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किसने बिगाड़ी गिग वर्कर की भाग्य रेखा, 12 घंटे खटके के बाद 930 रुपए कमाई का दर्द

मोहम्मद अमान अपना हाथ दिखाते हैं. भीषण सर्दी में गाड़ी चलाने और ठंड की वजह से हथेली पत्थर जैसी सख्त हो गई है और उंगलियों के बीच में गांठ बन गई है, जो कभी कभार दर्द देती है. बावजूद इसके उनकी कमाई में कमी आई है.

किसने बिगाड़ी गिग वर्कर की भाग्य रेखा, 12 घंटे खटके के बाद 930 रुपए कमाई का दर्द
  • गिग वर्कर लंबे समय तक काम करने के बावजूद कमाई में लगातार कमी और मुश्किल हालात का सामना कर रहे हैं.
  • सरकार ने प्लेटफॉर्म कंपनियों से दस मिनट की डिलीवरी बंदिश हटाने को कहा है, फिर भी दबाव बना हुआ है.
  • डिलीवरी वर्करों के हाथ सर्दी में पत्थर जैसे सख्त हो जाते हैं. एक्सीडेंट और चोटें भी आम दिक्कतें हैं.
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नई दिल्‍ली:

गिग वर्कर बेहद मुश्किल हालात में काम करते हैं. हालांकि अब गिग वर्करों की मेहनत, दर्द और संघर्ष देश भर में बहस का हिस्सा बन रहा है. कई घंटों तक काम करने के बावजूद गिग वर्करों की कमाई में लगातार कमी आ रही है. NDTV की ग्राउंड रिपोर्ट में जब हमने गिग वर्करों से बात की तो इस भीषण सर्दी में मुश्किल परिस्थितियों से जूझने और बेहद कम कमाई के लिए घंटों लगा देने की जद्दोजहद सामने आई है. सरकार ने प्लेटफॉर्म कंपनियों से 10 मिनट की बंदिश को खत्म करने के लिए कहा है, लेकिन गिग वर्करों की परेशानी में कमी नहीं आई है. गिग वर्करों के संघर्ष की कहानी उनके हाथों की हथेलियां बयां कर देती है.

मोहम्मद अमान पहले डाटा इंट्री आपरेटर थे, कंप्यूटर से डिप्लोमा होल्डर हैं और 2021 में नौकरी छूटने के बाद ब्लिंककिट में डिलीवरी का काम करने लगे. झंडेवालान इलाके के ब्लिंककिट सेंटर पर काम करने वाले मोहम्‍मद अमान बताते हैं कि पहले 12-15 घंटे काम करने पर दो हजार रुपए तक कमा लेते थे, लेकिन आजकल इनकी आमदनी घट गई है.

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पत्‍थर जैसे सख्‍त हो गए हैं हाथ

मोहम्मद अमान अपना हाथ दिखाते हैं. भीषण सर्दी में गाड़ी चलाने और ठंड की वजह से हथेली पत्थर जैसी सख्त हो गई है और उंगलियों के बीच में गांठ बन गई है, जो कभी कभार दर्द देती है. अमान बताते हैं कि मंगलवार को 12-13 घंटे काम करने के बाद उन्होंने केवल 930 रुपए कमाए. गाड़ी का तेल और खर्चा भी इसमें शामिल है.

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इसी तरह कुलदीप बताते हैं कि दस मिनट की डिलीवरी के चक्कर में पिछले महीने एक्सीडेंट हो गया था, जिसमें पैर में फ्रैक्चर हो गया. हालांकि अब 10 मिनट की बंदिश हटा दी गई है, लेकिन कंपनियों का अब भी तकनीक के जरिए हम पर जल्दी डिलीवरी करने का दबाव रहता है.

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झंडेवालान से अल्‍बर्ट स्‍क्‍वेयर तक कैसे पहुंची डिलीवरी?

डिलीवरी की दुश्‍वारियां जानने के लिए एनडीटीवी की टीम ने मोहम्मद अमान के डिलीवर प्वाइंट तक जाने का फैसला किया. मंगलवार सुबह करीब 10.30 के बीच अमान कड़ाके की ठंड में अपनी गाड़ी से अल्‍बर्ट स्‍क्‍वेयर 10 मिनट के भीतर पहुंच गए. अंदर पता खोजने में दिक्‍कत हुई, क्‍योंकि हाउसिंग सोसाइटी का एक गेट बंद होने से घूम कर जाना पड़ा. गार्ड के साथ भी उन्‍हें बहस करनी पड़ी और फिर यह डिलीवरी डॉ. जगदीश के यहां पहुंची.

डॉ. जगदीश ने बताया कि वो अक्सर सामान मंगवाते रहते हैं और कई बार इनको टिप भी देते हैं, लेकिन कंपनियों को चाहिए कि इनकी वर्किंग कंडीशन को सुधारें और सरकार बेहतर नियम बनाए.

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