदल गई थीं. इस परिसीमन के बाद अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटें भी बढ़ गई थीं. SC की सीटें बढ़कर 79 से 84 और ST की बढ़कर 41 से 47 हो गईं.
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क्या कांग्रेस को फायदा मिला था?
परिसीमन के बाद जब 2009 में लोकसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस की जबरदस्त सीटें बढ़ीं. 2004 में कांग्रेस ने 145 सीटें जीती थीं. 2009 में ये बढ़कर 206 हो गई. यानी, कांग्रेस की सीधे-सीधे 61 सीटों का फायदा हुआ था. हालांकि, इसके पीछे मनरेगा जैसी योजनाओं को श्रेय दिया गया.
अप्रैल में स्वराज्य मैग्जीन ने एक रिपोर्ट छापी थी. इसमें चुनावी नतीजों के हवाले से दावा किया था कि 2009 के चुनाव में कांग्रेस को कई राज्यों में फायदा हुआ था.
उदाहरण के तौर पर, राजस्थान में कांग्रेस ने 20 और बीजेपी ने 4 सीटें जीती थीं. जबकि, 2004 के चुनाव में कांग्रेस को राजस्थान में सिर्फ 4 सीटें मिली थीं और बीजेपी 21 सीटों पर जीती थी.
रिपोर्ट में दावा किया गया था कि राजस्थान की जिन सीटों पर बीजेपी लगातार दो बार से जीत रही थी, वहां सेंध लगाई गई थी. 11 सीटें ऐसी थीं, जिनकी सीमाएं नए सिरे से तय होने के कारण कांग्रेस के खाते में चली गई थीं.
इसमें दूसरा उदाहरण उत्तर प्रदेश का था, जहां कांग्रेस ने 21 सीटें जीतीं. 1984 के बाद यूपी में कांग्रेस का ये बेहतरीन प्रदर्शन था. 2009 में कांग्रेस ने जो 21 सीटें जीती थीं, उनमें से 10 ऐसी थीं जिन्हें कांग्रेस ने आखिरी बार 1984 में जीता था. परिसीमन के बाद तीन सीटें नई बनी थीं और तीनों पर ही कांग्रेस जीती.
जिस सीट से बसपा प्रमुख मायावती लगातार तीन बार से जीत रही थीं, उस अकबपुर सीट पर चौंकाने वाला बदलाव हुआ और कांग्रेस जीत गई. परिसीमन के बाद इस सीट का SC का दर्जा खत्म कर दिया गया था.
आरक्षित सीटों पर कांग्रेस की अच्छी खासी जीत हुई थी. 2004 में कांग्रेस ने 17 SC सीट जीतीं, जो 2009 में लगभग दोगुनी होकर 33 हो गई. वहीं, ST रिजर्व सीटों पर ये संख्या बढ़कर 14 से बढ़कर 21 हो गई.
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क्या परिसीमन के बहाने खेल हुआ?
परिसीमन के बाद 2009 में कांग्रेस के चुनावी फायदे का दावा भले ही किया जाता हो लेकिन एक रिसर्च हुई थी, जिसमें सामने आया था कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष थी. हालांकि, इसमें कुछ अपवाद भी था.
2013 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्चर लक्ष्मी अय्यर और माया रेड्डी ने परिसीमन पर स्टडी की थी. इसमें बताया गया था कि परिसीमन के लिए हर राज्य में एडवाइजरी कमेटी बनी थी, जिसमें 5 सांसद और 5 विधायक थे. बस इन्हें ही थोड़ा फायदा हुआ. इन सांसदों-विधायकों की सीट में कोई खास बदलाव नहीं हुआ.
इस स्टडी में रिसर्चर ने पाया कि जिन सीटों के मौजूदा सांसद-विधायक एडवाइजरी कमेटी के सदस्य थे, उनकी सीटों के SC या ST के लिए आरक्षित होने की गुंजाइश काफी कम थी. उनकी सीटों में वोटरों में बड़ा बदलाव नहीं हुआ और उनके पुराने वोटरों का एक बड़ा हिस्सा उसी सीट में बना रहा.
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