- स्क्रीन टाइम से थकी दुनिया अब डिजिटल डिटॉक्स के लिए पैसे खर्च कर रही है.
- पुराने आईपॉड, लेगो सेट्स और ऑफ-ग्रिड छुट्टियों की मांग तेजी से बढ़ी है. भारत में भी यह चलन बढ़ रहा है.
- यहां डिजिटल डिटॉक्स बड़ा बिजनेस बन रहा है. ट्रैवल कंपनियां अनप्लग्ड वेकेशन और टेक-फ्री रिट्रीट बेच रही हैं.
स्मार्टफोन कभी सुविधा का प्रतीक थे. लेकिन अब वही फोन लोगों के तनाव, चिंता और मानसिक थकान की सबसे बड़ी वजह बनते जा रहे हैं. यही कारण है कि दुनिया भर में डिजिटल डिटॉक्स नाम का एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है. हाल ही में कंगना रनौत ने भी डिजिटल डिटॉक्स की बात की है. डिजिटल डिटॉक्स यानी वैसी छुट्टियां जो पहाड़, समुद्र या जंगल पर ही न हों बल्कि वो ऐसी जगहों पर हों जहां मोबाइल नेटवर्क ही न हो, व्हाट्सएप्प की घंटी न बजे और कोई सोशल रील्स न चलें.
दरअसल, यह सिर्फ एक लाइफस्टाइल ट्रेंड नहीं बल्कि एक तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बन चुका है.
डिजिटल डिटॉक्स इंडस्ट्री में अब ऑफ-ग्रिड हॉलीडे, पुराने आई पॉड्स, लेगो ब्रिक्स, टेक-फ्री कैंप और सोशल मीडिया डिटॉक्स पैकेज जैसी चीजें शामिल हो चुकी हैं.

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सिर्फ म्यूजिक वाला आईपॉड फिर बना ट्रेंड
एक समय था जब एप्पल का आईपॉड तकनीक की दुनिया का सुपरस्टार था. लेकिन स्मार्टफोन आने के बाद उसका दौर खत्म हो गया. एप्पल ने 2022 में अपने आईपॉड को बंद भी कर दिया पर अब उसके रिफर्बिश्ड डिवाइसेज की वापसी हो रही है. इसकी एक बड़ी वजह लोगों में डिस्ट्रैक्शन-फ्री जिंदगी की चाह का बढ़ना है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में अमेरिका गूगल ट्रेंड्स पर आईपॉड और आईपॉड नैनो की सर्च अचानक बढ़ गई. सेकेंड-हैंड मार्केट में रिफर्बिश्ड आईपॉड की बिक्री लगातार ऊपर जा रही है. ये एक ऐसा डिवाइस है जो सिर्फ गाने बजाता है. उस पर कोई नोटिफिकेशन नहीं आते. सोशल मीडिया और स्कॉलिंग करने जैसे आदतें भी ये नहीं देता है.

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डिजिटल डिटॉक्स और भारत
भारत में भी डिजिटल डिटॉक्स अब बड़ा ट्रैवल ट्रेंड बन चुका है. कंपनियां अनप्लग्ड वैकेशन पैकेज बेच रही हैं. यानी एक ऐसी छुट्टी जहां इंटरनेट, मोबाइल फोन, लैपटॉप और सोशल मीडिया से पूरी तरह कटकर रहा जाता है.
ऐसे वैकेशन का पूरा बंदोबस्त आमतौर पर जंगलों, पहाड़ों या रिजर्व फॉरेस्ट के अंदर आयोजित किया जाता हैं, जहां नेटवर्क बेहद कमजोर होता है.
उनका कहना है कि लोग शुरुआत में फोन इस्तेमाल करने की छूट मांगते हैं, लेकिन रिट्रीट का पूरा मकसद ही दिमाग को डिजिटल तनाव से बाहर निकालना होता है.
यानी अब 'नो नेटवर्क' भी एक प्रीमियम अनुभव बन चुका है.

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लेगो भी बना डिजिटल डिटॉक्स का हथियार
सिर्फ ट्रैवल ही नहीं, खिलौनों का बाजार भी बदल रहा है.
लेगो के बड़े और जटिल सेट्स अब बच्चों से ज्यादा बड़ों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं. खासकर फॉर्मूला-1 थीम वाले लेगो सेट्स की मांग तेजी से बढ़ी है.
विशेषज्ञों का मानना है कि लोग स्क्रीन से हटकर हाथों से कुछ बनाने में मानसिक शांति महसूस कर रहे हैं.
यानी जो समय पहले इंस्टाग्राम या यूट्यूब पर गुजरता था, अब वही समय लोग लेगो ब्रिक्स जोड़ने, पजल्स सुलझाने या ऑफलाइन हॉबी में लगाने लगे हैं.
रिपोर्ट क्या कहती है?
NDTV पर डिजिटल डिटॉक्स की एक रिपोर्ट में कहा गया कि टेक्नोलॉजी के इस दौर में लगातार स्क्रीन पर बने रहना लोगों की मानसिक सेहत पर असर डाल रहा है.
वहीं NDTV हेल्थ की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग तनाव, नींद की कमी और मानसिक थकान बढ़ा सकती है. रिपोर्ट में बताया गया कि छोटे-छोटे “डिजिटल ब्रेक” भी दिमाग को शांत करने में मदद कर सकते हैं.
NDTV की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि लोग अब संडे डिजिटल डिटॉक्स जैसे छोटे प्रयोग कर रहे हैं, जहां वे एक दिन के लिए सोशल मीडिया से दूरी बनाते हैं.
सरकारें भी चिंतित
डिजिटल डिटॉक्स अब सिर्फ व्यक्तिगत पसंद नहीं रहा, बल्कि सरकारों और नीति निर्माताओं की चिंता का विषय भी बन चुका है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर उम्र आधारित प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है.
ऑस्ट्रेलिया पहले ही 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट्स पर सख्त नियम लागू कर चुका है. भारत के कुछ राज्य भी इसी तरह के कदमों पर विचार कर रहे हैं.

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रिसर्च क्या कहती है?
विश्व आर्थिक मंच यानी वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार, महामारी के बाद टेक से थकान फ्रेजी तेजी से बढ़ी है और लोग अब जानबूझकर डिजिटल ब्रेक लेना चाहते हैं.
हालांकि कुछ रिसर्च यह भी कहती हैं कि सिर्फ फोन बंद कर देने से जिंदगी अचानक बेहतर नहीं हो जाती. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सीमित स्क्रीन टाइम और टेक्नोलॉजी के संतुलित इस्तेमाल से तनाव कम किया जा सकता है.

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क्या डिजिटल डिटॉक्स फैशन है?
यह सवाल भी लगातार उठ रहा है. क्योंकि ऑफ-ग्रिड रिट्रीट, वेलनेस ट्रिप और प्रीमियम डिटॉक्स कैंप काफी महंगे होते हैं. लेकिन जानकार कहते हैं कि डिजिटल डिटॉक्स हमेशा महंगी छुट्टी नहीं होता. वे कहते हैं कि फोन से कुछ घंटे दूरी बनाना, खाने के दौरान स्क्रीन बंद रखना, सोने से पहले सोशल मीडिया न देखना और वीकेंड पर नोटिफिकेशन ऑफ करना भी इसकी शुरुआत हो सकती है.

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आखिर लोग फोन से भाग क्यों रहे हैं?
क्योंकि स्मार्टफोन अब सिर्फ एक डिवाइस नहीं रहा. वह ऑफिस, सोशल मीडिया, न्यूज, मनोरंजन, विज्ञापन और लगातार तुलना करने वाली दुनिया का दरवाजा बन चुका है.
लोगों को लगने लगा है कि वे हमेशा ऑन हैं. हर समय उपलब्ध. हर समय जवाब देने के दबाव में, और शायद यही वजह है कि अब स्विच ऑफ करना ही नया लग्जरी स्टेटस बनता जा रहा है.
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