Explainer: सेना का नया 'लूनबर्ग लेंस', ड्रोन को हेलीकॉप्टर समझकर फंसेगा दुश्मन

लेंस को आर्मी डिज़ाइन ब्यूरो द्वारा डिज़ाइन किया गया है. इस लेंस को अगर कॉडकॉप्टर या किसी ड्रोन में फिट किया जाए, तो ये ऐसे सिग्नल छोड़ेगा, जिससे दुश्मन को लगेगा कि ये एक हेलीकॉप्टर है.

Explainer: सेना का नया 'लूनबर्ग लेंस', ड्रोन को हेलीकॉप्टर समझकर फंसेगा दुश्मन

दुश्मन के एयर डिफेंस को देगा चकमा

खास बातें

  • ड्रोन एक हेलीकॉप्टर जैसा दिखाई देता है...
  • लेंस को आर्मी डिज़ाइन ब्यूरो द्वारा डिज़ाइन किया गया है...
  • हर मौसम, हर इलाके में इस्‍तेमाल किया जा सकता है
नई दिल्‍ली :

भारतीय सेना ने एक हर मौसम, हर इलाके में इस्‍तेमाल किये जाने वाला एक खास 'लेंस' विकसित किया है. इसका उपयोग युद्ध के दौरान दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा देने के लिए किया जा सकता है. इससे दुश्मन के एयर डिफेंस को कुचलने और नष्ट करने में मदद मिलेगी. इस लेंस का नाम है 'लूनबर्ग'. सेना ने लूनबर्ग लेंस का सफल परीक्षण कर लिया है, जो एक ड्रोन से जुड़ा होता है. इसका इस्‍तेमाल दुश्मन के हथियारों, जमीनी बलों और विमानों के हथियारों का पता लगाने के लिए किया जाएगा. 

कैसे काम करता है लूनबर्ग लेंस?
ड्रोन से जब लूनबर्ग लेंस जुड़ा होता है, तब ड्रोन के रडार की क्षमता काफी बढ़ जाती है, जिससे यह एक हेलीकॉप्टर जैसा दिखाई देता है. रडार क्रॉस-सेक्शन रिसीवर पर रडार संकेतों को प्रतिबिंबित करने की लक्ष्य की क्षमता है. रडार क्रॉस-सेक्शन का क्षेत्रफल जितना अधिक होगा, लक्ष्य उतना ही बड़ा होगा. हेलीकॉप्टर की तुलना में ड्रोन में छोटा रडार क्रॉस-सेक्शन होता है. ल्यूनबर्ग लेंस रडार सिग्नेचर को बढ़ाता है और दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली को धोखा देता है, ड्रोन को हेलीकॉप्टर के रूप में दिखाता है. यह दुश्मन को मिसाइलों या विमानभेदी तोपों के इस्तेमाल जैसे हवाई हमले करने के लिए मजबूर करेगा. लेंस को आर्मी डिज़ाइन ब्यूरो द्वारा डिज़ाइन किया गया है. इस लेंस को अगर कॉडकॉप्टर या किसी ड्रोन में फिट किया जाए, तो ये ऐसे सिग्नल छोड़ेगा, जिससे दुश्मन को लगेगा कि ये एक हेलीकॉप्टर है.

इस चकमा देने वाले लेंस को बनाया है कैप्टन धीरज उमेश ने बनाया है. कैप्टन धीरज उमेश ने बताया, "अगर लेंस से लैस ड्रोन (एकाधिक ड्रोन) का झुंड भेजा जाता है, तो यह दुश्मन के रडार को यह चेतावनी देकर भ्रमित कर सकता है कि हमलावर हेलीकॉप्टर लक्ष्य के पास आ रहे हैं और उन्हें जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर कर देगा."

अधिकारी ने कहा, "इकट्ठी की गई खुफिया जानकारी भविष्य के लिए मददगार होगी. यह रडार पर 360 डिग्री क्षेत्र को कवर कर सकती है और किसी भी दिशा से रडार संकेतों को प्रतिबिंबित करेगी."
यह सुरक्षाबलों को दुश्मन के हथियार की स्थिति और तैनात प्रणाली के प्रकार का पता लगाने में मदद करेगा, जो दुश्‍मन के एयर डिफेंस (एसईएडी) को नष्‍ट करने में सहायक है.

ड्रोन का इस्‍तेमाल सेना के हेलिबोर्न ऑपरेशन के नियोजित मार्ग को छिपाने के लिए किया जा सकता है, जहां कई क्वाडकॉप्टर को दुश्मन के रडार को चकमा देने वाली दिशा में भेजा जा सकता है, जिससे यह हवाई हमले का उपयुक्त विकल्प बन जाता है.

मौजूदा दौर में लेंस किसी लड़ाकू विमान को चित्रित नहीं कर सकता है, लेकिन अधिकारी ने कहा कि भविष्य में यदि कोई यूएवी या उच्च गति वाला ड्रोन विकसित किया जाता है, तो हम लड़ाकू जेट को चित्रित करने के लिए लेंस का उपयोग कर सकते हैं.

ऑल-वेदर लेंस
ड्रोन का परीक्षण मार्च में किया गया था, जहां अक्टूबर में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर टेस्ट (ईडब्ल्यूटी) में ओएसए-एके मिसाइल को 6.5 किलोमीटर की दूरी से और रडार सिस्टम पर दागा गया था. ड्रोन की रेंज 15 किलोमीटर है और यह 40 मिनट तक उड़ सकता है. यह प्रणाली गर्म रेगिस्तानों और काफी ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में काम कर सकती है. ड्रोन को बनाने की लागत की काफी कम है. एक लेंस की कीमत लगभग 55,000 रुपये है और प्रति टारगेट लागत लगभग 2.5 लाख रुपये है, जबकि मौजूदा लागत 25-30 रुपये लाख प्रति टारगेट है.

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