- संसद के मॉनसून सत्र के एजेंडे में परिसीमन विधेयक शामिल नहीं है, फिर भी यह मुद्दा राजनीतिक रूप से चर्चा में है.
- परिसीमन का मतलब है लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का दोबारा निर्धारण.
- फिलहाल, परिसीमन विधेयक का भविष्य संसद में होने वाले हंगामे और वोटों की गणित पर टिका है.
मानसून सत्र के शुरू होने के साथ ही परिसीमन विधेयक पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है. एक दिन पहले संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से इसे लेकर सवाल पूछा गया था, जिसे उन्होंने पूरी परिपक्वता के साथ टाल दिया. जब रिजिजू से पूछा गया कि क्या एनडीए सरकार मॉनसून सत्र के दौरान डिलिमिटेशन से जुड़ा संविधान संशोधन बिल लाएगी. तो किरण रिजिजू ने कहा, "हमने संसदीय बुलेटिन में 8 बिल लाने की जानकारी दी है. अगर और कोई बिल आएगा तो बिजनेस एडवाइजरी कमेटी में हम इस पर चर्चा करेंगे.".
यानी मौजूदा मॉनसून सत्र के एजेंडे में भले ही परिसीमन या डिलिमिटेशन विधेयक को शामिल नहीं किया गया है, इसके बावजूद यह मुद्दा लगातार राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है.
राजनीतिक दलों का क्या है कहना?
कई दक्षिण भारतीय राज्यों को आशंका है कि अगर नई जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का परिसीमन हुआ तो उनकी सीटों का अनुपात घट सकता है, जबकि उत्तर भारत के कुछ राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं.
डीएमके के राज्य सभा सांसद तिरुचि शिवा ने कहा, "विधेयक का कभी समर्थन नहीं करेंगे. हमारा प्रतिनिधित्व घटना नहीं चाहिए. हमें डर है कि अगर दूसरे राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ता है, तो हमारा महत्व कम हो जाएगा."
वहीं, टीएमसी के सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिख कर यह निवेदन किया है कि अगर सरकार इस विधेयक को मॉनसून सत्र में संसद के पटल पर लाना चाहती है कि तो उन्हें ऑल पार्टी मीटिंग बुलानी चाहिए.

टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन
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वहीं कांग्रेस के नाना पटोले ने कहा कि उनकी पार्टी डिलिमिटेशन के खिलाफ नहीं है. इसे लेकर हमारे रुख के बारे में अफवाहें फैलाई गई हैं. हमारा विरोध यह है कि केंद्र सरकार इसकी आड़ में सभी ताकतें हथियाना चाहती है और सांसदों और विधायकों की संख्या तय करना चाहती है.
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर भविष्य में परिसीमन से जुड़ा विधेयक संसद में आता है तो उसे पारित कराने के लिए सरकार को कितने सांसदों की जरूरत होगी? सरकार और विपक्ष अभी से अपनी-अपनी रणनीति क्यों बना रहे हैं? और अगर परिसीमन लागू हो गया तो देश की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ेगा?
परिसीमन क्या होता है?
राजनीतिक दलों की इन प्रतिक्रियाओं के बीच चलिए जल्दी से ये बता दें कि परिसीमन होता क्या है? तो परिसीमन का मतलब है लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का दोबारा निर्धारण. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि हर सांसद या विधायक लगभग समान आबादी का प्रतिनिधित्व करे. भारत में परिसीमन का काम संसद के कानून के आधार पर गठित डिलिमिटेशन कमीशन करता है. आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद उन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.
संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत हर जनगणना के बाद संसद कानून बनाकर परिसीमन आयोग गठित कर सकती है. हालांकि 42वें संविधान संशोधन (1976) और बाद में 84वें संविधान संशोधन (2001) के जरिए लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या पर रोक लगा दी गई थी. फिलहाल यह रोक पहली जनगणना के प्रकाशित आंकड़ों (2026 के बाद होने वाली अगली जनगणना) तक प्रभावी है.

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सरकार के पास कितना नंबर है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि संसद में अगर विधेयक आया तो किस तरह पूरा प्रोसेस होगा.
अगर केवल परिसीमन आयोग बनाने के लिए सामान्य कानून लाया जाता है, तो उसे पारित कराने के लिए दोनों सदनों में सामान्य बहुमत के उपस्थित रहने और मतदान में भी सामान्य बहुमत की ही जरूरत पड़ेगी. लेकिन अगर परिसीमन लागू करने के लिए संविधान में कोई संशोधन आवश्यक हुआ, तो इसके लिए खास बहुमत (स्पेशल मेजॉरिटी) की जरूरत पड़ेगी. दोनों सदनों में कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई वोट मिलने चाहिए.
फिलहाल केंद्र की एनडीए सरकार के पास दोनों सदनों में बहुमत तो है पर दो तिहाई समर्थन नहीं है. ऐसे में उसे अन्य दलों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है. इसलिए केवल अपने सांसदों के भरोसे आगे बढ़ना आसान नहीं होगा. राजनीतिक सहमति बनाना भी उतना ही जरूरी होगा.
यही वजह है कि सरकार अपने सहयोगी दलों को साथ रखने और नए राजनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है.
NCP, DMK, TMC जैसे दल क्यों अहम हैं?
परिसीमन का मुद्दा राजनीतिक संतुलन से भी जुड़ा है लिहाजा सरकार की कोशिश होगी कि जिन क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय राजनीति में असर है, उनके साथ लगातार संवाद बना रहे.
एनसीपी के अलग-अलग गुट महाराष्ट्र की राजनीति में प्रभाव रखते हैं. तो डीएमके लंबे समय से यह कहती आ रही है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या पर नियंत्रण में सफलता हासिल की है, यानी जहां जनसंख्या तेजी से नहीं बढ़ी है, उन राज्यों को सीटों के मामले में नुकसान नहीं होना चाहिए.
बंगाल की टीएमसी भी इस मुद्दे पर संघीय ढांचे और राज्य के अधिकारों की बात करती है. इसके अलावा बीजेडी, वाईएसआरसीपी, टीडीपी, जेडीयू, एलजेपी (रामविलास), शिवसेना के दोनों गुट और अन्य क्षेत्रीय दल भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.
सरकार के सामने एक तरफ तो पूर्ण बहुमत का समर्थन जुटाना तो दूसरी ओर बड़ी चुनौती यह होगी कि वह यह भरोसा दिलाए कि परिसीमन से किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा और राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व का संतुलन बना रहेगा.

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लोकसभा-राज्यसभा में NDA का नंबर गेम
अप्रैल में 131वें संविधान संशोधन विधेयक के दौरान 528 सांसदों ने वोट दिया था. तब एनडीए को 298 वोट मिले थे, जबकि विपक्षी दलों ने 230 वोट हासिल किए थे. तब से एनडीए की लोकसभा में स्थिति मजबूत हुई है.
टीएमसी के 20 सांसद एनसीपीआई में शामिल हो गए हैं और उन्होंने एनडीए को अपना समर्थन देने का वादा किया है. वहीं उद्धव गुट के शिवसेना से छह सांसद शिंदे गुट में शामिल हो गए हैं. तो एनसीपी (शरद पवार) के आठ सांसदों ने सशर्त समर्थन देने के संकेत दिए हैं. वहीं 22 सांसदों वाला डीएमके भी इस विधेयक का समर्थन देने पर विचार कर रहा है.
अगर इन सभी को जोड़ा जाए तो ये कुल 56 सांसद हुए. इससे एनडीए को 354 सांसदों का प्रभावी समर्थन हो जाएगा. यानी दो तिहाई के मैजिक फिगर 360 से ये महज 6 वोट दूर है.
अब सरकार वाईएसआरसीपी के चार सांसद और 7 निर्दलीय सांसदों से भी समर्थन या मतदान के दौरान अनुपस्थित रहने की उम्मीद जताई है.
अगर ये समीकरण फिट बैठे तो एनडीए आसानी से दो तिहाई बहुमत हासिल कर लेगा.
उधर उच्च सदन राज्यसभा में कुल सीटों की संख्या 245 है. ऐसे में डिलिमिटेशन बिल को पास करवाने के लिए दो तिहाई बहुमत हासिल करनी होगी, तो कम से कम 164 वोटों की जरूरत होगी. अब उच्च सदन में एनडीए के सीटों की संख्या 153 है (7 नॉमिनेटेड और 3 इंडिपेंडेंट को मिलाकर). यह दो तिहाई से 11 सीटें कम है.
अब संभावना ये है कि एनडीए को राज्यसभा में अपने पूर्व सहयोगी दलों का समर्थन हासिल हो जाए. इनमें बीजेपी के पास पांच सांसद हैं, तो वाईएसआरसीपी के पास चार, बीआरएस के पास 3, डीएमके के पास 8 और एनसीपी (शरद पवार) के पास भी एक सांसद हैं.
इन दोनों के साथ आने से एनडीए आसानी से जरूरी दो-तिहाई बहुमत राज्यसभा में भी हासिल कर लेगी.
सरकार ने इस बिल को पारित कराने के लिए पहले से ही रणनीति बनाई है गृह मंत्री अमित शाह ने छोटे दलों के साथ विस्तृत वार्ता की है ताकि उन्हें समझाया जा सके कि किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा.
NDA की संसदीय दल की बैठक को मंगल मिलन नाम दिया गया है, जिसमें राजनाथ सिंह के दफ्तर में शीर्ष नेताओं की रणनीति पर मंथन हुआ. सरकार का दावा है कि सभी राज्यों की सीटें समानुपातिक रूप से बढ़ेंगी, किसी की कम नहीं होंगी. NCP, DMK, TMC जैसे दलों को लामबंद करने के लिए उनके स्थानीय मुद्दों और फायदों पर बातचीत की जा रही है.
विपक्ष की तैयारी
विपक्ष इस मुद्दे को केवल सीटों के पुनर्वितरण के रूप में नहीं देख रहा. कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी, वाम दल और कई दक्षिण भारतीय पार्टियां लगातार यह तर्क दे रही हैं कि जिन्होंने दशकों तक परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया, उन्हें कम सीटें देकर सजा नहीं मिलनी चाहिए.
विपक्ष की रणनीति तीन स्तरों पर हो सकती है. संसद के भीतर सरकार पर दबाव बनाना. सभी विपक्षी और क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाना. दक्षिण बनाम उत्तर की बहस की बजाय जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों के साथ न्याय का मुद्दा उठाना. इसी वजह से विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री और राजनीतिक दल समय-समय पर संयुक्त बैठकें और सम्मेलन भी कर चुके हैं.
परिसीमन बिल पास हो गया तो क्या होगा?
अगर परिसीमन बिल पारित हो गया और भविष्य में यह लागू होता है तो देश की चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
इससे लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 800 के पार जा सकती है. इसका सबसे बड़ी फायदा उन राज्यों को मिलेगा जहां आबादी अधिक है.
कई राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ सकती है. निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदल जाएंगी. यानी राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव आएगा. उत्तर भारत की राजनीतिक ताकत बढ़ सकती है, जबकि दक्षिण और कुछ छोटे राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है.
महिला आरक्षण 33% लागू होगा, लेकिन यह परिसीमन के बाद ही लागू होगा, जिससे विपक्ष इसे डिले टैक्टिक बता रहा है.
कुछ सांसदों के मौजूदा निर्वाचन क्षेत्र पूरी तरह बदल सकते हैं. इससे राजनीतिक दलों की चुनावी रणनीति बदल जाएगी.
तो संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व नए जनसंख्या अनुपात के अनुसार बदल सकता है.
हालांकि यह भी स्पष्ट है कि अंतिम तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि संसद क्या कानून बनाती है, परिसीमन आयोग क्या सिफारिश करता है और राजनीतिक सहमति किस रूप में बनती है.
यह मुद्दा इतना संवेदनशील क्यों है?
परिसीमन का सीधा असर केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन, संसद में प्रतिनिधित्व और भविष्य की सरकारों के गठन पर पड़ सकता है. यही कारण है कि भले ही मौजूदा संसद सत्र में ऐसा कोई विधेयक सूचीबद्ध नहीं है, लेकिन सरकार और विपक्ष दोनों अभी से अपनी राजनीतिक रणनीति तैयार कर रहे हैं.
आने वाले वर्षों में जनगणना, परिसीमन आयोग और संसद की प्रक्रिया इस बहस को देश के सबसे बड़े राजनीतिक मुद्दों में बदल सकती है. फिलहाल, बिल का भविष्य संसद में होने वाले हंगामे और वोटों की गणित पर टिका है.
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