- हरीश राणा को 2013 में चंडीगढ़ के कॉलेज हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद कोमा में चला गया था
- 13 साल तक बेसुध रहने के बाद हरीश राणा की मौत 11 मार्च के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के 13 दिन बाद हुई
- हरीश के परिवार का घर गाजियाबाद के राज नगर एक्सटेंशन में स्थित सोसायटी के 13वें मंजिल पर है
हरीश राणा.... एक ऐसा नाम जिसकी जिंदगी में सफलता से ज्यादा दुख,बेबसी और लाचारी ने अपनी जगह बना ली. चंडीगढ़ के एक कॉलेज हॉस्टल से 13 साल पहले जो जख्म मिले उसने हरीश को सिर्फ जिंदा लाश बना दिया था. माता-पिता ने बेटे को पल-पल तड़पते देखा है और आज जाकर उसकी रूह को आराम मिला होगा. एक ऐसे जीवन से मुक्ति जिसमें न रस है और न रंग. रोचक बात यह है कि हरीश के जीवन से 13 नंबर का भी खास कनेक्शन रहा, फिर चाहे वह 13 साल पहले उनके साथ हुई कोई दुर्घटना हो या 11 मार्च के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के 13 दिन बाद हरीश की मौत, इस खास संख्या ने भी अब लोगों का ध्यान खींचा है.
2013 और 13 साल का दर्द
वैसे तो 13 को कई जगह अशुभ ही माना गया है. हरीश राणा के लिए भी यह संख्या भी दुख ही लेकर आई. आज से 13 साल पहले साल 2013 की वो मनहूस तारीख ही थी जब चंडीगढ़ की यूनिवर्सिटी के एक हॉस्टल से रक्षाबंधन के रोज हरीश अपनी बहन से बात करते-करते चौथी मंजिल से गिर गया था. इस घटना ने उसे सदा के लिए कोमा में पहुंचा दिया. हरीश राणा इसके बाद न तो कभी उठ पाए और न कभी बोल पाए. बस बेसुध सा शरीर एक बेड पर इस आस के साथ लेटा रहा कि शायद कभी चीजें फिर सही हो जाएंगी, लेकिन हरीश की मौत के साथ ही वो सभी उम्मीदें भी उसी के साथ चली गईं.
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13वें मंजिल पर घर, सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर
हरीश का परिवार भी संयोग से गाजियाबाद के राज नगर एक्सटेंशन में स्थित सोसायटी के 13वें माले पर रहता है. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को हरीश राणा के पक्ष में फैसला सुनाया था. शीर्ष अदालत के फैसले के 13 दिनों बाद ही हरीश राणा की दिल्ली के एम्स में मौत हो गई.

किसने दी मुखाग्नि? पिता ने मीडिया से बनाई दूरी
हरीश राणा का आज साउथ दिल्ली के ग्रीन पार्क में अंतिम संस्कार किया गया. भाई ने हरीश को मुखाग्नि दी है. पिता ने इस दौरान मीडिया से दूरी बनाए रखी और किसी भी बयानबाजी से बचते दिखे. हालांकि पिता ने एम्स के डाक्टरों और सुप्रीम कोर्ट के वकील समेत ब्रह्मकुमारी को धन्यवाद देते कहा कि सबका बहुत सहयोग रहा.मेरी इस लड़ाई में इन लोगों ने बढ़चढ़ कर मदद की.
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