- साठ के दशक में शिव सेना की स्थापना भाषावाद की राजनीति के आधार पर हुई
- शिव सेना ने मराठीवाद और हिंदुत्ववाद के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया लेकिन पार्टी में अंतर्विरोध भी दिखा
- महाराष्ट्र सरकार के परिवहन विभाग ने ऑटोरिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य की
साठ के दशक में शिव सेना का जन्म भाषावाद की राजनीति के आधार पर हुआ था. अस्सी के दशक में भले ही शिव सेना ने धर्म आधारित राजनीति करनी शुरू कर दी हो लेकिन पार्टी ने मराठीवाद से भी खुद को जोड़े रखने का प्रयास किया. यही वजह है कि अगर शिव सेना के बीते चार दशकों का इतिहास देखें तो ये पार्टी हिंदुत्वाद और मराठीवाद के बीच उलझी नजर आती है और इन मुद्दों पर पार्टी में अंतर्विरोध दिखाई देता है.
शिव सेना के मराठीवाद का इतिहास पुराना
महाराष्ट्र में इन दिनों मुद्दा गर्म है ऑटोरिक्शा और टैक्सी चालकों के लिये मराठी अनिवार्य किए जाने का. सरकार की ओर से नियम बनाया गया है कि जो ड्राइवर मराठी नहीं बोल पाएगा उसका परमिट खारिज कर दिया जायेगा. इस नियम पर अमल करवा रहा है परिवहन विभाग. राज्य की महायुति गठबंधन सरकार में परिवहन विभाग शिव सेना के पास है. ये वही एकनाथ शिंदे वाली शिव सेना है जिसे 2022 की बगावत के बाद असली शिव सेना के तौर पर मान्यता मिली हुई है. इस नियम से वे ऑटोरिक्शा और टैक्सी चालक प्रभावित हो रहे हैं, जो उत्तर भारतीय हैं और जिनकी मातृभाषा हिंदी है. शिव सेना के इतिहास को खंगालें तो पता चलता है कि इस पार्टी ने कभी उत्तर भारतीयों को पुचकारा, कभी सिर आंखों पर बिठाया तो कभी उनको पीटा भी.
साठ के दशक में जब शिव सेना ने स्थानीय लोगों के रोजगार के मुद्दे पर हिंसक आंदोलन के जरिए महाराष्ट्र के सियासी पटल पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई तो उसके निशाने पर दक्षिण भारतीय लोग थे, जो मुंबई में आकर बसे थे. पार्टी संस्थापक बाल ठाकरे का मानना था कि पढ़े लिखे दक्षिण भारतीय लोग बैंकों में, प्राइवेट कंपनियों में और सरकारी नौकरियों में मराठी मानुस का हक मार रहे थे. दक्षिण भारतीय लोगों को पीट पीटकर मुंबई से भगाने की मुहिम शुरू हुई.

मराठीवाद के बाद हिंदुत्ववादी छवि बनाई
हिंसक भाषाई राजनीति के जरिए शिव सेना चर्चा में तो आ गई और एक राजनीतिक ताकत के तौर पर अपने आप को स्थापित भी कर लिया लेकिन मराठीवाद का मुद्दा मुंबई और ठाणे जैसे शहरों के बाहर चल नहीं रहा था. पार्टी के विस्तार के लिए ठाकरे को किसी और मुद्दे की भी तलाश थी. अस्सी के दशक में ये मुद्दा हिंदुत्ववाद के रूप में मिला, जब मुंबई से सटे भिवंडी में भयानक सांप्रदायिक दंगे हुए. ठाकरे के आदेश पर शिव सैनिक उस दंगे में कूद पड़े और जमकर खून खराबा किया. उन दंगों ने शिव सेना को एक नई छवि दी, एक कट्टर हिंदुत्ववादी और मुस्लिम विरोधी पार्टी. इस बीच शिव सेना ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया और रामजन्मभूमि आंदोलन में भी शामिल हो गई. दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने का श्रेय भी ठाकरे ने सार्वजनिक तौर पर अपने शिव सैनिकों को दिया जिसने शिव सेना की कट्टर हिंदुत्ववादी छवि को और मजबूत कर दिया.
हिंदुत्ववाद अपनाने के बाद ठाकरे ने महाराष्ट्र के बाहर भी शिव सेना के विस्तार की योजना बनाई. इस योजना के तहत सबसे पहले हिंदी भाषियों को साथ जोड़ेने का फैसला लिया गया. इसी फैसले के तहत ठाकरे ने फरवरी 1993 में अपनी पार्टी के मुखपत्र “दैनिक सामना” का हिंदी संस्करण “दोपहर का सामना” शुरू किया जो अब भी प्रकाशित होता है. इस हिंदी अखबार का कार्यकारी संपादक उन्होने एक बिहारी पत्रकार संजय निरूपम को बनाया. यही नहीं उन्होने निरूपम को राज्यसभा का टिकट भी दे दिया. निरूपम ने ठाकरे के कहने पर दिसंबर 1996 में मुंबई के अंधेरी स्पोर्ट्स कॉमप्लैक्स में एक उत्तर भारतीय महासम्मेलन का आयोजन किया जहां ठाकरे ने हजारों उत्तर भारतीयों की भीड़ को हिंदी में संबोधित किया.
जब शिव सेना की छव को लगा झटका
बाल ठाकरे की गैर-मराठियों को साथ लेने की मुहिम उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने भी जारी रखी. जब उन्होंने साल 2003 में कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में पार्टी की कमान संभाली. उद्धव ने गैर मराठियों से मेलजोल के लिए “मी मुंबईकर” नाम की एक मुहिम शुरू की. सबको लग रहा था कि अब शिव सेना भाषावाद की राजनीति से ऊपर उठ चुकी है लेकिन उसी वक्त मुंबई से सटे कल्याण में एक ऐसी घटना हुई जिसने बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे के किये कराये पर पानी फेर दिया. राज ठाकरे, जो उन दिनों शिव सेना में थे, ने अपने कार्यकर्ताओं को आदेश दिया कि रेलवे भर्ती की परीक्षा देने के लिये उत्तर प्रदेश और बिहार से आये युवकों को पीट पीटकर भगाया जाए. भले ही उद्धव इस हरकत से सहमत नहीं थे लेकिन ये हिंसा शिव सेना के बैनर तले ही हो रही थी.
कल्याण में हुई हिंसा ने शिव सेना की बदली हुई छवि को खासा नुकसान पहुंचाया. संजय निरूपम ने शिव सेना छोड़ दी और कांग्रेस में चले गये. पार्टी छोड़ने का एक कारण उन्होंने इस हिंसा को बताया. 2005 में राज ठाकरे ने भी शिव सेना छोड़ दी और खुलकर मराठीवाद की राजनीति करने लगे.
जून 2022 में जब एकनाथ शिंदे ने पार्टी को दो फाड़ किया तब वे भी मराठीवाद के बजाय हिंदुत्ववाद की बात कर रहे थे. उनका कहना था कि महाविकास अघाडी के मुख्यमंत्री के तौर पर उद्धव ठाकरे मुसलमानों का तुष्टीकरण कर रहे थे और उनकी वजह से पार्टी की हिंदुत्ववादी छवि को नुकसना पहुंचा. बाल ठाकरे की तरह एकनाथ शिंदे ने भी शिव सेना में गैर मराठी नेताओं को शामिल किया जैसे मिलिंद देवरा, शाएना एनसी और संजय निरूपम. लेकिन ऑटोरिक्शा और टैक्सी चलाकों के लिये मराठी अनिवार्य करके फिर से उनकी पार्टी भाषाई राजनीति करती दिखाई दे रही है. दिलचस्प बात ये है कि जो संजय निरूपम अविभाजित शिव सेना में भाषावाद का विरोध कर रहे थे वही संजय निरूपम इस शिव सेना में भी वही कर रहे हैं. कुल मिला कर हिंदुत्ववाद और मराठीवाद के बीच उलझी शिव सेना में अंतर्विरोध जारी है.
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