Shimla News: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि अगर कोई व्यक्ति गुजारा भत्ता देने में बार-बार चूक करता है, तो मजिस्ट्रेट उसे एक महीने से अधिक की लगातार सिविल इम्प्रिजनमेंट की सजा सुना सकता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 125(3) के तहत डिफॉल्ट करने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी लगातार बनी रहती है.
क्या था पूरा मामला?
यह फैसला जस्टिस संदीप शर्मा की पीठ ने राम लाल नामक व्यक्ति की याचिका को खारिज करते हुए सुनाया. याचिकाकर्ता (जो कि एक मजदूर है) ने निचली अदालत के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे अपनी पत्नी और नाबालिग बेटियों को गुजारा भत्ता न देने के एवज में कुल 70 दिनों की क्युमुलेटिव जेल की सजा सुनाई गई थी. निचली अदालत ने गुजारा भत्ते के भुगतान में अलग-अलग समय पर हुई चूक के लिए क्रमशः 30 दिन, 15 दिन और 25 दिन की अलग-अलग लगातार सजाएं सुनाई थीं.
'1 महीने से ज्यादा की जेल नहीं हो सकती'
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के 'शाहदा खातून बनाम अमजद अली' मामले का हवाला देते हुए दलील दी थी कि धारा 125(3) सीआरपीसी के तहत, चूक की संख्या चाहे कितनी भी हो, जेल की सजा एक महीने से अधिक नहीं हो सकती. उसका तर्क था कि निचली अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह सजा सुनाई है.
'हर महीने भत्ता नहीं देने पर नई सजा संभव'
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों (जैसे कुलदीप कौर बनाम सुरिंदर सिंह और पूंगोडी बनाम थंगावेल) की समीक्षा करने के बाद, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 125 सीआरपीसी एक सामाजिक कल्याण कानून है, जिसका उद्देश्य उपेक्षित पत्नियों और बच्चों की सुरक्षा करना है. अदालत ने कहा कि धारा 125(3) के तहत जेल की सजा केवल भुगतान कराने के लिए दबाव बनाने का एक जरिया है, इससे गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती. चूंकि गुजारा भत्ता एक पुनरावर्ती मासिक दायित्व है, इसलिए मजिस्ट्रेट हर महीने की चूक के लिए एक महीने तक की जेल की सजा सुनाने के लिए पूरी तरह सक्षम है.
एक ही आवेदन से हो सकेगी वसूली
हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पीड़ितों या याचिकाकर्ताओं को हर महीने की छूटी हुई किस्त के लिए अलग से याचिका दायर करने की आवश्यकता नहीं है. वे कई महीनों के बकाए की वसूली के लिए एक ही कंसोलिडेटेड आवेदन दे सकते हैं. अदालत ने कहा, 'यदि एक महीने से अधिक का बकाया है, तो एक महीने से अधिक की अवधि की जेल की सजा लागू की जा सकती है.'
निचली अदालत का फैसला बरकरार
चूंकि याचिकाकर्ता ने अदालत द्वारा मौका दिए जाने और पहले खुद आश्वासन देने के बाद भी बकाया राशि का भुगतान नहीं किया था, इसलिए हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका को खारिज कर दिया और अंतरिम राहत को वापस ले लिया.
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